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2 जून 1995 का वह दिन,जिसने मुलायम-मायावती को बना दिया दुश्मन, फिर 24 साल बाद टूटी दीवार

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  • Updated Oct 10, 2022, 02:24 PM IST

Mulayam Singh Yadav Death: मुलायम सिंह यादव और मायावती का राजनीतिक नाता ऐसा रहा है कि एक समय दोनों ने मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी। लेकिन 2 जून 1995 की घटना ने उस रिश्ते को ही खत्म कर दिया। उस दिन गेस्ट हाउस कांड में जो हुआ, उसके बाद दोनों नेताओं के बीच दूरियां बन गई।

KEY HIGHLIGHTS
  • साल 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने दलित-ओबीसी-मुस्लिम गठजोड़ के साथ चुनाव लड़ा था।
  • सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद भाजपा सरकार नहीं बना पाई थी। और सपा-बसपा की सरकार बनीं।
  • मुलायम के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार में दो साल बाद ही दरार आनी शुरू हो गई थी।

Mulayam Singh Yadav Death: भारतीय राजनीति में पिछले 5 दशक से लगातार अहम भूमिका निभाने वाले वाले मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav)के निधन पर बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती (Mayawati) ने शोक संवेदना जाहिर की है। उन्होंने ट्वीट कर लिखा है कि समाजवादी पार्टी के व्योवृद्ध नेता व यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव जी के आज निधन हो जाने की खबर अति-दुःखद है। उनके परिवार व सभी शुभचिन्तकों के प्रति मेरी गहरी संवेदना।'

मुलायम सिंह यादव और मायावती का राजनीतिक नाता ऐसा रहा है कि एक समय दोनों ने मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी। लेकिन 2 जून 1995 की घटना ने ऐसा भूचाल लाया कि मायावती और मुलायम सिंह यादव को दोस्ती, दुश्मनी में बदल गई। और यह दुश्मनी ऐसी चली कि 24 साल तक दोनों एक दूसरे से दूर रहे। तो सवाल यही है कि 2 जून 1995 को ऐसा क्या हुआ था कि जिससे दोनों नेता एक दूसरे के राजनीतिक दुश्मन बन गए।

गेस्ट हाउस कांड (Guest House) के नाम से जानी जाती है घटना

साल 1993 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में वहीं प्रयोग किया था गया था, जो कि साल 2019 के लोक सभा चुनाव में अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने दोहराया। यानी मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने दलित-ओबीसी-मुस्लिम गठजोड़ के साथ चुनाव लड़ा था। और उसका असर भी हुआ, चुनाव में सपा को जहां 109 सीटें मिलीं वहीं बसपा के 67 प्रत्‍याशी चुनाव जीते । दोनो दलों ने भाजपा (BJP)के 177 सीटें जीतने के बाद भी दूसरे सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार बना ली। और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

लेकिन यह गठबंधन ज्यादा दिन चल नहीं पाया। और ढाई साल बाद ही लड़खड़ाने लगा। एक तरफ मुलायम सिंह यादव को लगता था कि कांशीराम कभी भी उनकी सरकार गिरा सकते हैं। दूसरी तरफ मायावती को लगता था कि मुलायम सिंह यादव बसपा विधायकों को तोड़ने में लगे हुए। इस बीच कांशीराम-मायावती ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला कर लिया। और एक जून को मायावती ने मुलायम सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। और उसके बाद उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की राजनीति में जो हुआ, उसे एक काले अध्याय के रूप में जाना जाता है।

2 जून बना काला अध्याय

तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा को एक जून को मायावती ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का समर्थन पेश किया। और उसके अगले दिन यानी 2 जून, 1995 मायावती ने लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में बीएसपी (BSP) विधायकों की एक बैठक बुलाई। उस दिन बैठक खत्म होने के बाद, मायावती आगे की चर्चा के लिए कुछ प्रमुख पार्टी विधायकों के साथ दूसरे कमरे में चली गई। आगे की रणनीति पर बसपा में माथा पच्ची चली रही थी कि शाम 4 बजे के करीब 200 लोगों की भीड़ ने गेस्ट हाउस पर हमला कर दिया। आरोप है कि भीड़ में समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के विधायक और समर्थक शामिल थे। सपा कार्यकर्ता कमरे में बंद मायावती पर भी हमला करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन पुलिस कर्मियों और कुछ भाजपा नेताओं की वजह से मायावती हमले से बच पाई। इसी बीच बसपा के कई नेताओं को चोटें आई। इसी घटना को गेस्ट हाउस कांड कहा जाता है। और उसके बाद से दोनों नेताओं में एक ऊंची दीवार खिंच गई।

2019 में अखिलेश ने तोड़ी दीवार

मुलायम सिंह यादव और मायावती के बीच यह खाई ऐसी बनी कि फिर अगले 24 साल दलित-ओबीसी-मुस्लिम गठजोड़ बनाने की कोशिशें परवाह नहीं चढ़ पाई। लेकिन 24 साल बाद जब 2019 के लोक सभा चुनाव होने वाले थे, तो अखिलेश यादव ने भाजपा से मुकाबले के लिए एक बार फिर मायावती को मना लिया। और सपा-बसपा ने करीब 26 साल मिलकर चुनाव लड़ा। हालांकि इन चुनावों में इस बार यह गठजोड़ भाजपा को पटखनी नहीं दे पाया।

प्रशांत श्रीवास्तव
प्रशांत श्रीवास्तवauthor

करीब 17 साल से पत्रकारिता जगत से जुड़ा हुआ हूं। और इस दौरान मीडिया की सभी विधाओं यानी टेलीविजन, प्रिंट, मैगजीन, डिजिटल और बिजनेस पत्रकारिता में काम करने का मौका मिला। इस समय Timesnowhindi.com में टीम लीड के रुप में बिजनेस, ऑटो, यूटीलिटी, टेक सेक्शन में अपना योगदान दे रहा हूं। करियर का पहला ब्रेक हैदराबाद स्थित मीडिया संस्थान ईटीवी से टेलीविजन के जरिए हुआ। यहां पर टेलीविजन पत्रकारिता की बारीकियों को समझने का मौका मिला। और उसके बाद अगला पड़ाव दिल्ली स्थित दैनिक भास्कर समूह का बिजनेस भास्कर रहा। यहां से बिजनेस पत्रकारिता में कदम रखा। और यह सफर वित्त मंत्रालय की रिपोर्टिंग से लेकर बैंकिंग, इंश्योरेंस, ऑटो, एफएमसीजी, एमएमएमई, टेलीकॉम सेक्टर की ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर कॉरपोरेट जगत की खबरें और इकोनॉमी से जुड़ी खबरों से गुजरते हुए अमर उजाला, मनी भास्कर वेबसाइट से होकर आउटलुक मैगजीन पहुंचा। यहां पर पॉलिटिकल खबरों को करने का मौका मिला। आउटलुक में रहते हुए भाजपा और कांग्रेस पार्टी को भी कवर किया। इस दौरान दिल्ली दंगों पर ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर सीएए आंदोलन, किसान आंदोलन और कृषि जगत, वाइल्ड लाइफ से जुड़ी ग्राउंड रिपोर्ट भी करने का मौका मिला। करियर के इस सफर में 2014 लोक सभा चुनाव, 2019 लोक सभा चुनाव, इसके अलावा उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव, राजस्थान विधान सभा, मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव की ग्राउंड रिपोर्ट भी की। पिछले 16 साल से केंद्रीय बजट की बारीकियों को समझकर उसे आम भाषा में लोगों तक पहुंचाने का भी प्रयास किया है। 17 साल के करियर में करीब 10 साल डिजिटल मीडिया का अनुभव रहा है। पिछले 3 साल से टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। पत्रकारिता का ककहरा माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से सीखा है।

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