ओबीसी क्रीमी लेयर तय करने के नियमों को लेकर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची है। केंद्र ने शीर्ष अदालत से 11 मार्च के उस फैसले पर स्पष्टीकरण और उचित निर्देश देने की मांग की है, जिसमें सिविल सेवा परीक्षा में चयनित करीब 100 OBC उम्मीदवारों के दावों पर दोबारा विचार करने को कहा गया था। सुप्रीम कोर्ट केंद्र की इस याचिका पर 1 सितम्बर को सुनवाई कर सकता है। आज केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आज मुख्य न्यायाधीश के सामने इस मामले की जल्द सुनवाई के लिए बेंच के गठन की मांग की।
सरकार का कहना है कि 11 मार्च का फैसला CSE-2025 का अंतिम परिणाम घोषित होने के पांच दिन बाद आया। ऐसे में इस फैसले को पुरानी और लगभग पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया पर सीधे लागू करने से गंभीर प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
CSE-2025 को लेकर केंद्र की सबसे बड़ी चिंता
केंद्र सरकार ने अपनी अर्जी में साफ कहा है कि उसकी मौजूदा मांग मुख्य रूप से CSE-2025 की चयन प्रक्रिया से जुड़ी है। इस परीक्षा की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले काफी हद तक पूरी हो चुकी थी और अब सेवा आवंटन के अंतिम चरण में है।
सरकार ने चेतावनी दी है कि अगर कैटेगरी-वाइज मेरिट और सेवा आवंटन सूची को दोबारा बदलना पड़ा तो इसका असर सिर्फ उम्मीदवारों की रैंकिंग पर ही नहीं पड़ेगा। इस आदेश से:
1. IAS और IPS अधिकारियों का कैडर आवंटन प्रभावित हो सकता है।
2. मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी समेत विभिन्न प्रशिक्षण अकादमियों का ट्रेनिंग शेड्यूल बदल सकता है।
3.बैच की संख्या और लॉजिस्टिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
4. बाद की भर्ती प्रक्रियाओं के मुकाबले बैच की सीनियरिटी और वेतन निर्धारण का मुद्दा भी उठ सकता है। यह अर्जी ऐसे समय आई है, जब CSE-2025 बैच का फाउंडेशन कोर्स इस सप्ताह शुरू होने की संभावना है।
केंद्र का तर्क: नए नियम को पीछे की तारीख से लागू करने पर 'विसंगति'
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि 11 मार्च के फैसले को CSE-2025 की पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया पर बिना किसी शर्त के पीछे की तारीख से लागू करना एक असामान्य स्थिति पैदा कर सकता है। केंद्र का तर्क है कि इससे एक ही परीक्षा चक्र के उम्मीदवारों के बीच असमानता की स्थिति बन सकती है। दूसरे शब्दों में, सरकार की चिंता है कि पहले से तय हो चुकी मेरिट और चयन प्रक्रिया में बाद में नया मानदंड लागू करने से उसी परीक्षा के अलग-अलग उम्मीदवारों के साथ अलग व्यवहार होने का आरोप लग सकता है।
क्या केंद्र सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने से पीछे हट रहा है?
दिलचस्प बात यह है कि सरकार की अर्जी ऐसे समय आई है, जब DoPT प्रभावित उम्मीदवारों के दस्तावेजों का सत्यापन पूरा कर चुका था और सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने की तैयारी कर रही थी। इससे यह संकेत मिलता है कि विवाद फैसले के मूल सिद्धांत से ज्यादा उसके लागू होने के समय और दायरे को लेकर है। केंद्र फिलहाल खासतौर पर CSE-2025 की लगभग पूरी हो चुकी प्रक्रिया के संबंध में स्पष्टीकरण चाहता है। अर्जी में आने वाले बैचों पर फैसले के लागू होने को लेकर कोई स्पष्ट मांग नहीं की गई है। यानी केंद्र सरकार इसे बाद के आने वाले बैच पर लागू करने की मांग नहीं कर रही है।
आखिर 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को OBC क्रीमी लेयर तय करने के लिए सिर्फ माता-पिता की सैलरी या आय को आधार बनाने पर सवाल उठाया था। मामले की सुनवाई जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच कर रही थी। अदालत ने कहा कि समान सामाजिक स्थिति वाले OBC उम्मीदवारों के बीच कृत्रिम अंतर नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि PSU या निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों को सिर्फ माता-पिता की सैलरी के आधार पर OBC आरक्षण से बाहर करना, जबकि समान स्तर के सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए नौकरी के पद और स्तर को देखा जाता है, समान स्थिति वाले लोगों के साथ असमान व्यवहार हो सकता है।
अदालत ने कहा था कि माता-पिता के पद की प्रकृति जैसे ग्रुप A, B, C या D को नजरअंदाज कर केवल सैलरी के आधार पर फैसला करना समानता के संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़ा सवाल पैदा करता है।
