दिल्ली : भारत ने शनिवार को हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के उस फैसले को खारिज कर दिया, जो जम्मू-कश्मीर में कुछ जलविद्युत परियोजनाओं से संबंधित था, जिन पर पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि के तहत आपत्ति जताई थी। नई दिल्ली ने इस फैसले को खारिज करते हुए कहा कि सिंधु जल संधि को ’’स्थगित’’ रखने का उसका निर्णय अब भी लागू है। भारत का कहना है कि इस मामले के लिए तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय (सीओए) का गठन 'अवैध रूप से' किया गया था।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि अवैध रूप से गठित तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय ने 15 मई को अधिकतम जल ग्रहण क्षेत्र से संबंधित एक फैसला दिया है, जो सिंधु जल संधि की सामान्य व्याख्या के मुद्दों पर दिए गए फैसलों का पूरक है। उन्होंने कहा कि भारत इस तथाकथित फैसले को स्पष्ट रूप से खारिज करता है, ठीक उसी तरह जैसे उसने अवैध रूप से गठित मध्यस्थता न्यायालय के सभी पूर्व निर्णयों को दृढ़ता से खारिज किया है।
जायसवाल ने कहा, ’’इसके (मध्यस्थता न्यायालय) द्वारा जारी कोई भी कार्यवाही या निर्णय अमान्य है। सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का भारत का निर्णय बरकरार है। 22 अप्रैल, 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले के एक दिन बाद, भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कड़े निर्णय किए, जिनमें 1960 की सिंधु जल संधि को स्थगित करना भी शामिल है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने कहा कि तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) का गठन ही अवैध तरीके से किया गया था और भारत इसे कभी मान्यता नहीं देता। उन्होंने कहा कि 15 मई को इस अवैध रूप से गठित अदालत ने सिंधु जल संधि की व्याख्या और जल भंडारण क्षमता से जुड़े मुद्दों पर तथाकथित फैसला जारी किया है, जिसे भारत पूरी तरह अस्वीकार करता है। भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई सिंधु जल संधि को लेकर यह विवाद किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ा है, जिन पर पाकिस्तान ने आपत्ति जताई थी।
गौरतलब है कि 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कड़े कदम उठाए थे। इसी क्रम में भारत ने सिंधु जल संधि को भी “स्थगित” रखने का फैसला लिया था। भारत का कहना है कि सीमा पार आतंकवाद जारी रहने की स्थिति में सामान्य द्विपक्षीय व्यवस्थाएं प्रभावित होंगी।
