दिल्ली शराब नीति घोटाले की सुनवाई किसी और जज से करवाने की मांग वाली केजरीवाल के हलफनामे पर सीबीआई ने आपत्ति जताई है। सीबीआई ने कहा है कि 14.04.2026 का हलफनामा देर से और सुनवाई पूरी होने के बाद दाखिल किया गया है। इसके अलावा, यह हलफनामा केजरीवाल ने बाद में सोची समझी रणनीति के तहत फाइल किया है, जिसका उद्देश्य न्यायालय और व्यक्तियों को बदनाम करना है। साथ ही सीबीआई ने यह भी दलील दी है कि जब सभी पक्षों की बहस पूरी हो चुकी थी और फैसला सुरक्षित हो चुका था,तब ऐसा हलफनामा दाखिल करना प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
केजरीवाल को पहले से जानकारी होने का दावा
सीबीआई ने अपनी दलीलों में यह भी कहा है कि केजरीवाल को हलफनामे में बताए गए तथ्यों की जानकारी पहले से ही थी। यही वजह है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से जुड़ी जानकारी को लेकर सूचना का अधिकार का उपयोग भी उनके निर्देश पर किया गया। सीबीआई ने आपत्ति उठाते हुए कहा कि सुनवाई के दौरान उन्होंने यह मुद्दे नहीं उठाए, जिससे उनकी मंशा संदिग्ध प्रतीत होती है।सुनवाई की टाइमलाइन को लेकर उठाए गए प्रश्न
सीबीआई ने दलील दी कि 13 अप्रैल को ही कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उसी दिन सुनवाई पूरी होगी। केजरीवाल ने अपनी दलीलें पूरी कर कोर्ट से चले गए,यह जानते हुए कि मामला समाप्त हो चुका है। इसके बाद हलफनामा दाखिल करना जबरदस्ती की कोशिश है।
जज हटाने की मांग पर सीबीआई की आपत्तियां
सीबीआई ने कहा कि यदि जज हटाने के लिए ऐसे आधार स्वीकार किए गए,तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। अगर ऐसा हुआ तो किसी भी जज के रिश्तेदार सरकारी पैनल में होने पर वह जज केस नहीं सुन पाएंगे। यही नहीं जिन जजों ने पहले किसी मामले में प्रारंभिक राय दी हो, वे आगे सुनवाई नहीं कर सकेंगे।ऐसे में केवल अनुमानित पक्षपात के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो जाएगी।इससे पूरे न्यायिक तंत्र में अराजक स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
न्यायपालिका की संस्थागत अखंडता पर खतरा
आरोप लगाया गया कि यह पूरा प्रयास न्यायपालिका पर दबाव बनाने और बदनाम करने की रणनीति है। सीबीआई ने आरोप लगाया कि बेतरतीब आरोप और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर जजों को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। सीबीआई ने ये भी कहा कि यदि इसे रोका नहीं गया तो यह पूरे देश में एक खतरनाक ट्रेंड बन सकता है।
सोशल मीडिया और इको सिस्टम का आरोप
सीबीआई ने आरोप लगाया कि जज को लेकर 9 अप्रैल से एक संगठित ऑनलाइन अभियान चलाया गया। यही नहीं RTI से मिली जानकारी को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। सुनवाई से पहले ट्वीट और री-ट्वीट के जरिए अदालत पर दबाव बनाने का प्रयास किया गया।
RTI डेटा की गलत व्याख्या पर दलील
सीबीआई ने कहा कि डॉकेट की संख्या को मुकदमों की संख्या बताना गलत है। सीबीआई ने सफाई देते हुए कहा कि एक केस में कई बार लिस्टिंग होने पर कई डॉकेट बनते हैं। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के बच्चे जो पैनल के वकील हैं वो केवल सहायक होते हैं, मुख्य बहस अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल या एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ही करते हैं। जिन वकीलों को लेकर आरोप है वो वकील पहले से ही यानि 2022 से ही पैनल में हैं, हाल में नियुक्त नहीं हुए। उनका इस केस से कोई संबंध या भूमिका नहीं रही।सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं को लेकर सीबीआई के आरोप
केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल कीं, लेकिन उन्हें सुनवाई के लिए आगे नहीं बढ़ाया गया। जज बदलने की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाना और फिर उस पर सुनवाई के लिए कोशिश न करना केवल दबाव बनाने की रणनीति थी।
सीबीआई ने केजरीवाल पर झूठा बयान देने का आरोप
6 अप्रैल को कोर्ट में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट की याचिका वापस ले ली गई है। जबकि वास्तव में वह 15 अप्रैल को वापस ली गई। CBI ने ये भी दावा किया है कि निचली अदालत का डिस्चार्ज आदेश कमजोर और अवैध है। इसलिए मामले को मेरिट पर सुनने से बचने के लिए रणनीति अपनाई जा रही है । सीबीआई ने आरोप लगाया कि एक अन्य आरोपी द्वारा 16 अप्रैल को देर से आवेदन दाखिल किया गया। दरअसल ये भी उसी रणनीति का हिस्सा है।
न्यायपालिका पर दबाव बनाने के गंभीर आरोप
सीबीआई ने कहा कि जज हटाने के इस प्रकार के अभियान से न्यायपालिका की गरिमा पर असर पड़ता है। जज निष्पक्ष निर्णय देने में बाधित हो सकते हैं। ये अदालत की गंभीर अवमानना का मामला है। ऐसे में सीबीआई ने मांग की है केजरीवाल के 14 अप्रैल के अतिरिक्त हलफनामने को रिकॉर्ड पर न लिया जाए। साथ ही कोर्ट इसकी कड़ी शब्दों में निंदा करे। सीबीआई ने मांग की है कोर्ट अपने आदेश में संदेश दे कि सोशल मीडिया और आरोपों से जजों को प्रभावित नहीं किया जा सकता।
