Bhojshala Verdict: मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। अब इस मामले में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए हिंदू पक्ष को राहत दी है। अदालत ने कहा कि भोजशाला मूल रूप से मंदिर थी। इस फैसले के बाद एक बार फिर भोजशाला देशभर में चर्चा का विषय बन गई है। अदालत ने यह फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की वैज्ञानिक रिपोर्ट और कई ऐतिहासिक सबूतों के आधार पर दिया।
हिंदू पक्ष का दावा था कि भोजशाला पहले एक भव्य मंदिर और विद्या केंद्र था, जिसे बाद में बदला गया। वहीं मुस्लिम पक्ष ने अदालत में कहा कि ASI की रिपोर्ट (ASI Survey Report) पक्षपातपूर्ण है और इसे हिंदू पक्ष के समर्थन में तैयार किया गया है। हालांकि ASI ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सर्वे पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से किया गया था। सर्वे टीम में मुस्लिम विशेषज्ञ भी शामिल थे और जांच के दौरान दोनों पक्षों के लोग मौजूद थे।
हाईकोर्ट ने 11 मार्च 2024 को भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वे करने का आदेश दिया था। इसके बाद ASI ने 22 मार्च 2024 से सर्वे शुरू किया। करीब 98 दिनों तक चली जांच के बाद 15 जुलाई 2024 को अदालत में 2000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट पेश की गई। रिपोर्ट में कहा गया कि मौजूदा ढांचे से पहले वहां परमार राजाओं के समय की एक बड़ी हिंदू संरचना मौजूद थी।
भोजशाला को मंदिर मानने के ये हैं 5 बड़े सबूत
1. पुराने मंदिर के अवशेष मिले
ASI की रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा ढांचे में मंदिर के पुराने हिस्सों जैसे स्तंभ, बीम और पत्थरों का दोबारा इस्तेमाल किया गया है। वैज्ञानिक जांच में पहले से मौजूद विशाल हिंदू संरचना के प्रमाण मिले।
2. देवी-देवताओं की मूर्तियां मिलीं
सर्वे के दौरान भगवान शिव, विष्णु, गणेश, वासुकी नाग और कुबेर से जुड़ी मूर्तियां और अवशेष पाए गए। कई स्तंभों पर हिंदू प्रतीकों और नक्काशी के चिन्ह भी मिले।
3. संस्कृत शिलालेख और श्लोक मिले
दीवारों और पत्थरों पर संस्कृत और देवनागरी लिपि में लिखे श्लोक मिले। इनमें मां सरस्वती और विद्या से जुड़े उल्लेख पाए गए, जिन्हें परमार काल का माना गया।
4. मंदिर जैसी वास्तुकला के संकेत
रिपोर्ट में बताया गया कि ढांचे में मंदिर शैली की वास्तुकला दिखाई देती है। पत्थरों की नक्काशी, डिजाइन और निर्माण शैली हिंदू मंदिरों से मिलती है।
5. ऐतिहासिक रिकॉर्ड और परंपराओं का समर्थन
इतिहासकारों के अनुसार राजा भोज ने 11वीं सदी में यहां सरस्वती मंदिर और शिक्षा केंद्र बनवाया था। कई पुराने रिकॉर्ड और स्थानीय परंपराएं भी इसी दावे का समर्थन करती हैं।
