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'मंदिरों का स्वामित्व और प्रबंधन राज्य के हाथ में नहीं हो सकता', सबरीमाला मामले में SC के समक्ष जैन समुदाय की दलील

सबरीमाला मामले से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की बेंच के सामने जैन समुदाय ने महत्वपूर्ण दलीलें रखीं।

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

Sabarimala Row: सबरीमाला मामले से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की बेंच के सामने जैन समुदाय ने महत्वपूर्ण दलीलें रखीं। गीतार्थ गंगा की ओर से पेश इन दलीलों में कहा गया कि मंदिर और धार्मिक संस्थाएं किसी भी तरह से एक सेक्युलर स्टेट के स्वामित्व या नियंत्रण में नहीं आ सकती हैं।

जैन समुदाय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्णन वेणुगोपाल ने अदालत में पक्ष रखा। यह कानूनी दलीलें जैनाचार्य युगभूषणसूरीजी के मार्गदर्शन में दी गई।

'धार्मिक संस्थाएं, धर्म का अभिन्न हिस्सा'

जैन समुदाय ने अपनी दलीलों में कहा कि मंदिर, देसर, मठ और अन्य धार्मिक संस्थाएं केवल ढांचे नहीं हैं, बल्कि वे धर्म का आंतरिक और अभिन्न हिस्सा हैं। इन संस्थाओं का संचालन, परंपराएं और धार्मिक गतिविधियां सभी धर्म की मान्यताओं से सीधे जुड़ी होती हैं।

पवित्र स्थलों की दो श्रेणियां बताईं

दलीलों में पूजा स्थलों को दो हिस्सों में बांटा गया:

  • पहला प्राकृतिक पवित्र स्थल जिसमें पर्वत, नदियां, जंगल, पहाड़ आते हैं जिन्हें बिना किसी मानव निर्माण के पवित्र माना जाता है।
  • दूसरा मानव निर्मित धार्मिक स्थल जिसमें मंदिर, देसर, मठ आदि हैं जो धार्मिक आचरण के लिए बनाए गए। जैन पक्ष ने कहा कि दोनों ही प्रकार के स्थलों की पवित्रता धर्म से आती है, न कि किसी प्रशासनिक व्यवस्था से।

'मंदिर केवल संपत्ति नहीं, आस्था का जीवंत केंद्र'

अदालत के समक्ष यह तर्क रखा गया कि मंदिरों को केवल भौतिक संपत्ति या सार्वजनिक सुविधा के रूप में नहीं देखा जा सकता है, वे 'लिविंग इंस्टीट्यूशन ऑफ फेथ' हैं। इनका प्रबंधन धार्मिक सिद्धांतों और परंपराओं के अनुसार ही होना चाहिए।

राज्य का नियंत्रण धार्मिक स्वायत्तता के खिलाफ

जैन समुदाय ने कहा कि जब राज्य मंदिरों का नियंत्रण अपने हाथ में लेता है तो वह धार्मिक प्राधिकरण को दरकिनार कर देता है। इससे धार्मिक परंपराओं का संचालन बाहरी हाथों में चला जाता है और धर्म की स्वायत्तता प्रभावित होती है।

संविधान की सीमाएं भी रेखांकित की

दलीलों में यह भी कहा गया कि संविधान राज्य को सीमित दायरे में हस्तक्षेप की अनुमति देता है। लेकिन यह अधिकार 'पूर्ण नियंत्रण' या 'प्रबंधन' तक नहीं जाता। राज्य की भूमिका केवल व्यवस्था और कानून सुनिश्चित करने तक सीमित होनी चाहिए, न कि धार्मिक संस्थाओं का संचालन करने तक।

सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या है मूल सवाल?

इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट के सामने अहम प्रश्न यह है कि क्या एक धर्मनिरपेक्ष राज्य मंदिरों या पवित्र स्थलों का स्वामित्व या प्रबंधन कर सकता है, या यह अधिकार पूरी तरह संबंधित धर्म और उसके अनुयायियों के पास ही रहना चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ कर रही इन मुद्दों पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ वर्तमान में सबरीमाला पुनर्विचार मामले से जुड़े व्यापक संवैधानिक सवालों पर सुनवाई कर रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली यह पीठ 7 अप्रैल से इस मामले की रोजाना सुनवाई कर रही है और अब तक 8 दिनों की सुनवाई हो चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट यह तय कर रही है कि क्या किसी धार्मिक संप्रदाय के रीति-रिवाजों को 'समानता के अधिकार' जो कि अनुच्छेद 14 में निहित हैं, उसके आधार पर बदला जा सकता है। इसके साथ ही अदालत इस सिद्धांत की भी व्याख्या कर रही है कि कौन सी प्रथाएं धर्म का अनिवार्य हिस्सा हैं और क्या न्यायपालिका इनमें हस्तक्षेप कर सकती है।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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