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Tiger Deaths In India: 2021 से अब तक कहां कितने बाघों की हुई मौत, NTCA ने दी जानकारी

भारत में 2021 से 2025 तक अब तक हुई बाघों की मौतों में से आधे से ज्यादा मौतें संरक्षित अभयारण्यों के बाहर हुई हैं। राष्‍ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के अनुसार, इस अवधि के दौरान 667 बाघों की मृत्यु हुई, जिनमें से 341 बाघों की मृत्यु अभयारण्यों के बाहर हुई, जो कुल संख्या का 51 फीसदी है।

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2021 में 129 बाघों की मौत हुई (PHOTO-istock)

नई दिल्ली: भारत में 2021 से 2025 तक अब तक हुई बाघों की मौतों में से आधे से ज्यादा मौतें संरक्षित अभयारण्यों के बाहर हुई हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश से सामने आए हैं। सरकारी आंकड़ों में यह जानकारी दी गई। राष्‍ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के अनुसार, इस अवधि के दौरान 667 बाघों की मृत्यु हुई, जिनमें से 341 बाघों की मृत्यु अभयारण्यों के बाहर हुई, जो कुल संख्या का 51 फीसदी है।

वर्षवार आंकड़ों के अनुसार, 2021 में 129 बाघों की मौत हुई, 2022 में 122; 2023 में 182; 2024 में 126 और 2025 में अब तक 108 बाघों की मौत हुई।वहीं, वर्ष 2021 में अभयारण्यों के बाहर 64 बाघों की मौत हुई; 2022 में 52; 2023 में 100; 2024 में 65 और 2025 में अब तक 60 बाघों की मौत हो चुकी है। महाराष्ट्र में अभयारण्यों के बाहर सबसे ज्यादा 111 बाघों की मौत दर्ज की गई, इसके बाद मध्यप्रदेश में 90 बाघों की मौत हुई।

न्यूज एजेंसी भाषा के मुताबिक महाराष्ट्र में वर्ष 2021 में अभयारण्यों के बाहर 23 बाघों की मौत हुई थी, मध्यप्रदेश में 18, केरल में पांच और तेलंगाना में चार बाघों की जान गई थी। महाराष्ट्र में वर्ष 2022 में अभयारण्यों के बाहर 18 बाघों की मौत हुई थी, जबकि मध्यप्रदेश में 12 और केरल व उत्तराखंड में चार-चार बाघों की जान गई थी। महाराष्ट्र में वर्ष 2023 में अभयारण्यों के बाहर 34 बाघों की मौत हुई थी। वहीं, मध्यप्रदेश में 13, केरल और उत्तराखंड में 11-11 और कर्नाटक में छह बाघों की मौत हुई।मध्यप्रदेश में वर्ष 2024 में 24 बाघों की जान गई, जबकि महाराष्ट्र में 16 बाघों की मौत हुई।

इस वर्ष अब तक महाराष्ट्र में अभयारण्यों के बाहर 20 बाघ, मध्यप्रदेश में 13, केरल में आठ और कर्नाटक में सात बाघों की जान गई है। एनटीसीए के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2012 से 2024 के बीच 1,519 बाघों की मौत हुई, जिनमें से 634 या 42 प्रतिशत बाघों की मौत अभयारण्यों के बाहर हुई। (भाषा इनपुट)

Sanjeev Dubey
संजीव कुमार दुबेauthor

पत्रकारिता में मेरे सफर की शुरुआत 20 साल पहले हुई। 2002 अक्टूबर में टीवी की रुपहले दुनिया में दाखिल हुआ। शुरुआत टीवी की दुनिया के उस पहलू से हुई जहां हर खबर को उसके मुताबिक आकार दिया जाता है यानी उसे कसा जाता है। सहारा टीवी में मेरे कामकाज की शुरुआत पैकेजिंग से हुई जहां खबरों को अलग-अलग प्रारूपों में गढ़ने का काम होता है। फिर पीसीआर में आउटपुट एडिटर की भूमिका निभाने का मौका मिला जहां तुरंत निर्णय कर खबरों को ब्रेक करने की चुनौती रहती है। न्यूजरूम की गहमागमी के बीच रनडाउन तैयार करने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। यहां ब्रेकिंग, हार्ड कोर की खबरों और फीचर्ड प्रोग्रामिंग ने मेरे अनुभव का दायरा तो बढ़ाया ही उसमें गहराई एवं पैनापन भी दिया। 2011 में टेलिविजन न्यूज की दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। अक्टूबर 2011 में Zee News की हिंदी वेबसाइट को अपनी अगवुाई में लॉन्च करने का मौका मिला। डिजिटल की दुनिया और टीवी की दुनिया में खबरें परोसने और खबरों को दिखाने का अंदाज बिल्कुल अलग था। मैं उस दौर में दस्तक दे चुका था जब टीवी भी स्मार्टफोन पर देखा जाने लगा था। डिजिटल पर भी ब्रेकिंग थी। अगर टीवी में प्रोग्रामिंग थी तो यहां भी बतौर फीचर, सॉफ्ट स्टोरीज का विशाल संसार था। एक नया मीडियम जो स्मार्टफोन पर बखूबी देखा और समझा जा सकता था। डिजिटल की इस दुनिया में टीवी और अखबार दोनों समाहित थे। यहां काम करते हुए डिजिटल न्यूज मीडिया की बारीकियां तो सीखी हीं। साथ ही जब जी न्यूज से विदाई ली तो उस समय 33 मिलियन यूजर्स के बीच 84 मिलियन पीवीज देखने की अपार खुशियां हासिल हुईं। जी न्यूज में एक लंबी पारी खेलने के बाद जुलाई 2017 में टाइम्स नाउ नेटवर्क से जुड़ने का अवसर मिला। 2017 में ही टाइम्स नाउ की हिंदी वेबसाइट की शुरुआत हुई। यह पहला मौका था जब टाइम्स नाउ की अगुवाई में कोई हिंदी न्यूज वेबसाइट लॉन्च हुई। यहां एक नई और युवा टीम बनी। यह टीम आक्रामक अंदाज में काम करते हुए कम समय में अपनी पहचान बनाई। डिजिटल की दुनिया के बदलते संसार में अब चुनौती पीवीज की नहीं बल्कि यूजर्स की थी, जिन्हें लाना इतना आसान नहीं थी। लेकिन टीम के जज्बे, हौसले ने असाधारण चुनौतियों को भी अपनी मेहनत एवं लगन से उसे सामान्य बनाया। डिजिटल न्यूज की दुनिया में हर पल चुनौतियों के बीच नया कुछ सीखने-समझने और कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है। यह सिलसिला आज भी अनवरत जारी है-

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