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एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते ही चीजें क्यों भूल जाते हैं लोग? न्यूरोलॉजिस्ट से समझें 'डॉरवे इफेक्ट' का विज्ञान

Brain Doorway Effect Explained: क्या आप भी कमरे में पहुंचते ही भूल जाते हैं कि किस काम से आए थे? बता दें कि इसके पीछे की वजह 'डॉरवे इफेक्ट' हो सकता है। आइए न्यूरोलॉजिस्ट्स से जानते हैं क्या है दिमाग से जुड़ी यह समस्या और कितनी हो सकती है खतरनाक।

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डॉक्टर से जानिए एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते ही चीजें क्यों भूल जाते हैं?

Brain Doorway Effect Explained: क्या आपके साथ भी ऐसा कभी हुआ है कि पानी पीने के लिए रसोई में गए, लेकिन वहां पहुंचते ही याद नहीं रहा कि आए किस काम से थे। या फिर अलमारी से कोई सामान लेने कमरे में गए और दरवाजा पार करते ही दिमाग एकदम खाली हो गया। अगर आपके साथ भी ऐसा होता है, तो आप अकेले नहीं हैं। लगभग हर व्यक्ति ने कभी न कभी इस स्थिति का अनुभव किया है। ऐसे में कई लोग मजाक में इसे उम्र का असर कह देते हैं, जबकि कुछ लोगों को डर लगने लगता है कि कहीं उनकी याददाश्त कमजोर तो नहीं हो रही।

असल में, विशेषज्ञ मानते हैं कि हर बार भूल जाना किसी बीमारी का संकेत नहीं होता है। कई बार इसके पीछे दिमाग के काम करने का एक बिल्कुल सामान्य तरीका होता है। न्यूरोसाइंस में इसे 'डॉरवे इफेक्ट' (Doorway Effect) कहा जाता है। यानी जैसे ही हम एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं, हमारा दिमाग नए माहौल के हिसाब से खुद को तैयार करने लगता है और कुछ पल के लिए पहले वाला काम पीछे छूट जाता है। विश्व मस्तिष्क दिवस (World Brain Day) पर आइए डॉक्टर से जानते हैं कि 'डॉरवे इफेक्ट' क्यों होता है, कब यह सामान्य है और किन संकेतों को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

क्या है 'डॉरवे इफेक्ट'

अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद के सीनियर कंसल्टेंट एवं असिस्टेंट प्रोफेसर (न्यूरोसाइंसेज, न्यूरोलॉजी एंड स्ट्रोक मेडिसिन) डॉ. अमित कुमार अग्रवाल बताते हैं कि हमारा दिमाग दिनभर की हर जानकारी को एक साथ नहीं रखता। वह हर घटना को छोटे-छोटे हिस्सों में व्यवस्थित करके संभालता है।

जब हम एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते हैं, तो दिमाग इसे एक नई स्थिति की शुरुआत मानता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे 'इवेंट बाउंड्री' (Event Boundary) कहा जाता है। यानी जैसे ही आप दरवाजा पार करते हैं, दिमाग नए माहौल पर ध्यान देने लगता है। इसी वजह से पहले वाले काम की याद कुछ पल के लिए पीछे चली जाती है और लगता है कि 'मैं यहां किसलिए आया था?' डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि यह दिमाग की कमजोरी नहीं, बल्कि जानकारी को व्यवस्थित रखने का उसका सामान्य तरीका है।

क्या है 'डॉरवे इफेक्ट'

क्या है 'डॉरवे इफेक्ट'

वापस लौटते ही बात क्यों याद आ जाती है

क्या आपने कभी गौर किया है कि जिस जगह से उठे थे, वहीं दोबारा पहुंचते ही अचानक सब याद आ जाता है? यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी बताते हैं कि हमारा दिमाग जगह और काम को आपस में जोड़कर याद रखता है। जब आप उसी जगह वापस पहुंचते हैं, जहां आपने किसी काम के बारे में सोचा था, तो वही माहौल दिमाग को दोबारा उस बात की याद दिला देता है।

यानी जानकारी दिमाग से मिटती नहीं है, बल्कि कुछ समय के लिए उसका ध्यान दूसरी चीजों पर चला जाता है। जैसे ही पुराना माहौल मिलता है, वही याद फिर सामने आ जाती है।

'डॉरवे इफेक्ट' के बारे में रिसर्च क्या बताती है

बता दें कि 'डॉरवे इफेक्ट' कोई नया विचार नहीं है। यूनिवर्सिटी ऑफ नोट्रे डेम (University of Notre Dame) के शोधकर्ताओं ने भी इस विषय पर अध्ययन किया है। रिसर्च में पाया गया कि जब कोई व्यक्ति एक कमरे से दूसरे कमरे में जाता है, तो पहले वाले काम को याद करना थोड़ी देर के लिए मुश्किल हो सकता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि दरवाजा पार करते समय दिमाग नए माहौल के हिसाब से खुद को व्यवस्थित करता है। इस दौरान पुरानी जानकारी कुछ समय के लिए पीछे चली जाती है। हालांकि, यह असर हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता। अगर आपका ध्यान पूरी तरह अपने काम पर है और दिमाग पर ज्यादा मानसिक दबाव नहीं है, तो ऐसा कम हो सकता है।

क्यों हो बढ़ रही है यह समस्या

क्यों हो बढ़ रही है यह समस्या

आजकल यह ज्यादा क्यों हो बढ़ रही है यह समस्या

अगर आपको लगता है कि पहले ऐसा कम होता था और अब ज्यादा होने लगा है, तो इसकी वजह सिर्फ बढ़ती उम्र नहीं है। डॉ. अमित कुमार अग्रवाल बताते हैं कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, पूरी नींद न लेना, लगातार मोबाइल नोटिफिकेशन देखना और एक साथ कई काम करना, दिमाग पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं। इससे किसी एक काम पर पूरा ध्यान नहीं रह पाता।

वहीं, डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी कहते हैं कि जब हम चलते-चलते मोबाइल इस्तेमाल करते हैं या दिमाग में एक साथ कई बातें चल रही होती हैं, तो जिस काम के लिए हम उठे थे, वह पूरी तरह दिमाग में दर्ज ही नहीं हो पाता। ऐसे में नए कमरे में पहुंचते ही उसे याद करना मुश्किल हो जाता है।

कब डॉक्टर से मिलना चाहिए

दोनों विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कभी-कभार ऐसा होता है और थोड़ी देर बाद बात खुद याद आ जाती है, तो चिंता की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर भूलने की समस्या लगातार बढ़ रही है और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगी है, तो ऐसे में जांच करा लेनी चाहिए।

डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी के मुताबिक, अगर बार-बार एक ही सवाल पूछना, परिचित लोगों को पहचानने में परेशानी होना, सामान्य शब्द भूल जाना, परिचित रास्तों में भी भटक जाना या समय और जगह को लेकर भ्रम होने लगे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। वह यह भी बताते हैं कि हर बार इसकी वजह दिमाग की बीमारी नहीं होती, बल्कि कुछ अन्य चीजें हो सकती हैं जैसे -

  • विटामिन बी-12 या विटामिन डी की कमी
  • थायरॉयड (Thyroid) की गड़बड़ी
  • डिप्रेशन या कुछ दवाओं का असर

इन स्थितियों में भी व्यक्ति की याददाश्त प्रभावित हो सकती है। इसलिए सही कारण जानने के लिए विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी है।

दिमाग को कैसे रखें स्वस्थ

दिमाग को कैसे रखें स्वस्थ

ऐसे में दिमाग को कैसे रखें स्वस्थ

डॉ. अमित कुमार अग्रवाल का कहना है कि दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए किसी खास दवा की नहीं, बल्कि अच्छी जीवनशैली की जरूरत होती है। ऐसे में आपको बस कुछ अच्छी आदतों को अपनाने की जरूत है जैसे -

  • हर दिन भरपूर नींद लें
  • नियमित रूप से पैदल चलें या व्यायाम करें
  • एक समय में एक ही काम करने की आदत डालें
  • बिना जरूरत बार-बार मोबाइल देखने और लगातार कई काम एक साथ करने से बचें।
  • नई चीजें सीखते रहें, किताबें पढ़ें
  • और परिवार या दोस्तों के साथ बातचीत के लिए समय निकालें।
इन आदतों को नियमित फॉलो करने से दिमाग लंबे समय तक सक्रिय और चुस्त बना रहता है।

विश्व मस्तिष्क दिवस पर डॉक्टर का संदेश

डॉक्टर का कहना है कि विश्व मस्तिष्क दिवस हमें यह याद दिलाता है हर छोटी भूल किसी बीमारी का संकेत नहीं होती। कमरे में जाकर कुछ पल के लिए यह भूल जाना कि आप वहां क्यों आए थे, ज्यादातर मामलों में दिमाग के सामान्य काम करने का हिस्सा है। इसलिए ऐसी स्थिति में घबराने की जरूरत नहीं है।

हालांकि, अगर भूलने की आदत तेजी से बढ़ रही है, रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं या इसके साथ व्यवहार, बोलने या सोचने-समझने में भी बदलाव दिख रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेने में देर नहीं करनी चाहिए। समय पर जांच से कई ऐसी समस्याओं का पता लगाया जा सकता है, जिनका इलाज संभव है। इसलिए दिमाग की सेहत का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है, जितना शरीर के बाकी अंगों का।

नोट: यह लेख अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद के सीनियर कंसल्टेंट एवं असिस्टेंट प्रोफेसर (न्यूरोसाइंसेज, न्यूरोलॉजी एंड स्ट्रोक मेडिसिन) डॉ. अमित कुमार अग्रवाल और यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. भरत कुमार सुरिसेट्टी द्वारा साझा की गई चिकित्सीय जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। लेख में दी गई वैज्ञानिक जानकारी 'डॉरवे इफेक्ट' (Doorway Effect) और इससे जुड़े उपलब्ध न्यूरोसाइंस शोधों एवं विशेषज्ञों की व्याख्या पर आधारित है।

Vineet
विनीतauthor

विनीत टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में हेल्थ डेस्क के साथ बतौर चीफ कॉपी एडिटर जुड़े हैं। दिल्ली के रहने वाले विनीत को हेल्थ, फिटनेस और न्यूट्रिशन जैसे विषयों पर गहरी समझ है। इन्होंने हेल्थ, फिटनेस, न्यूट्रिशन और सप्लीमेंट के फील्ड में प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन भी किए हैं। वे 6 साल से इस फील्ड से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर 7,000 से अधिक लेख लिख चुके हैं। विनीत की खासियत उनकी रिसर्च-बेस्ड लेखन शैली और जनहित को ध्यान में रखते हुए लिखी गई जानकारीपूर्ण स्टोरीज हैं।

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