वृंदावन के प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी मंदिर में चढ़ावे और मंदिर निधि के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि मंदिर को दान में मिलने वाला हर एक पैसा दानपेटी या ऑनलाइन माध्यम के जरिए सीधे मंदिर के कोष में जमा होना चाहिए। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर सेवायतों या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से इस व्यवस्था में कोई बाधा पैदा की गई तो इसे बहुत गंभीरता से लिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर की प्रबंधन समिति को एक पारदर्शी व्यवस्था बनाने और धन के कथित दुरुपयोग या अन्य अनियमितताओं को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मंदिर के पैसों से जमीन या कोई अन्य संपत्ति खरीदने की योजना हो, तो सौदा पूरा करने से पहले उसकी जानकारी सुप्रीम कोर्ट के सामने रखनी होगी।
‘पहले भगवान के कोष में जाए दान, फिर मिलेगा हिस्सा’
सुनवाई के दौरान भगवान की तरफ से पेश हुए एक याचिकाकर्ता ने दावा किया कि भंडारियों के पास जो पैसा जाता है, वह कथित रूप से चढ़ावा नहीं बल्कि भोग के लिए मिलने वाली राशि है। वकील ने तर्क दिया कि सेवायतों का इस राशि पर एक तरह का अधिकार है, जिसे एक सिविल कोर्ट के फैसले में भी मान्यता दी गई है।
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इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भक्तों की ओर से दी जाने वाली राशि पहले देवता और मंदिर के कोष में जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि पहले दान देवता के नाम पर मंदिर को समर्पित होगा और इसके बाद भंडारी कर्तव्यों के तहत संबंधित लोगों को उनका वैधानिक हिस्सा मिल सकता है। अदालत ने कहा कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालु से मिलने वाली राशि को पहले ही अपने पास नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की, 'एक पुजारी को देवता की संपत्ति या धन पर ऐसा अधिकार नहीं हो सकता कि वह पहले ही उसे अपने कब्जे में ले ले।”
‘दान का हर पैसा दानपेटी या ऑनलाइन जमा हो’
इसके बाद CJI ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि दान का हर पैसा दानपेटियों या ऑनलाइन माध्यम से मंदिर के खजाने में आएगा।
अदालत ने कहा कि इस प्रक्रिया में सेवायतों या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बाधा डालने को गंभीरता से देखा जाएगा। साथ ही प्रबंधन समिति को निर्देश दिया गया कि वह
1. दान की व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करे,
2.किसी भी तरह की अनियमितता रोकने के लिए प्रभावी तंत्र बनाए,
3.मंदिर में आने वाले धन का उचित हिसाब-किताब सुनिश्चित करे।
मंदिर के पैसे से जमीन खरीदने पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने आरोप लगाया कि मंदिर निधि का इस्तेमाल ऐसे तरीकों से किया जा रहा है, जिन्हें वे उचित नहीं मानते। उन्होंने कहा कि मंदिर के पैसे से संपत्तियां खरीदी जा रही हैं और यह मौजूदा प्रबंधन समिति के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो सकता है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर निधि से संपत्ति खरीदने से जुड़े प्रस्तावित लेन-देन को सौदा अंतिम रूप से पूरा होने से पहले कोर्ट के संज्ञान में लाया जाए।
मंदिर के विकास के लिए पैसे कहां से आएंगे?
CJI ने सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठाया कि अगर मंदिर परिसर में विकास कार्य किए जाने हैं तो उनके लिए धन की व्यवस्था कैसे होगी। उदाहरण के तौर पर अदालत ने मेडिकल क्लिनिक जैसी सुविधाओं के निर्माण का जिक्र किया।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि मौजूदा समिति की भूमिका और अधिकारों को लेकर विवाद लंबित है और मंदिर निधि के इस्तेमाल की स्पष्ट सीमाएं तय होना जरूरी है।
दर्शन व्यवस्था और भगदड़ का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान मंदिर में भीड़ प्रबंधन और दर्शन की व्यवस्था का मुद्दा भी उठाया गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि पहले मंदिर में भगदड़ की घटना हो चुकी है और दर्शन को किसी टिकट या ऑनलाइन व्यवस्था के जरिए नियंत्रित करने का सुझाव दिया गया था। उनका कहना था कि ऐसी व्यवस्था से श्रद्धालुओं की सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन बेहतर हो सकता है। कोर्ट ने इस संबंध में जवाब दाखिल करने को कहा।
