Soft Tissue Sarcoma: कैंसर का नाम सुनते ही ज्यादातर लोगों के मन में फेफड़े, स्तन या ब्लड कैंसर का ख्याल आता है, लेकिन शरीर के नरम ऊतकों में होने वाला सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा (Soft Tissue Sarcoma) भी एक गंभीर और दुर्लभ कैंसर है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में यह बिना दर्द वाली साधारण गांठ जैसा दिखाई देता है, जिसके कारण लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान और सही इलाज से इस बीमारी पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। राजीव गांधी कैंसर संस्थान एवं अनुसंधान केंद्र (Rajiv Gandhi Cancer Institute) द्वारा आयोजित सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा समिट 2026 में देश और विदेशों से आए कैंसर एक्सपर्ट्स ने हिस्सा लिया। सम्मेलन के दौरान सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा जैसे दुर्लभ और जटिल कैंसर की पहचान, आधुनिक उपचार पद्धतियों, नई शोध उपलब्धियों और मरीजों के बेहतर प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।
क्या है सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा
सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा शरीर के उन नरम ऊतकों में विकसित होने वाला कैंसर है, जिनमें मांसपेशियां, वसा (फैट), नसें, टेंडन्स, रक्त वाहिकाएं और अन्य संयोजी ऊतक शामिल हैं। यह कैंसर शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है, लेकिन हाथ, पैर, पेट या धड़ में इसकी संभावना अधिक रहती है। यह बीमारी दुर्लभ जरूर है, लेकिन इसकी गंभीरता को देखते हुए समय पर जांच और इलाज बेहद जरूरी माना जाता है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: क्या बिना कंपकपी के भी हो सकता है मलेरिया का बुखार, और किन लक्षणों से भी होती है इस फीवर की पहचान
बिना दर्द की गांठ है खतरे की घंटी
सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा समिट 2026 में शामिल एक्सपर्ट्स के अनुसार, सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा का सबसे आम लक्षण शरीर में बनने वाली एक गांठ है। शुरुआत में यह गांठ दर्द नहीं करती, इसलिए कई लोग इसे सामान्य समझकर महीनों तक नजरअंदाज कर देते हैं। यदि शरीर के किसी भी हिस्से में कोई गांठ लगातार बनी रहे, उसका आकार बढ़ने लगे या वह दो सप्ताह से अधिक समय तक बनी रहे, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। हालांकि जरूरी नहीं कि हर गांठ कैंसर हो, लेकिन सही जांच के बिना इसका पता नहीं लगाया जा सकता है।

सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा समिट 2026
सही जांच से बेहतर इलाज की संभावना
राजीव गांधी कैंसर संस्थान एवं अनुसंधान केंद्र द्वारा आयोजित सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा समिट 2026 में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने इस दुर्लभ कैंसर के बेहतर उपचार पर चर्चा की। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बीमारी के इलाज में सटीक जांच, सही स्टेजिंग और कई विशेषज्ञों की संयुक्त टीम की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऑर्थोपेडिक सर्जन, कैंसर सर्जन, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट और मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट के समन्वय से मरीज को बेहतर और प्रभावी उपचार मिल सकता है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: मानसून में बच्चों पर मंडराता है इन बीमारियों का खतरा
कैंसर को बढ़ावा देने वाली लाइफस्टाइल की गलतियां
राजीव गांधी कैंसर संस्थान एवं अनुसंधान केंद्र के ऑर्थोपेडिक ऑन्कोलॉजिस्ट और आयोजन समिति के सदस्य डॉ. हिमांशु रोहेला ने बताया कि, कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे हमारी खराब लाइफस्टाइल बड़ी वजह बन रही है। जिसमें धूम्रपान, शराब का सेवन और बाहर का प्रोसेस्ड फूड शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं और कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं। इससे भी बड़ी चिंता यह है कि अधिकांश लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं हैं। नियमित हेल्थ चेकअप न करवाना और शरीर में दिखने वाले शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना बीमारी को गंभीर बना सकता है। यदि बुखार, कमजोरी या कोई अन्य समस्या दो सप्ताह से अधिक समय तक बनी रहे, तो इसे सामान्य मानने के बजाय तुरंत डॉक्टर से सलाह लेकर जरूरी जांच करानी चाहिए।
जागरूकता है सबसे बड़ा बचाव
सॉफ्ट टिश्यू सारकोमा भले ही दुर्लभ कैंसर हो, लेकिन इसके प्रति जागरूकता की कमी कई बार मरीजों के लिए नुकसानदायक साबित होती है। एक्सपर्ट्स का संदेश साफ है कि शरीर में बनने वाली किसी भी असामान्य गांठ को हल्के में न लें। समय पर जांच, सही निदान और विशेषज्ञों की देखरेख में इलाज से इस गंभीर बीमारी का प्रभावी उपचार संभव है।
