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इकोनॉमी का कैंसर मिलावट और नकली सामान, देश को लग रहा करीब 5 लाख करोड़ का चूना

मिलावटी और नकली सामान देश की इकोनॉमी के लिए कैंसर से कम नहीं। इसकी वजह से इकोनॉमी को 5 लाख करोड़ का नुकसान हो रहा है। इसके अलावा यह रोजगार के अवसरों को भी खत्म कर रहा है।

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इकोनॉमी के लिए कैंसर
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Aug 25, 2026, 15:55 IST
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Cancer of The Economy : भारत में मिलावट, नकली सामान, तस्करी और फर्जी बिलिंग को अब सिर्फ ग्राहक के साथ धोखाधड़ी या टैक्स चोरी की समस्या मानना बड़ी भूल होगी। यह एक समानांतर अर्थव्यवस्था है, जो असली कंपनियों की बिक्री छीनती है, सरकार का राजस्व घटाती है, रोजगार पर चोट करती है और कई मामलों में लोगों की जान तक खतरे में डालती है। उपलब्ध आंकड़ों और तार्किक लागत अनुमानों को मिलाकर देखें तो इस पूरे अवैध इकोसिस्टम से भारत पर करीब 5 लाख करोड़ रुपये सालाना का आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

₹8 लाख करोड़ का अवैध बाजार

5 प्रमुख सेक्टर FMCG, पैकेज्ड फूड, पर्सनल और घरेलू उत्पाद, शराब, तंबाकू तथा टेक्सटाइल-अपरैल में 2022-23 के दौरान अवैध बाजार का आकार करीब ₹7,97,726 करोड़, यानी लगभग ₹8 लाख करोड़ आंका गया है। यह अनुमान FICCI जैसे संस्थानों की तरफ से किए गए अध्ययनों पर आधरित है। मोटे तौर पर यह उस कारोबार का अनुमान है, जो वैध चैनल से बाहर हो रहा है। इसका एक हिस्सा टैक्स बचाता है, एक हिस्सा असली कंपनियों की बिक्री को काटता है और एक हिस्सा सप्लाई चेन में अवैध कमाई पैदा करता है। उपलब्ध अध्ययनों के मुताबिक, 5 प्रमुख क्षेत्रों में अवैध कारोबार से ₹58,521 करोड़ सालाना टैक्स नुकसान का अनुमान है।

तस्करी और फर्जी बिलिंग से अलग झटका

नकली सामान के साथ तस्करी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दूसरा बड़ा रिसाव है। 5 प्रमुख सेक्टरों से जुड़े आकलन में तस्करी से ₹1,17,253 करोड़ के आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाया गया है। यानी सिर्फ टैक्स और तस्करी को देखें तो ही करीब ₹1.76 लाख करोड़ का आर्थिक नुकसान सामने आता है। इसके बाद आता है ट्रेड मिस-इनवॉयसिंग का खेल शुरू होता है। आयात-निर्यात के बिल में सामान की कीमत को जानबूझकर कम या ज्यादा दिखाकर पैसे और टैक्स की वास्तविक देनदारी को बदला जाता है।

नौकरी से लेकर निवेश तक असर

अवैध कारोबार की सबसे बड़ी छिपी हुई लागत रोजगार है। 5 प्रमुख सेक्टरों में तस्करी की वजह से करीब 5.01 लाख प्रत्यक्ष रोजगार प्रभावित हुए। जब सप्लायर, परिवहन, कच्चा माल और दूसरे जुड़े कारोबारों के असर को शामिल किया गया तो कुल रोजगार अवसरों का नुकसान करीब 16.36 लाख तक पहुंच गया। इसे केवल नौकरी की संख्या से नहीं समझना चाहिए। एक कर्मचारी की नौकरी जाने का असर उसके परिवार के खर्च, स्थानीय दुकानों की बिक्री, परिवहन, मकान किराया और दूसरे आर्थिक कारोबार पर भी पड़ता है। यदि प्रत्येक प्रभावित रोजगार के पीछे औसतन ₹5 लाख सालाना आर्थिक योगदान मानें, तो रोजगार का यह नुकसान अकेले करीब ₹82,000 करोड़ के आर्थिक बोझ में बदल सकता है।

नकली सामान से देश परेशान

नकली सामान से देश परेशान

नकली पार्ट्स की कीमत जान पर भारी

ऑटोमोबाइल सेक्टर में नकली सामान आर्थिक नुकसान से आगे बढ़कर सीधे जीवन का सवाल बन जाता है। उद्योग से जुड़े आकलनों के मुताबिक, भारत के ऑटो आफ्टरमार्केट में नकली पार्ट्स की हिस्सेदारी 30 से 40 फीसदी तक हो सकती है और इस बाजार का आकार करीब ₹22,000 करोड़ से ₹35,000 करोड़ आंका गया है। नकली ब्रेक पैड, क्लच, स्टीयरिंग पार्ट्स, बेयरिंग और दूसरे सुरक्षा से जुड़े कंपोनेंट खराब होने पर हादसों का खतरा बढ़ाते हैं। कुछ उद्योग अध्ययनों में नकली ऑटो पार्ट्स को सालाना करीब 25,400 मौतों और 93,000 गंभीर चोटों से जोड़ा गया है। इन मौतों की आर्थिक कीमत निकालना आसान नहीं है। फिर भी आर्थिक मॉडलिंग के लिए प्रति जीवन ₹1 करोड़ की औसत सामाजिक-आर्थिक कीमत और प्रति गंभीर चोट ₹5 लाख की लागत मानें तो सिर्फ मौत और चोट से करीब ₹30,000 करोड़ का अनुमानित आर्थिक बोझ बनता है।

दवा और खाने की मिलावट का बिल

नकली दवाओं की कीमत कई बार मरीज की जिंदगी होती है। गलत सक्रिय घटक, गलत मात्रा या घटिया सामग्री वाली दवा इलाज को विफल कर सकती है। नकली एंटीबायोटिक का एक और खतरा है। बाजार में नकली उत्पादों की हिस्सेदारी 27 से 28 फीसदी तक है और करीब 27 फीसदी शहरी उपभोक्ताओं ने किसी न किसी स्तर पर नकली FMCG सामान का सामना किया है। चूंकि स्वास्थ्य नुकसान का कोई एक समेकित राष्ट्रीय आर्थिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लिहाजा डेटा मॉडल में प्रत्यक्ष मापे गए नुकसान के ऊपर करीब ₹35,000 करोड़ का स्वास्थ्य बोझ माना जा सकता है।

किसान भी नहीं बचा

नकली बाजार का असर खेत तक पहुंच चुका है। करीब 35 फीसदी किसानों को नकली कृषि उत्पादों का सामना करना पड़ा है और लगभग 30 फीसदी कृषि इनपुट के नकली या घटिया होने का अनुमान है। नकली बीज से फसल खराब हो रही हैं। घटिया कीटनाशक से उत्पादन प्रभावित हो रहा है।

डिजिटल बाजार में गंभीर चुनौती

नकली सामान की सप्लाई अब सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है। ऑनलाइन एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म भी इसका बड़ा माध्यम बन चुके हैं। ग्राहकों तक पहुंचने वाले नकली सामान में 53 फीसदी तक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिये पहुंचती है। इसके अलावा सोशल मीडिया विज्ञापन के जरिये भी नकली उत्पादों की खुलेआम बिक्री होती है।

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