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जब भूख हड़ताल तुड़वाने को सरकार खेलने लगी 'चूहे बिल्ली का खेल', जानिए महिलाओं के अनशन की सबसे मशहूर दास्तान

महिला अनशनकारियों के साथ सरकार का व्यवहार बिल्कुल उस बिल्ली जैसा था, जो चूहे को पकड़कर तुरंत नहीं खाती। पहले उसे छोड़ती है, फिर दोबारा पकड़ती है, फिर छोड़ती है और अंत में पूरी तरह काबू कर लेती है।

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जब सरकार ने महिलाओं की भूख हड़ताल से डरकर बना डाला ‘कैट एंड माउस एक्ट’
Authored by: Suneet Singh
Updated Jul 18, 2026, 12:36 IST

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर से हटा दिया है। गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है। भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक के साथ इस तरह के व्यवहार की कुछ लोग निंदा कर रहे हैं तो कुछ इसे जरूरी कदम बता रहे हैं।

वैसे इतिहास के पन्नों में भूख हड़ताल खत्म कराने की बहुत सी कहानियां दर्ज हैं। कुछ मामले तो इतने विचित्र थे कि उन्होंने अपने दौर की राजनीति, नैतिकता और सत्ता की मानसिकता को हमेशा के लिए बेनकाब कर दिया। ऐसा ही एक मामला था जब सरकार भूख हड़ताल तुड़वाने के लिए 'चूहे बिल्ली का खेल' खेलने लगी थी।

सड़कों पर उतरी 'आधी आबादी'

बात 20वीं सदी के शुरुआत के लंदन की है। औद्योगिक क्रांति की चमक के पीछे एक ऐसी आधी आबादी खड़ी थी, जिसके पास अपनी तकदीर तय करने का सबसे बुनियादी हक तक नहीं था। महिलाएं सड़कों पर उतर गईं। उनकी बस एक ही मांग थी कि उन्हें भी वोट देने का अधिकार मिले।

मताधिकार की लड़ाई को अंजाम तक ले जाने के लिए एक्टिविस्ट एमेलिन पैंकहर्स्ट और उनकी बेटियों ने Women's Social and Political Union (WSPU) नाम का संगठन बनाया। हजारों की संख्या में औरतें इससे जुड़ीं और आंदोलन का हिस्सा बनी। आंदोलन से जुड़ने वाली महिलाओं को 'सफ्राजेट्स' कहा गया।

शुरुआत शांतिपूर्ण प्रदर्शन से हुई, लेकिन लंबे संघर्ष के बाद भी सरकार की अनदेखी के कारण आंदोलन उग्र होने लगा। सरकार के खिलाफ धिक्कार के नारों के महिलाएं सड़कों पर हल्ला बोलने लगीं। वो संसद तक पहुंच गईं और वहां तोड़-फोड़ करने लगीं। डाकघरों को आग के हवाले कर दिया गया। औरतें बीच सड़क खुद को लोहे की जंजीरों में जकड़ सरकार से लोहा लेने लगीं।

भूख हड़ताल ने उड़ा दी सरकार की नींद (AI Generated Image)

भूख हड़ताल ने उड़ा दी सरकार की नींद (AI Generated Image)

भूख हड़ताल ने उड़ा दी सरकार की नींद

सरकार परेशान हो गई। उसने इन बागी महिलाओं को गिरफ्तार कर जेल की कालकोठरियों में डाल दिया। बावजूद इसके सरकार की परेशानी कम ना हुई। जेल में महिलाओं ने अपनी लड़ाई के लिए नया हथियार चुना- भूख हड़ताल। उनका इरादा साफ था - अगर हमारी मांगें नहीं माना जाएंगी, तो हम खाना नहीं खाएंगे।

अब ब्रिटिश सरकार एक मुश्किल सवाल के सामने थी। अगर महिलाएं जेल में भूख हड़ताल करते-करते मर जातीं, तो वे पूरे देश में शहीद बन जातीं। इससे आंदोलन और तेज हो जाता। वहीं अगर उन्हें रिहा कर दिया जाता, तो सरकार कमजोर दिखाई देती।

इससे निपटने के लिए प्रशासन ने पहले फोर्स फीडिंग का रास्ता चुना। महिलाओं को कुर्सियों से बांध दिया जाता। चार-पांच पुलिसवाले उन्हें पकड़कर रखते। उनके मुंह या नाक में लंबी रबर की ट्यूब डाली जाती और जबरन खाना पेट तक पहुंचाया जाता।

इतिहासकार जून पर्सविस अपनी किताब एमेलिन पैंकहर्स्ट: अ बायोग्राफी (Emmeline Pankhurst: A Biography) में लिखती हैं कि कई महिलाओं ने इसे बलात्कार जैसा घिनौना काम माना। जेल में हालात बिगड़ने लगे। डॉक्टरों और मानवाधिकार समर्थकों के बीच भी इस पर तीखी बहस शुरू हो गई। सरकार समझ गई कि यह तरीका राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है।

अब सरकार ने नया रास्ता चुना। 1913 में ब्रिटिश संसद ने Prisoners (Temporary Discharge for Ill Health) Act पास किया। लेकिन जनता ने इसे जल्दी ही नया नाम दे दिया - कैट एंड माउस एक्ट (Cat and Mouse Act)

कानून की आड़ में शुरू हुआ 'चूहे बिल्ली का खेल'

दरअसल इस एक्ट की आड़ में महिला अनशनकारियों के साथ सरकार का व्यवहार बिल्कुल उस बिल्ली जैसा था, जो चूहे को पकड़कर तुरंत नहीं खाती। पहले उसे छोड़ती है, फिर दोबारा पकड़ती है, फिर छोड़ती है और अंत में पूरी तरह काबू कर लेती है।

ये कानून भी यही करता था। अगर कोई महिला आंदोलनकारी जेल में भूख हड़ताल करते-करते गंभीर रूप से बीमार हो जाती, तो सरकार उसे "मानवीय आधार" पर अस्थायी रूप से रिहा कर देती। महिला घर जाकर अपना स्वास्थ्य सुधारती, फिर जैसे ही वह ठीक होती, पुलिस उसे फिर गिरफ्तार कर जेल भेज देती। यह सिलसिला तब तक चलता, जब तक उसकी पूरी सजा पूरी नहीं हो जाती। सरकार का उद्देश्य साफ था - न वह जेल में मरे और न ही आजाद रहे।

जेल से छोड़ने के बाद भी पीछे लगी रहती पुलिस (AI Image)

जेल से छोड़ने के बाद भी पीछे लगी रहती पुलिस (AI Image)

आंदोलन की सबसे बड़ी नेता एमेलिन पैंकहर्स्ट इस एक्ट का पहला शिकार थीं। 1913 से 1914 के बीच, उन्हें इस कानून के तहत 12 बार जेल से छोड़ा गया और दोबारा गिरफ्तार किया गया। हर बार जब वे बाहर आतीं, उनका वजन कई किलो कम हो चुका होता, वे व्हीलचेयर पर होतीं। लेकिन जैसे ही वे दो चम्मच सूप पीने लायक होतीं, पुलिस उनके घर के बाहर पहरा लगा देती।

ब्रिटिश इतिहासकार डायने एटकिंसन अपनी चर्चित किताब राइज अप, वूमन (Rise Up, Women) में लिखती हैं कि यह केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, महिला आंदोलनकारियों को मानसिक रूप से तोड़ने की रणनीति थी।

कल्पना कीजिए आप कई दिनों तक भूखे रहे। शरीर टूट चुका है। घर पहुंचे ही हैं। परिवार संभाल रहा है। और तभी दरवाजे पर दस्तक होती है। पुलिस फिर आपको गिरफ्तार करने आ गई है। कई महिलाओं के लिए यह शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक प्रताड़ना का सबसे कठिन दौर था।

लेकिन महिलाओं ने भी नहीं मानी हार

सरकार को लगा था कि इस कानून से महिलाओं का हौसला टूट जाएगा। वे बार-बार बीमार होने और जेल जाने के डर से घुटने टेक देंगी। लेकिन सत्ता कई बार भूल जाती है कि जब किसी विचार का समय आ जाता है, तो कानून उसके सामने बौने हो जाते हैं।

इन महिलाओं ने मुंहतोड़ जवाब दिया। उन्होंने गिरफ्तारी से बचने के लिए गुप्त ठिकाने बनाने शुरू कर दिए। WSPU ने उनके लिए सेफ हाउस का बड़ा नेटवर्क तैयार खड़ा कर दिया। कई कार्यकर्ता नकली नामों से रहने लगीं। कुछ पुरुषों का भेष बदलकर घूमती थीं। कुछ ने बाल छोटे कर लिए ताकि पुलिस पहचान न सके।

इतिहासकार मार्टिन प्यू लिखते हैं कि यह आंदोलन अब केवल वोट का आंदोलन नहीं रह गया था। यह राज्य और नागरिक के बीच दिमाग और इच्छाशक्ति की लड़ाई बन चुका था।

बदलने लगा जनता का नजरिया

ब्रिटेन खुद को दुनिया का सबसे सभ्य समाज मानता था। लेकिन जब अखबारों में यह छपने लगा कि पुलिस चौबीसों घंटे कमजोर, बीमार और कांपती हुई औरतों के घरों के बाहर सिर्फ इसलिए खड़ी है कि वे कब एक निवाला खाएं और उन्हें दोबारा घसीटकर जेल ले जाया जाए, तो आम जनता का दिल पसीज गया।

अखबारों ने खोल दी थी कैट एंड माउस एक्ट की पोल

अखबारों ने खोल दी थी कैट एंड माउस एक्ट की पोल

ब्रिटिश जनता को लगा कि सरकार एक शक्तिशाली 'बिल्ली' की तरह कमजोर 'चूहे' के साथ खेल रही है। धीरे-धीरे जनमत बदलने लगा। लोग इन महिलाओं की लड़ाई से सहमत होने लगे। यही किसी भी जनांदोलन की सबसे बड़ी जीत होती है।

यूं खत्म हुआ चूहे बिल्ली खेल

इन सबके बीच 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो गया। एमेलिन पैंकहर्स्ट ने सरकार के साथ अस्थायी समझौता किया और महिलाओं से देश के दुश्मनों संग जंग में सहयोग करने की अपील की। बदले में सरकार ने भी सारी सफ्राजेट्स को रिहा कर दिया। 'कैट एंड माउस' एक्ट व्यावहारिक रूप से अप्रासंगिक हो गया।

विश्व युद्ध खत्म होने के साथ ही 1918 में ब्रिटेन ने 'रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट' पास किया, जिसने 30 वर्ष से अधिक उम्र की संपत्ति रखने वाली महिलाओं को वोट का अधिकार दिया, और 1928 में यह अधिकार सभी महिलाओं को पुरुषों के बराबर मिल गया।

विडंबना देखिए कि जिस कानून से सरकार आंदोलन दबाना चाहती थी, वही कानून उन महिलाओं के संघर्ष का सबसे बड़ा हथियार बन गया। उन्हें उनकी मंजिल मिल गई।

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी ने अपनी आत्मा और विचारधारा की ताकत पर अनशन किया, तो बड़ी से बड़ी बंदूकों और चालाकियों वाली सरकारें भी लाचार नजर आईं। यही कारण है कि अनशन को आज भी दुनिया का सबसे शांत लेकिन सबसे घातक राजनीतिक हथियार माना जाता है।

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