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Mulayam Singh Yadav Death:मुलायम को रह गई इस बात की कसक,अखिलेश को दी थी बड़ी नसीहत

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  • Updated Oct 10, 2022, 12:35 PM IST

Mulayam Singh Yadav Death: मुलायम सिंह यादव ने अपने 55 साल के राजनीतिक जीवन, सभी प्रमुख ऊंचाइयों को छुआ। वह 7 बार सांसद और 8 बार विधायक रहे। लेकिन इसके बावजूद उनके मन में प्रधानमंत्री नहीं बन पाने की कसक रह गई । असल में उनके राजनीतिक करियर में ऐसे मौके दो बार आए थे, लेकिन दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम की वजह से उनकी इच्छा अधूरी रह गई।

KEY HIGHLIGHTS
  • मुलायम सिंह यादव का प्रधानमंत्री बनने की रेस में नाम पहली बार साल 1996 में आया था।
  • लेकिन बाद में एच.डी.देवगौड़ा के नाम पर सहमति बनी और मुलायम सिंह के हाथ से मौका छूट गया।
  • 2017 में यूपी में विधान सभा में हार के बाद मुलायम ने अखिलेश यादव को आड़े हाथ लिया था।

Mulayam Singh Yadav Death:समाजवादी पार्टी के संस्थापक, पूर्व रक्षा मंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav ) का निधन हो गया है। मुलायम का जीवन एक ऐसे खांटी नेता का रहा है, जो 3 बार मुख्यमंत्री रहने के बाद भी कभी जमीन से नहीं कटे। उन्हें मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री रहते हुए भी जमीन से नाता नही तोड़ा और उसी का असर था कि उन्हें यूपी की हर सीट के राजनीतिक समीकरण की नब्ज पता थी। मुलायम सिंह यादव ने अपने 55 साल के राजनीतिक जीवन, सभी प्रमुख ऊंचाइयों को छुआ, लेकिन इसके बावजूद उन्हें एक बात की हमेशा कसक रही कि वह प्रधानमंत्री नहीं बन पाए।असल में उनके जीवन में दो बार ऐसे मौके आए, जब वह प्रधानमंत्री की कुर्सी के बेहद करीब पहुंच गए थे। लेकिन ऐन वक्त पर लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav), शरद यादव जैसे नेताओं का साथ नहीं मिलने के कारण, उनकी यह इच्छा अधूरी रह गई। खास बात यह है कि मुलायम सिंह यादव ने कभी अपनी कसक को छुपाया नहीं..

1996 में मिला था पहली बार मौका

मुलायम सिंह यादव का प्रधानमंत्री (Prime Minister) बनने की रेस में नाम पहली बार साल 1996 में आया था। उस दौरान लोकसभा चुनाव में देश में त्रिशंकु जनादेश आया था। कांग्रेस को केवल 141 सीटें मिली थीं। जबकि भारतीय जनता पार्टी के खाते में 161 सीटें आई थीं। ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का निमंत्रण मिला। लेकिन बहुमत नहीं होने से बाजपेयी सरकार 13 दिनों में ही गिर गई। ऐसे में दूसरे दलों ने सरकार बनाने की कवायद शुरू की। कांग्रेस बहुमत से 130 से ज्यादा सीटें कम पाने के कारण, सरकार का नेतृत्व करने को तैयार नहीं थी। ऐसे में साल 1989 में सरकार बना चुके वी.पी.सिंह पर सबकी नजर थी। लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया।

इसके बाद वाम दलों के नेता और बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु के नाम पर सहमति बनती नजर आई ङै। लेकिन पोलित ब्यूरो ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने से इंकार कर दिया। इसके बाद मुलायम सिंह यादव का नाम रेस में आया। और जिस पर सहमति भी बनती नजर आ रही थी। लेकिन लालू प्रसाद यादव, शरद यादव और वी.पी.सिंह ने उनका विरोध कर दिया। जिससे मुलायम सिंह यादव के हाथ से पीएम बनने का मौका फिसल गया।

इसके बाद 1997 में जब देवगौड़ा सरकार गिर गई थे तो फिर मुलायम सिंह यादव का नाम पीएम के लिए चर्चा में आया था। लेकिन इस बार लालू प्रसाद यादव, चंद्र बाबू नायडू ने अड़ंगा लगा दिया। जिसके बाद इंद्र कुमराल गुजराल को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला।

अखिलेश यादव को मुलायम ने दी थी बड़ी नसीहत

साल 2017 में जब उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की बुरी हार हुई। उसके बाद मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के खिलाफ बड़ा बयान दे दिया था। उन्होंने मैनपुरी में एक कार्यक्रम में कहा था कि 2012 में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। उन्होंने अखिलेश यादव के बारे में कहा था कि उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके पार्टी की हार तय कर ली थी। मुख्यमंत्री मुझे बनना चाहिए था। अगर मैं मुख्यमंत्री होता तो 2017 के चुनाव में बहुमत मिल जाता।

इसके पहले साल 2016 में उन्होंने सपा में जारी कलह पर, अखिलेश यादव को नसीहत देते हुए कहा था कि बड़े पद पर बैठने वाले को अहंकार नहीं होना चाहिए। उन्हें विनम्र होना चाहिए, आलोचना सुननी चाहिए। जब सम्मान बड़ा हो जाता है तो मनमानी नहीं की जाती है।

प्रशांत श्रीवास्तव
प्रशांत श्रीवास्तवauthor

करीब 17 साल से पत्रकारिता जगत से जुड़ा हुआ हूं। और इस दौरान मीडिया की सभी विधाओं यानी टेलीविजन, प्रिंट, मैगजीन, डिजिटल और बिजनेस पत्रकारिता में काम करने का मौका मिला। इस समय Timesnowhindi.com में टीम लीड के रुप में बिजनेस, ऑटो, यूटीलिटी, टेक सेक्शन में अपना योगदान दे रहा हूं। करियर का पहला ब्रेक हैदराबाद स्थित मीडिया संस्थान ईटीवी से टेलीविजन के जरिए हुआ। यहां पर टेलीविजन पत्रकारिता की बारीकियों को समझने का मौका मिला। और उसके बाद अगला पड़ाव दिल्ली स्थित दैनिक भास्कर समूह का बिजनेस भास्कर रहा। यहां से बिजनेस पत्रकारिता में कदम रखा। और यह सफर वित्त मंत्रालय की रिपोर्टिंग से लेकर बैंकिंग, इंश्योरेंस, ऑटो, एफएमसीजी, एमएमएमई, टेलीकॉम सेक्टर की ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर कॉरपोरेट जगत की खबरें और इकोनॉमी से जुड़ी खबरों से गुजरते हुए अमर उजाला, मनी भास्कर वेबसाइट से होकर आउटलुक मैगजीन पहुंचा। यहां पर पॉलिटिकल खबरों को करने का मौका मिला। आउटलुक में रहते हुए भाजपा और कांग्रेस पार्टी को भी कवर किया। इस दौरान दिल्ली दंगों पर ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर सीएए आंदोलन, किसान आंदोलन और कृषि जगत, वाइल्ड लाइफ से जुड़ी ग्राउंड रिपोर्ट भी करने का मौका मिला। करियर के इस सफर में 2014 लोक सभा चुनाव, 2019 लोक सभा चुनाव, इसके अलावा उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव, राजस्थान विधान सभा, मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव की ग्राउंड रिपोर्ट भी की। पिछले 16 साल से केंद्रीय बजट की बारीकियों को समझकर उसे आम भाषा में लोगों तक पहुंचाने का भी प्रयास किया है। 17 साल के करियर में करीब 10 साल डिजिटल मीडिया का अनुभव रहा है। पिछले 3 साल से टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। पत्रकारिता का ककहरा माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से सीखा है।

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