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मानसून 2026 पर आया बड़ा अपडेट; जुलाई के बाद घटेगी बारिश, El Nino दिखा सकता है असर

India Monsoon Forecast: इस साल मानसून को लेकर जो अनुमान सामने आए हैं, वे सामान्य से थोड़ी कम बारिश की ओर इशारा कर रहे हैं। अल-नीनो (El Nino) जैसे कारकों और बदलते जलवायु पैटर्न के चलते इस बार मानसून का प्रदर्शन संतुलित लेकिन चुनौतीपूर्ण रह सकता है।

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क्या मानसून में होगी कम बारिश?

India Monsoon Forecast: इस साल मानसून को लेकर एक अहम अनुमान सामने आया है। निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट वेदर के मुताबिक, 2026 में देशभर में मानसून की बारिश सामान्य से थोड़ी कम रह सकती है। एजेंसी ने अनुमान जताया है कि इस बार कुल वर्षा सामान्य औसत से करीब 6% कम हो सकती है। आमतौर पर जून से सितंबर के बीच मानसून सीजन में देश में औसतन 868.6 मिमी बारिश होती है।

लेकिन इस साल बारिश सामान्य के 94% तक सीमित रहने की संभावना जताई गई है, जिसे सामान्य से कम श्रेणी में रखा जाता है (90% से 95% के बीच)। पूर्वानुमान के अनुसार, जून महीने में बारिश सामान्य रह सकती है, लेकिन जुलाई से इसमें गिरावट शुरू हो जाएगी। अगस्त और सितंबर में मानसून कमजोर पड़ने के संकेत हैं, खासकर इन दो महीनों में वर्षा की कमी ज्यादा देखने को मिल सकती है। मध्य और पश्चिम भारत के कई अहम क्षेत्रों में कम बारिश होने की आशंका है। खासतौर पर अगस्त और सितंबर के दौरान मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है।

मानसून की रफ्तार धीमी होने संकेत

  • एलपीए के मुकाबले जून में 101% बारिश संभव है। इस महिने का एलपीए 165.3 mm है।
  • सितंबर में एलपीए के मुकाबले 89% बारिश का पूर्वानुमान है। एलपीए 167.9 mm है।
  • एलपीए के मुकाबले जुलाई में 95% बारिश होगी। इस माह एलपीए 280.5 mm है।
  • एलपीए के मुकाबले अगस्त में 92% बारिश संभव है। इस महीने का एलपीए 254.9 mm है।

किसे माना जाता है कमजोर मानसून?

इसका अर्थ यह है कि मौसम विभाग ने वर्ष 1971 से 2020 के आंकड़ों के आधार पर दक्षिण-पश्चिम मानसून की औसत वर्षा, यानी लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA), 87 सेंटीमीटर (870 मिमी) तय की है। अगर किसी साल मानसून के दौरान होने वाली बारिश इस औसत से अधिक रहती है, तो उसे सामान्य से ज्यादा वर्षा की श्रेणी में रखा जाता है। वहीं, जब बारिश इस निर्धारित स्तर से कम होती है, तो उसे कमजोर मानसून माना जाता है।

अल-नीनो विकसित होने की संभावना

मौसम एजेंसी स्काईमेट वेदर से जुड़े जतिन सिंह के अनुसार, मानसून की शुरुआत के समय अल-नीनो विकसित होने की संभावना है, जिससे बारिश पर नकारात्मक असर पड़ सकता है और मानसून कमजोर हो सकता है। हालांकि, यदि हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) मजबूत रहता है, तो यह अल-नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है। फिलहाल आईओडी के सामान्य या थोड़ा सकारात्मक रहने की उम्मीद जताई जा रही है। ऐसे में मानसून की शुरुआत संतोषजनक रह सकती है, लेकिन सीजन के बाद के महीनों में वर्षा कमजोर पड़ने की आशंका बनी हुई है।

अल नीनो और ला नीना

अल नीनो और ला नीना वैश्विक जलवायु के दो प्रमुख पैटर्न माने जाते हैं, जो समुद्री तापमान में बदलाव के कारण बनते हैं।

अल नीनो: इस स्थिति में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से लगभग 3 से 4 डिग्री तक बढ़ जाता है। यह प्रभाव औसतन हर कुछ वर्षों में देखने को मिलता है। इसके कारण जिन क्षेत्रों में सामान्यतः अधिक वर्षा होती है, वहां बारिश कम हो सकती है, जबकि कम वर्षा वाले इलाकों में अपेक्षाकृत ज्यादा बारिश होने लगती है।

ला नीना: इसके विपरीत, इस स्थिति में समुद्र का पानी सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है। इसका असर वैश्विक मौसम पर पड़ता है, जिससे बादल बनने की प्रक्रिया बढ़ती है और कई क्षेत्रों में अच्छी बारिश होने की संभावना रहती है।

पिछले साल दी थी मानसून ने पहले दस्तक

पिछले वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून ने सामान्य समय से पहले दस्तक दी थी। यह 24 मई को केरल पहुंच गया था, जो तय समय से करीब 8 दिन पहले था। ऐसा करीब 16 साल बाद देखने को मिला, इससे पहले 2009 में मानसून 23 मई को केरल पहुंचा था। मुंबई में बारिश लाने वाला सिस्टम भी तय समय से लगभग 16 दिन पहले सक्रिय हो गया था, जो 1950 के बाद सबसे जल्दी माना गया। आमतौर पर मानसून 1 जून तक केरल पहुंचता है, 11 जून के आसपास मुंबई तक पहुंचता है और 8 जुलाई तक पूरे देश में फैल जाता है।

वहीं इसकी वापसी उत्तर-पश्चिम भारत से 17 सितंबर के आसपास शुरू होती है और 15 अक्टूबर तक यह पूरी तरह लौट जाता है। पिछले साल मानसून के जल्दी आने के पीछे कई कारण रहे। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में नमी का स्तर अधिक था और समुद्र का तापमान भी सामान्य से ज्यादा रहा, जिससे मानसूनी हवाएं तेजी से सक्रिय हुईं। इसके अलावा, पश्चिमी हवाओं और चक्रवातीय गतिविधियों ने भी मानसून को आगे बढ़ने में मदद की। साथ ही, जलवायु परिवर्तन को भी मौसम के बदलते पैटर्न का एक अहम कारण बना था।

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Nilesh DwivedI
निलेश द्विवेदी author

निलेश द्विवेदी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में काम कर रहे हैं। वे शहरों से जुड़ी लोकल घटनाएं, क्राइम, राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यवार अप... और देखें

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