Cyberchondria In Hindi: सिर में हल्का दर्द हुआ, पेट थोड़ा खराब हुआ या अचानक थकान महसूस होने लगी... ऐसे में आजकल ज्यादातर लोग सबसे पहले डॉक्टर को नहीं, बल्कि गूगल को खोलते हैं। कुछ मिनट की सर्च के बाद सामान्य-सी परेशानी भी ब्रेन ट्यूमर, कैंसर या किसी गंभीर बीमारी जैसी लगने लगती है। नतीजा यह होता है कि बीमारी से पहले डर बढ़ जाता है। अगर आपने भी कभी ऐसा अनुभव किया है, तो आप अकेले नहीं हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस स्थिति को साइबरकोंड्रिया (Cyberchondria) कहते हैं।
अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद की साइकियाट्रिस्ट (MD Psychiatry) और सीनियर कंसल्टेंट डॉ. मीनाक्षी जैन, के अनुसार इंटरनेट स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पाने का अच्छा माध्यम है, लेकिन जब बार-बार लक्षण खोजने की आदत आपकी चिंता (anxiety disorder) बढ़ाने लगे, तो यह मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। इसलिए जरूरी है कि गूगल और डॉक्टर की भूमिका में फर्क समझा जाए।
क्या है साइबरकोंड्रिया
डॉ. मीनाक्षी जैन बताती हैं कि साइबरकोंड्रिया ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपने स्वास्थ्य से जुड़े लक्षणों को इंटरनेट पर बार-बार खोजता है और हर नई जानकारी के साथ उसकी चिंता कम होने के बजाय बढ़ती जाती है।
शुरुआत अक्सर किसी मामूली लक्षण से होती है, लेकिन अलग-अलग वेबसाइटों पर गंभीर बीमारियों के बारे में पढ़ने के बाद व्यक्ति खुद को उन्हीं बीमारियों से जोड़ने लगता है। कई बार मेडिकल जांच सामान्य आने के बाद भी उसे संतुष्टि नहीं मिलती और वह फिर से गूगल पर नई जानकारी तलाशने लगता है। यही आदत धीरे-धीरे चिंता का चक्र बना देती है।
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गूगल डॉक्टर की तरह फैसला क्यों नहीं करता
यह समझना बहुत जरूरी है कि गूगल और डॉक्टर का काम अलग-अलग है। आपको यह समझना चाहिए कि गूगल किसी मरीज की उम्र, मेडिकल हिस्ट्री, दवाइयों, जांच रिपोर्ट या शारीरिक परीक्षण को नहीं समझता। उसका काम केवल इंटरनेट पर मौजूद जानकारी दिखाना है। सर्च ईंजन (Search Engine) उन वेबपेजों को प्राथमिकता देता है जो SEO के लिहाज से बेहतर हों या जिनमें संबंधित कीवर्ड मौजूद हों।
यानी गूगल पर सबसे ऊपर दिखाई देने वाली बीमारी जरूरी नहीं कि आपकी समस्या का सबसे संभावित कारण हो। सही निदान केवल डॉक्टर आपकी पूरी मेडिकल जानकारी और जांच के आधार पर ही कर सकते हैं।

रिसर्च में क्या सामने आया
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रिसर्च क्या कहती है
डॉ. मीनाक्षी जैन बताती हैं कि साइबरकोंड्रिया पर कई वैज्ञानिक अध्ययन हो चुके हैं। 2019 में प्रकाशित एक सिस्टमैटिक रिव्यू और मेटा एनालिसिस में 20 अध्ययनों और 7,373 प्रतिभागियों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि जिन लोगों में हेल्थ एंग्जायटी अधिक थी, उनमें बार-बार ऑनलाइन स्वास्थ्य संबंधी जानकारी खोजने की आदत भी अधिक देखी गई। दोनों के बीच मजबूत संबंध पाया गया।
वहीं 2026 की स्कूपिंग रिव्यू, जिसमें 42 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया, उसके अनुसार साइबरकोंड्रिया की व्यापकता 30.7% से 55.6% के बीच रही। यह समस्या खासकर एंग्जायटी, डिप्रेशन, तनाव और इंटरनेट के अत्यधिक इस्तेमाल करने वाले लोगों में अधिक देखी गई।
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क्या यह आदत आपके अंदर भी है
डॉक्टर कहती हैं कि हर बार गूगल पर बीमारी पढ़ना साइबरकोंड्रिया नहीं होता है। लेकिन अगर नीचे दिए गए सवालों में आपके तीन या उससे ज्यादा जवाब 'हां' हैं, तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना फायदेमंद हो सकता है।
- क्या आप डॉक्टर से मिलने के बाद भी अपनी बीमारी गूगल पर बार-बार खोजते हैं?
- क्या सामान्य रिपोर्ट आने के बाद भी आपको लगता है कि कोई गंभीर बीमारी छूट गई है?
- क्या अलग-अलग वेबसाइट पढ़ने के बाद आपकी चिंता और बढ़ जाती है?
- क्या आप एक ही लक्षण को दिन में कई बार सर्च करते हैं?
- क्या बीमारी से ज्यादा इंटरनेट पर पढ़ी गई जानकारी आपको परेशान करती है?
ध्यान दें: यह केवल जागरूकता के लिए है, किसी बीमारी का परीक्षण (Diagnostic Test) नहीं।

कहीं आप में भी तो नहीं ये आदत
बार-बार बीमारी पढ़ने से दिमाग पर क्या असर पड़ता है?
जब हम इंटरनेट पर किसी गंभीर बीमारी के बारे में पढ़ते हैं, तो हमारा दिमाग संभावित खतरे पर ज्यादा ध्यान देने लगता है। इसके बाद शरीर की सामान्य संवेदनाएं भी असामान्य महसूस होने लगती हैं।
उदाहरण के लिए, सामान्य सिरदर्द ज्यादा गंभीर लग सकता है, दिल की धड़कन पर जरूरत से ज्यादा ध्यान जाने लगता है या हल्की थकान भी किसी बड़ी बीमारी का संकेत महसूस हो सकती है। इससे चिंता बढ़ती है और वही चिंता व्यक्ति को फिर से गूगल पर सर्च करने के लिए प्रेरित करती है। इस तरह एक ऐसा चक्र शुरू हो जाता है, जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो सकता है।
अगर गूगल करना ही है तो सही तरीके से करें
डॉ. मीनाक्षी जैन कहती हैं कि इंटरनेट से पूरी तरह दूरी बनाने की जरूरत नहीं है, बल्कि उसका सही इस्तेमाल करना जरूरी है। अगर किसी बीमारी, जांच या दवा के बारे में पढ़ना चाहते हैं, तो केवल विश्वसनीय और वैज्ञानिक स्रोतों को प्राथमिकता दें। जैसे सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों, मेडिकल कॉलेजों या पीयर रिव्यूड मेडिकल जर्नल्स की जानकारी।
सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट, फॉरवर्ड मैसेज या बिना विशेषज्ञता वाली वेबसाइटों के आधार पर कोई निष्कर्ष न निकालें। याद रखें, इंटरनेट जानकारी दे सकता है, लेकिन आपकी बीमारी का निदान नहीं कर सकता।

इससे कैसे बाहर निकलें
इस चिंता के चक्र से कैसे बाहर निकलें
अगर आपको लगता है कि बार-बार बीमारी सर्च करने से तनाव बढ़ रहा है, तो इन बातों का ध्यान रखें -
- हर छोटे लक्षण पर तुरंत गूगल सर्च करने से बचें।
- एक ही जानकारी कई वेबसाइटों पर बार-बार न पढ़ें।
- स्वास्थ्य संबंधी जानकारी केवल विश्वसनीय स्रोतों से ही लें।
- अगर लक्षण लगातार बने रहें या बढ़ते जाएं, तो सीधे योग्य डॉक्टर से मिलें।
- अगर महसूस हो कि आपकी चिंता ही बार-बार सर्च करने की वजह बन रही है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेने में संकोच न करें।
- जरूरत महसूस हो तो कुछ समय के लिए स्वास्थ्य संबंधी ऑनलाइन सर्च से ब्रेक लें।
डॉक्टर की क्या है सलाह
आज के समय में गूगल स्वास्थ्य संबंधी जानकारी तक पहुंच आसान बनाता है, लेकिन वह डॉक्टर का विकल्प नहीं हो सकता। अगर हर छोटी परेशानी के बाद ऑनलाइन जानकारी पढ़कर आपकी चिंता बढ़ने लगती है, तो इसे नजरअंदाज न करें। सही जानकारी लेना अच्छी बात है, लेकिन सही संदर्भ में उसे समझना उससे भी ज्यादा जरूरी है। किसी भी लगातार या परेशान करने वाले लक्षण के लिए योग्य डॉक्टर की सलाह ही सबसे भरोसेमंद रास्ता है।
