Pippali Benefits in Hindi: आयुर्वेद में कुछ मसालों को अमृत समान माना गया है। इसका मुख्य कारण इनकी वात, पित्त और कफ दोषों को दूर करने की प्रकृति है। इन्हीं में से एक मसाला पिप्पली (Pippali) यानी लॉन्ग पेपर भी है। इस मसाले का पाउडर आपकी कई समस्याओं का दूर कर सकता है। यह मसाला भारतीय किचन में इस्तेमाल होने वाले मसालों से कहीं ज्यादा खास है। आयुर्वेद में इसे पाचन शक्ति बढ़ाने, कफ को कम करने, खांसी और सांस की परेशानी दूर करने के साथ-साथ मोटापा और पेट से जुड़ी समस्याओं को दूर करने वाला माना गया है। पिप्पली का वानस्पतिक नाम पाइपर लॉन्गम (Piper longum) है। इसके फल को पिप्पली और इसकी जड़ को पिप्पलीमूल कहा जाता है।
पिप्पली की खासियत इसके दीपनी, रसायनी, वृष्या और वात-कफ दोषों को करना है। आयुर्वेद में इसे ऐसी औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है जो पाचन अग्नि को बढ़ाती है, कफ को बाहर करती है और शरीर में जमा मेद (फैट) को कम करने वाले योगों में काम आती है। इसका मतलब है कि पिपली का सेवन वेट लॉस के साथ ही कफ और पेट संबंधी परेशानियों को भी ठीक करता है।
क्या कहते हैं आयुर्वेदिक ग्रंथ
आयुर्वेदिक ग्रंथ भावप्रकाश निघण्टु में पिप्पली के गुणों को बेहद स्पष्ट तरीके से बताया गया है।
पिप्पली दीपनी वृष्या स्वादुपाका रसायनी।
अनुष्णा कटुका स्निग्धा वातश्लेष्महरी लघुः॥
पिप्पली रेचनी हन्ति श्वासकासोदरज्वरान्।
कुष्ठप्रमेहगुल्मार्शः प्लीहशूलाममारुतान्॥
इसका सीधा अर्थ है कि पिप्पली पाचन शक्ति बढ़ाती है, शरीर को ताकत देती है, रसायन का काम करती है और वात-कफ को शांत करती है। यह पेट साफ करने, श्वास और खांसी, पेट के रोग, ज्वर, कुष्ठ, प्रमेह, गुल्म, बवासीर, तिल्ली की समस्या और पेट के दर्द में काम आती है।
पेट की गड़बड़ी और अपच को करती है दूर
पिप्पली का सबसे बड़ा इस्तेमाल डाइजेशन सुधारने के लिए होता है। यह पाचन अग्नि को बढ़ाती है और अपच, गैस, पेट दर्द तथा पाचन तंत्र की कमजोरी में काम आती है। आयुर्वेदिक योगों में पिप्पली का इस्तेमाल पाचन तंत्र को मजबूत करने के लिए किया जाता है।
यही कारण है कि पिप्पली को दीपनी कहा गया है। यानी यह खाने को पचाने की प्रक्रिया को मजबूत करती है और कमजोर डाइजेशन को ठीक करने में मदद करती है।
खांसी और अस्थमा में भी असरदार
पिप्पली का इस्तेमाल खांसी, कफ और सांस की परेशानी में खास तौर पर किया जाता है। शहद के साथ पिप्पली चूर्ण का सेवन कफ वाली खांसी में किया जाता है। पुरानी और बार-बार होने वाली खांसी में भी पिप्पली वाले आयुर्वेदिक योग इस्तेमाल किए जाते हैं।
भावप्रकाश निघण्टु में पिप्पली को श्वास-कास हरने वाली बताया गया है। यानी यह सांस की तकलीफ और खांसी को दूर करने वाली औषधि है। आधुनिक रिसर्च में भी पिप्पली के श्वसन तंत्र से जुड़े पारंपरिक इस्तेमाल और इसके बायोएक्टिव कंपाउंड्स पर अध्ययन हुआ है। एलर्जिक राइनाटिस जैसी समस्याओं में भी यह काफी कारगर है।
वजन घटाती है पिप्पली
वेट लॉस के लिए भी पिप्पली का इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेदिक प्रयोगों में पिप्पली चूर्ण को शहद के साथ दिया जाता है। यह शरीर में जमा अतिरिक्त मेद यानी फैट को कम करने और मेटाबॉलिज्म बढ़ाने का काम करती है। भावप्रकाश निघण्टु में पिप्पली को शहद के साथ लेने पर मेद और कफ को कम करने वाली तथा अग्नि बढ़ाने वाली बताया गया है।
पिप्पली मधुसंयुक्ता मेदःकफविनाशिनी।
श्वासकासज्वरहरा वृष्या मेध्याऽग्निवर्धिनी॥
यानी पिप्पली और शहद का मेल मेद-कफ को कम करने, पाचन अग्नि बढ़ाने और श्वास-खांसी में काम करने वाला माना गया है।
कब्ज की समस्या में भी फायदा
पिप्पली का इस्तेमाल कब्ज में भी किया जाता है। पिप्पली की जड़ और छोटी इलायची का चूर्ण घी के साथ लेने से कब्ज की समस्या में फायदा होता है। पिप्पली का रेचनी गुण आंतों की सफाई और मल त्याग को आसान बनाने में मदद करता है। यही वजह है कि इसे पाचन से जुड़े कई आयुर्वेदिक योगों में शामिल किया जाता है।
कफ को बाहर निकालती है पिप्पली
पिप्पली को कफहर औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। गले में जमा कफ, खराश, खांसी और सांस की परेशानी में इसके योग काम आते हैं। शहद के साथ पिप्पली चूर्ण का इस्तेमाल खासतौर पर कफ वाली खांसी में किया जाता है। आयुर्वेदिक भाषा में पिप्पली वातश्लेष्महरी है, यानी यह वात और कफ को शांत करने का काम करती है।
बुखार और पेट के रोगों में भी इस्तेमाल
पिप्पली ज्वर और उदर संबंधी समस्याओं में भी इस्तेमाल होती है। भावप्रकाश निघण्टु के अनुसार यह उदरज्वर को दूर करने के साथ पेट से जुड़ी कई परेशानियों में काम करती है। पिप्पली के अलग-अलग योगों का इस्तेमाल पाचन कमजोर होने, पेट दर्द और कफ से जुड़ी परेशानी में भी किया जाता है।
डायबिटीज, पाइल्स और तिल्ली की समस्या में भी है कारगर
आयुर्वेद में पिप्पली का इस्तेमाल प्रमेह, अर्श, प्लीहा, गुल्म और शूल जैसी समस्याओं में भी किया जाता है। भावप्रकाश निघण्टु के श्लोक में इन सभी रोगों का सीधा वर्णन है। इसका मतलब है कि डायबिटीज, बवासीर और फैटी लिवर की समस्या इस मसाले के सेवन से दूर हो सकती है।
पिप्पली को क्यों कहा गया रसायनी
आयुर्वेद में रसायन ऐसी चिकित्सा पद्धति को कहा जाता है जिसका उद्देश्य शरीर की ताकत, पोषण और लंबे समय तक स्वस्थ रहने की क्षमता को बनाए रखना है। पिप्पली को इसी वजह से रसायनी गुण वाली औषधि के तौर पर रखा गया है। चरक संहिता में भी पिप्पली को लेकर पिप्पली रसायन का पूरा प्रयोग मिलता है। पिप्पली को शहद और घी के साथ लेने की प्रक्रिया के साथ श्वास, खांसी, हिचकी, गले की समस्या, अर्श, ग्रहणी, पाण्डु, ज्वर, पीनस और सूजन जैसी स्थितियों में इसके इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है।
बेहद है गुणकारी
पिप्पली का इस्तेमाल डाइजेशन सुधारने, कफ कम करने, खांसी और सांस की परेशानी में राहत देने, कब्ज दूर करने और मेद कम करने वाले आयुर्वेदिक योगों में किया जाता है। इसके तीखे स्वाद के पीछे मौजूद सक्रिय घटक पाइपरीन है।
पिप्पली का इस्तेमाल कैसे और कब तक करें
पिप्पली का इस्तेमाल आमतौर पर चूर्ण के रूप में शहद, गुनगुने पानी के साथ किया जाता है। आयुर्वेदिक प्रयोगों में इसकी मात्रा बीमारी, उम्र, पाचन शक्ति और शरीर की स्थिति के हिसाब से तय की जाती है। सामान्य तौर पर पिप्पली चूर्ण का इस्तेमाल कुछ दिनों से लेकर करीब 2-3 सप्ताह के कोर्स में किया जाता है।
एक क्लीनिकल स्टडी में पिप्पली चूर्ण का इस्तेमाल 21 दिनों तक किया गया था, जबकि वर्धमान पिप्पली रसायन के अलग-अलग प्रयोगों में मात्रा को धीरे-धीरे बढ़ाकर फिर कम किया जाता है। पिप्पली को लंबे समय तक लगातार और ज्यादा मात्रा में लेने के बजाय वैद्य की सलाह से निश्चित अवधि और सही मात्रा में लेना बेहतर रहता है।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी आयुर्वेदिक शास्त्रों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
