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Chandrayaan-2 से सस्ता कैसे रहा Chandrayaan-3, ISRO ने इस मून मिशन में लगाया कौन सा जुगाड़?

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Jul 15, 2023, 09:10 AM IST

Chandrayaan-3: भारत ने चंद्रयान-3 को 615 करोड़ रुपये में तैयार किया है। यह कीमत 2019 में चांद पर भेजे गए चंद्रयान-2 से करीब 30 प्रतिशत कम है। ऐसे में जानते हैं इसरो के दोनों मून मिशन की कीमत में कितना अंतर था, भारत ने पहले मुकाबले सस्ता चंद्रयान-3 कैसे तैयार कर लिया, दोनों में क्या अंतर है?

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Chandrayaan-3

Photo : BCCL

Chandrayaan-3: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने शुक्रवार को अपने बहुप्रतीक्षित चंद्रयान-3 को लॉन्च कर दिया। श्रीहरिकोट स्थिति सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से इसने उड़ान भरी और प्रक्षेपण से ठीक 16 मिनट बाद चंद्रयान-3 रॉकेट से अलग हो गया। मिशन मून के तहत चांद पर भेजा गया चंद्रयान-3 पांच अगस्त को चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश करेगा और 23 या 24 अगस्त को इसके चंद्रमा पर लैंड करने की संभावना है।

अगर भारत चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग में कामयाब हो जाता है, तो भारत ऐसा करने वाला दुनिया में चौथा देश हो जाएगा। अभी तक सिर्फ अमेरिका, चीन और रूस ही ऐसा करने में कामयाब रहे हैं। चंद्रयान की सॉफ्ट लैंडिंग के बाद चंद्रयान चांद पर पानी व अन्य खनिज की खोज करेगा। बता दें, भारत ने चंद्रयान-3 को 615 करोड़ रुपये में तैयार किया है। यह कीमत 2019 में चांद पर भेजे गए चंद्रयान-2 से करीब 30 प्रतिशत कम है। ऐसे में जानते हैं इसरो के दोनों मून मिशन की कीमत में कितना अंतर था, भारत ने पहले मुकाबले सस्ता चंद्रयान-3 कैसे तैयार कर लिया, दोनों में क्या अंतर है?

चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 की कीमत में अंतर

चंद्रयान-2 मिशन की लागत 978 करोड़ रुपये थी, जिसमें ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर, नेविगेशन और ग्राउंड सपोर्ट नेटवर्क के लिए 603 करोड़ रुपये और जियो-स्टेशनरी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल के लिए 375 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। जबकि, इसरो ने अपने तीसरे मून मिशन चंद्रयान-3 को इससे 30 प्रतिशत कम कीमत यानी सिर्फ 615 करोड़ रुपये में तैयार किया है। इसमें लैंडर रोवर और प्रोपल्शन मॉड्यूल की कीमत करीब 250 करोड़ और लॉन्च सर्विस व अन्य खर्चे 365 करोड़ रुपये हैं।

कैसे तैयार हुआ इतना सस्ता चंद्रयान-3

चंद्रयान-2 जब लॉन्च हुआ था , तो कहा गया था कि इसकी कीमत एक हॉलीवुड फिल्म के बजट से भी कम है। हालांकि, चंद्रयान-3 की कीमत उससे भी कम यानी राजामौली की फिल्मों के बजट से भी कम है। जानकारी के मुताबिक, जब चंद्रयान-2 को भेजा गया था तो उसके तीन हिस्से थे, जिसमें ऑर्बिटर, लैंडर ओर रोवर शामिल था। चंद्रयान- 2 के ऑर्बिटर ने सफलता पूर्वक अपना काम किया था और वह अब भी चांद की कक्षा में घूम रहा है। इसी कारण चंद्रयान-3 में ऑर्बिटर का प्रयोग नहीं किया गया। इससे इसकी लागत कम आई।

चांद पर क्या खोजेगा चंद्रयान-3

चंद्रयान- 3 जांच पर पानी व अन्य खनिजों की तलाश करने गया है। चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद 23 या 25 अगस्त को यह चंद्रमा की सतह पर लैंड करेगा। चंद्रयान से एक रोवर निकलेगा, जो चांद की सतह पर उतरेगा। इसके बाद यह चांद के लैंडिंग वाले हिस्से में खनिज व पानी की खोज करेगा।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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