Flu Se Fight: बुखार, खांसी और बदन दर्द शुरू होते ही एंटीबायोटिक लेना सही नहीं है। फ्लू वायरस के कारण होता है, जबकि एंटीबायोटिक बैक्टीरिया पर काम करती है। ऐसे में फ्लू का सही इलाज क्या है, एंटीवायरल दवा की जरूरत किसे पड़ सकती है और एंटीबायोटिक कब दी जाती है? पारस हेल्थ, गुरुग्राम में इंटरनल मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. आरआर दत्ता से समझें जरूरी बातें।
फ्लू का मौसम आते ही घरों में बुखार, खांसी और गले में दर्द के मामले बढ़ने लगते हैं। कुछ लोगों को इसके साथ तेज बदन दर्द, सिरदर्द और कमजोरी भी महसूस होती है। ऐसे में मरीज चाहता है कि कोई ऐसी दवा मिल जाए, जिससे तुरंत राहत मिल सके।
इसी जल्दबाजी में कई लोग पुरानी पर्ची निकाल लेते हैं। कोई घर में बची एंटीबायोटिक शुरू कर देता है तो कोई मेडिकल स्टोर से अपनी मर्जी से दवा ले आता है। लेकिन बुखार के हर मामले में एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं होती। फ्लू में तो यह वायरस को खत्म ही नहीं कर सकती।
डॉ. मानस चटर्जी, वरिष्ठ सलाहकार चिकित्सक, कैलाश अस्पताल, नोएडा का कहना है कि फ्लू, सामान्य वायरल इंफेक्शन और बैक्टीरियल इंफेक्शन के कुछ लक्षण एक जैसे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इनके कारण और इलाज अलग होते हैं। इसलिए सही दवा चुनने से पहले बीमारी का कारण समझना जरूरी है।
फ्लू क्या है और इसके सामान्य लक्षण क्या हैं
फ्लू यानी इन्फ्लुएंजा सांस से जुड़ा एक वायरल इंफेक्शन है। यह नाक, गले और कई बार फेफड़ों को भी प्रभावित कर सकता है। सामान्य सर्दी की तुलना में फ्लू के लक्षण अक्सर अचानक शुरू होते हैं और मरीज को ज्यादा कमजोर कर सकते हैं।
फ्लू में ये लक्षण दिखाई दे सकते हैं:
- अचानक बुखार या ठंड लगना
- सिरदर्द और बदन दर्द
- सूखी या लगातार खांसी
- गले में खराश
- नाक बहना या बंद होना
- बहुत अधिक थकान और कमजोरी
- भूख कम लगना
- बच्चों में कभी-कभी उल्टी या दस्त
हर मरीज में सभी लक्षण होना जरूरी नहीं है। कुछ लोगों को फ्लू होने पर बुखार भी नहीं आता। वहीं डेंगू, कोविड-19 या दूसरे वायरल इंफेक्शन में भी बुखार और बदन दर्द हो सकता है। इसलिए केवल लक्षण देखकर खुद बीमारी तय करना ठीक नहीं।
फ्लू में एंटीबायोटिक क्यों नहीं करती काम
डॉ. दत्ता बताते हैं कि फ्लू के मौसम में मरीज अक्सर ऐसी दवा चाहते हैं, जिससे बुखार, खांसी और बदन दर्द में जल्दी राहत मिल सके। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि इन्फ्लुएंजा वायरस के कारण होता है, जबकि एंटीबायोटिक का इस्तेमाल बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज के लिए किया जाता है। इसलिए एंटीबायोटिक फ्लू को ठीक नहीं कर सकती।
वायरस और बैक्टीरिया दो अलग तरह के सूक्ष्म जीव हैं। एंटीबायोटिक को बैक्टीरिया की बनावट या उसके बढ़ने की प्रक्रिया पर असर डालने के लिए बनाया जाता है। फ्लू वायरस की बनावट बैक्टीरिया जैसी नहीं होती। इसलिए एंटीबायोटिक के पास उस पर हमला करने का कोई प्रभावी तरीका नहीं होता।

फ्लू में एंटीबायोटिक देते हैं या नहीं
सामान्य वायरल फ्लू में एंटीबायोटिक लेने से:
- फ्लू वायरस खत्म नहीं होता
- बुखार जल्दी ठीक नहीं होता
- खांसी और बदन दर्द की अवधि कम नहीं होती
- संक्रमण दूसरे लोगों में फैलने से नहीं रुकता
- दवा के साइड इफेक्ट का खतरा बढ़ सकता है
फ्लू और बैक्टीरियल इंफेक्शन में क्या अंतर है
शुरुआत में दोनों के लक्षण एक जैसे लग सकते हैं। इसलिए केवल तेज बुखार, गले के दर्द या बलगम के रंग के आधार पर एंटीबायोटिक शुरू नहीं करनी चाहिए।
| स्थिति | कारण | सामान्य संकेत | इलाज का तरीका |
|---|---|---|---|
| फ्लू | इन्फ्लुएंजा वायरस | अचानक बुखार, बदन दर्द, खांसी, सिरदर्द और कमजोरी | आराम, हाइड्रेशन, लक्षणों का इलाज और जरूरत पर एंटीवायरल |
| सामान्य सर्दी | अलग-अलग वायरस | छींक, नाक बहना, हल्की खांसी और गले में खराश | आराम और लक्षणों के अनुसार इलाज |
| बैक्टीरियल इंफेक्शन | बैक्टीरिया | प्रभावित अंग के अनुसार अलग लक्षण | डॉक्टर की सलाह से एंटीबायोटिक |
| सेकेंडरी बैक्टीरियल इंफेक्शन | फ्लू के साथ या बाद में बैक्टीरिया का हमला | शुरुआती सुधार के बाद दोबारा बुखार या हालत बिगड़ना | जांच के आधार पर एंटीबायोटिक |
पीला या हरा बलगम दिखाई देना अकेले इस बात का पक्का प्रमाण नहीं है कि मरीज को बैक्टीरियल इंफेक्शन है। वायरल इंफेक्शन में भी बलगम का रंग बदल सकता है। सही अंतर मरीज की जांच, लक्षणों की अवधि और जरूरत पड़ने पर टेस्ट से किया जाता है।
फ्लू में कौन-सी दवा काम करती है
डॉ. मानस चटर्जी के अनुसार, ज्यादातर लोगों में बिना किसी जटिलता वाले फ्लू का इलाज पर्याप्त आराम, पानी और दूसरे तरल पदार्थों के सेवन तथा लक्षणों को नियंत्रित करने पर केंद्रित होता है।
फ्लू के हर मरीज के लिए एक ही दवा नहीं होती। डॉक्टर मरीज की उम्र, लक्षणों की गंभीरता, बीमारी शुरू होने का समय और पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं को देखकर इलाज तय करते हैं।
बुखार और बदन दर्द का इलाज
डॉक्टर बुखार और दर्द कम करने के लिए मरीज की उम्र, वजन तथा स्वास्थ्य के अनुसार दवा बता सकते हैं। पैरासिटामोल सामान्य रूप से इस्तेमाल की जाती है, लेकिन इसकी खुराक निर्धारित सीमा में ही होनी चाहिए।
कई कोल्ड और फ्लू कॉम्बिनेशन दवाओं में पहले से पैरासिटामोल मौजूद होती है। इनके साथ अलग से पैरासिटामोल लेने पर अनजाने में डबल डोज हो सकती है। अधिक मात्रा लिवर के लिए नुकसानदायक हो सकती है।
एंटीवायरल दवा किसे दी जाती है
फ्लू के इलाज में एंटीवायरल दवाओं की भूमिका एंटीबायोटिक से अलग होती है। ये दवाएं वायरस को शरीर में बढ़ने से रोकने में मदद कर सकती हैं।
डॉ. दत्ता बताते हैं कि डॉक्टर उन मरीजों के लिए एंटीवायरल दवा पर विचार कर सकते हैं:
- जिनके लक्षण गंभीर हों
- जो अस्पताल में भर्ती हों
- जिनमें फ्लू की जटिलताएं होने का खतरा अधिक हो
- जिनकी इम्युनिटी कमजोर हो
- जिन्हें पहले से कोई गंभीर या पुरानी बीमारी हो
एंटीवायरल दवा का फायदा अक्सर बीमारी की शुरुआत में लेने पर अधिक होता है। इसलिए हाई रिस्क मरीजों के लिए शुरुआती मेडिकल सलाह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हालांकि एंटीवायरल भी अपने मन से शुरू नहीं करनी चाहिए। किस मरीज को इसकी जरूरत है और कितने दिन लेनी है, यह डॉक्टर तय करते हैं।
खांसी और बंद नाक की दवा
सूखी खांसी, बलगम वाली खांसी और एलर्जी के कारण होने वाली खांसी का इलाज अलग हो सकता है। इसी तरह नाक बंद होने पर इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं ब्लड प्रेशर या दिल की धड़कन बढ़ा सकती हैं।
हाई बीपी, हृदय रोग, थायरॉइड, ग्लूकोमा या दूसरी पुरानी बीमारी वाले मरीजों को बिना सलाह के कफ सिरप या कोल्ड मेडिसिन नहीं लेनी चाहिए। कुछ दवाओं से नींद, चक्कर या बेचैनी भी हो सकती है।
फ्लू में एंटीबायोटिक कब दी जा सकती है
एंटीबायोटिक फ्लू वायरस का इलाज नहीं करती, लेकिन फ्लू के साथ या उसके बाद बैक्टीरियल इंफेक्शन हो सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर मरीज की जांच के बाद एंटीबायोटिक दे सकते हैं।
डॉ. मानस चटर्जी के मुताबिक, यदि क्लिनिकल जांच में बैक्टीरियल रेस्पिरेटरी इंफेक्शन के संकेत मिलते हैं तो डॉक्टर उपयुक्त एंटीबायोटिक लिख सकते हैं। कौन-सी दवा दी जाएगी और इलाज कितने दिनों तक चलेगा, यह इंफेक्शन के प्रकार, उसकी गंभीरता और मरीज की पूरी स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।
इन स्थितियों में सेकेंडरी बैक्टीरियल इंफेक्शन की आशंका हो सकती है:
- शुरुआती सुधार के बाद बुखार दोबारा लौट आए
- खांसी अचानक ज्यादा बढ़ जाए
- सांस लेने में परेशानी होने लगे
- सीने में दर्द महसूस हो
- बैक्टीरियल निमोनिया की आशंका हो
- कान में तेज दर्द या डिस्चार्ज हो
- जांच में बैक्टीरियल इंफेक्शन के संकेत मिलें
ऐसे मामलों में एंटीबायोटिक फ्लू को नहीं, बल्कि उसके साथ हुए बैक्टीरियल इंफेक्शन को ठीक करने के लिए दी जाती है।

फ्लू होने पर खुद से दवाइयां लेने से क्यों बचें
डॉक्टर सेल्फ मेडिकेशन से क्यों मना करते हैं
सेल्फ मेडिकेशन केवल बिना पर्चे के एंटीबायोटिक लेना नहीं है। घर में बची दवा इस्तेमाल करना, किसी दूसरे मरीज की पर्ची दोहराना, दो कॉम्बिनेशन दवाएं एक साथ लेना या अपनी मर्जी से खुराक बदलना भी इसी में आता है।
गलत बीमारी का इलाज शुरू हो सकता है
फ्लू, डेंगू, कोविड-19 और दूसरे वायरल इंफेक्शन की शुरुआत बुखार, सिरदर्द और बदन दर्द से हो सकती है। अपनी मर्जी से दवा लेने पर असली बीमारी की पहचान और सही इलाज में देरी हो सकती है।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस बढ़ सकता है
अनावश्यक एंटीबायोटिक लेने से बैक्टीरिया उस दवा का मुकाबला करना सीख सकते हैं। भविष्य में जब वास्तव में बैक्टीरियल इंफेक्शन हो, तब वही एंटीबायोटिक असर नहीं करती। इसे एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस कहा जाता है।
डॉ. दत्ता सलाह देते हैं कि फ्लू के लक्षणों में बची हुई एंटीबायोटिक इस्तेमाल न करें और न ही किसी दूसरे व्यक्ति को लिखी गई दवा लें। एंटीबायोटिक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल जरूरी है, ताकि इन दवाओं को उन्हीं संक्रमणों के लिए बचाया जा सके जिनमें वास्तव में इनकी जरूरत है।
दवा की डबल डोज हो सकती है
कई फ्लू और कोल्ड मेडिसिन में एक से ज्यादा दवाएं मिली होती हैं। मरीज इनके साथ वही दवा अलग से भी ले सकता है। इससे डबल डोज, ज्यादा नींद, चक्कर, ब्लड प्रेशर बढ़ने या लिवर पर असर पड़ने का खतरा हो सकता है।
पुरानी बीमारियों पर असर पड़ सकता है
डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, किडनी या लिवर की बीमारी वाले मरीज पहले से कई दवाएं ले सकते हैं। फ्लू की कोई दवा उनके नियमित इलाज के साथ प्रतिक्रिया कर सकती है। इसलिए उनके लिए डॉक्टर की सलाह और भी जरूरी हो जाती है।
किन मरीजों को फ्लू में जल्दी डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए
इन लोगों में फ्लू के गंभीर होने का खतरा अधिक हो सकता है:
- पांच वर्ष से छोटे बच्चे
- 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोग
- गर्भवती महिलाएं
- अस्थमा या फेफड़ों की पुरानी बीमारी वाले मरीज
- हृदय रोग, डायबिटीज या किडनी रोग वाले लोग
- कमजोर इम्युनिटी वाले मरीज
- गंभीर मोटापे से जूझ रहे लोग
- लंबे समय से किसी गंभीर बीमारी का इलाज करा रहे मरीज
इन मरीजों को बुखार बढ़ने या सांस की परेशानी होने का इंतजार नहीं करना चाहिए। शुरुआती लक्षणों पर डॉक्टर से संपर्क करना बेहतर रहता है।
फ्लू के किन लक्षणों में तुरंत मेडिकल मदद लें
डॉ. दत्ता के अनुसार, यदि फ्लू के लक्षण गंभीर हो जाएं, शुरुआती सुधार के बाद दोबारा बढ़ने लगें या मरीज को सांस लेने में कठिनाई हो तो तुरंत मेडिकल सहायता लेनी चाहिए।
इन चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज न करें:
- सांस लेने में परेशानी
- सीने में दर्द या दबाव
- ऑक्सीजन का स्तर कम होना
- बहुत ज्यादा सुस्ती या भ्रम
- लगातार उल्टी या पानी न पी पाना
- पेशाब बहुत कम होना
- दौरा पड़ना
- होंठ या चेहरा नीला पड़ना
- बुखार या खांसी ठीक होकर फिर तेजी से बढ़ना
- बच्चे का सामान्य प्रतिक्रिया न देना
फ्लू में ‘तेज दवा’ नहीं, सही दवा है जरूरी
फ्लू में इलाज का मतलब हर बार एंटीबायोटिक लेना नहीं है। हल्के और बिना जटिलता वाले मामलों में आराम, पर्याप्त पानी और लक्षणों का सही इलाज काफी हो सकता है। गंभीर, अस्पताल में भर्ती या हाई रिस्क मरीजों को डॉक्टर एंटीवायरल दवा दे सकते हैं। एंटीबायोटिक तभी उपयोगी होती है, जब फ्लू के साथ बैक्टीरियल इंफेक्शन भी मौजूद हो।
इसलिए बुखार और खांसी शुरू होते ही पुरानी पर्ची न दोहराएं। बची हुई एंटीबायोटिक न लें और किसी परिचित की दवा इस्तेमाल न करें। बीमारी की सही पहचान और समय पर डॉक्टर की सलाह ही फ्लू से सुरक्षित तरीके से लड़ने का सबसे बेहतर रास्ता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी और विशेषज्ञ की सलाह पर आधारित है। किसी दवा को शुरू करने, बदलने या बंद करने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श करें।
