जनवरी 2025 में ट्रंप की आधिकारिक ताजपोशी हो जायेगी। दुनिया उनकी तासीर और तेवरों से अच्छी तरह वाकिफ है। व्हाइट हाउस के तख्त पर बैठते ही वो यूक्रेन-रूस, इस्राइल-ईरान और ताइवान-चीन समेत कई उलझे मसलों पर अपना दखल देना शुरू कर देगें। हाल ही में नव-निर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ब्रिक्स मुल्कों को चेताते हुए कहा कि अगर वो डॉलर को दरकिनार करते हुए अन्य वैकल्पिक साझा मौद्रिक प्रणाली का इस्तेमाल करते है तो उन पर सौ फीसदी टैरिफ लगा दिया जाएगा। ट्रंप के इस रूख़ को लेकर कई लोग हैरानगी जाहिर कर रहे है, आखिर वो ऐसी बात पर क्यों उखड़े हुए है, जो लगभग नामुमकिन सी है।
डॉलर दौड़ में बहुत आगे
ब्रिक्स में शामिल देशों को प्राथमिक एजेंडा विकासशांतिसहयोग और सुरक्षा से जुड़ा है। ऐसे में समूह में शामिल ब्राज़ीलरूसभारतचीन और दक्षिण अफ्रीका के बीच इस मंच से किसी तरह का कोई वित्तीय साझा कार्यक्रम नहीं है। हालांकि शीतयुद्ध के पूर्वार्द्ध में एकीकृत सोवियत के दौर में डॉलर को चुनौती देने कि परिकल्पनाएं जरूर गढ़ी गयी थीजो कि बैरंग रही। मौजूदा हालातों में अमेरिकी डॉलर से प्रतिस्पर्धा करने और उसे पछाड़ने के लिए नयी करेंसी व्यवस्था को तैयार करना कपोल कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं है। हालांकि ब्रिक्स देशों में अंतर्राष्ट्रीय भुगतान के लिए अमेरिकी डॉलर अपनी जगह बनाए हुए है। कीव और मास्को के बीच जंग छिड़ने के बाद क्रेमलिन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर डॉलर के असर को कम करने की जोरदार वकालत की थी। यूक्रेनी सरजमीं पर रूसी हमला होते ही वाशिंगटन ने रूसी बैंकिंग व्यवस्था को अपनी करेंसी प्रणाली स्विफ्टसे बाहर निकाल दिया था।
मामले में बैकफुट पर है ब्रिक्स
ब्रिक्स में शामिल कई देश अमेरिकी अगुवाई वाली वैश्विक व्यवस्था से असंतोष में हैउन्हें लगता है कि वित्तीय मोर्चे पर डॉलर विनियमन और मनमाने ढंग से टैरिफ प्रणाली वाशिंगटन उन पर थोपता रहा है। समूह में शामिल कई देश अमेरिकी आलोचना खुलकर ना कर पाने के कारण इस विश्वास से एक मंच पर है कि उनके हितों की अनदेखी की जा रही है। जिस निर्बाध मौद्रिक प्रवाह और करेंसी विनियमन प्रणाली के वो हकदार हैउन्हें उससे साजिशन दूर कर दिया गया है। खास ये है कि ब्रिक्स में शामिल देश वैश्विक जीडीपी का फीसदी और ग्लोबल ट्रेड के फीसदी हिस्से पर अपना दबदबा रखते हैबावजूद इसके डॉलर उनके लिए बड़ी वित्तीय बाध्यता साबित हो रहा है। इससे साफ हो जाता है कि ब्रिक्स अपनी संस्थानिक क्षमताओं को भी निखारना होगाताकि वो इस मामले में तोलमोल की स्थिति में आ सके। इस साल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने दावा किया था कि डॉलर अमेरिका की आर्थिक सामरिक क्षमता को बढ़ाताइस पर निर्भरता बढ़ना बड़ी गलत है लेकिन कई देश इस गलती को करने का इरादतन तौर पर जोखिम उठा रहे है।
अमेरिकी करेंसी को पछाड़ने के लिए कई समूह सक्रिय
ब्रिक्स की कार्यशैली और प्रणालियां वित्तीय मामलों के अनुकूल नहीं है। सालाना तौर पर आयोजित होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में समूह में शामिल देशों के राष्ट्राध्यक्षों और नेताओं एक दूसरे से राब्ता करने का मौका मिलता है। साथ ही इस मंच का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर सियासी इशारेबाजी के लिए भी किया जाता हैइससे ज्यादा ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों कुछ और देखने को नहीं मिला है। गौरतलब है कि समूह ने एक बार केंद्रीय बैंक की सोच को जरूर हवा दी थीजिसे ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक के नाम से जाना गया। मगर इससे जुड़ी कवायदों पर वक्त के साथ विराम लग गया। साफ है कि अमेरिका से आगे निकलने की होड़ में लगे कई देश अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को धूल में मिलाना चाहते हैजिसके लिए वो विकल्पों की तलाश में है। वैश्विक व्यापार करने वाले कई देश और निवेश से जुड़े कई हितधारक समूह अमेरिकी डॉलर को दबदबे को कम करने के लिए दिन रात एक किए हुए है।
डॉलर का रूतबा कम करने की जुगत में बीजिंग
डॉलर की चुनौती के लिए बीजिंग युआन को दौड़ में उतारने की चाह रखता है। चीन इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि वैश्विक व्यापार के लिए डॉलर सूत्रधार का काम करता हैइसलिए उसकी ओर से सॉवरेन डिजिटल युआन की कवायदें छेड़ी गयी है। चीनी नीति निर्माता डॉलर होल्डिंग्स को छेड़े बगैर अमेरिकी करेंसी के दबदबे को कम करने की मंशा पाले बैठे है। हालांकि ये आसान नहीं होगादुनिया के कई देश डॉलर का स्टॉक रिजर्व में रखे हुए ऐसे में ये विचार दुरूह साबित होता दिखता है। कुल मिलाकर अगर डॉलर की दबदबे पर किसी तरह की आंच आती है तो अमेरिका टैरिफ दरोंकारोबारी नीतियों और मुद्रा प्रवाह में बदलाव करके वित्तीय जटिलताएं पैदा कर सकता हैजिसका सीधा असर ब्रिक्स समेत दुनिया के कई मुल्कों पर पड़ेगा।
इस आलेख के लेखक राम अजोर (वरिष्ठ पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक) हैं।
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