Sonam Wangchuk: पिछले 20 दिन से अनशन पर बैठे पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को शनिवार सुबह पुलिस सफदरजंग अस्पताल ले गई। पुलिस के इस एक्शन से प्रदर्शनकारियों में गुस्सा और बढ़ चुका है। सोनम वांगचुक की जगह अब कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके अब अनशन पर बैठ चुके हैं। अनशन के दौरान सोनम वांगचुक का वजन 9 किलो से अधिक घट चुका है। डॉक्टरों के मुताबिक, उनका शरीर अब उस स्थिति में पहुंच गया है जहां ऊर्जा के लिए मांसपेशियां टूटने लगती हैं और ऑर्गन फेलियर (अंगों के खराब होने) का खतरा बढ़ जाता है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग, पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों के खिलाफ जंतर-मंतर पर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के नेतृत्व में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) और अन्य छात्र संगठनों ने 20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा की थी।
सोनम वांगचुक को पुलिस शनिवार सुबह अस्पताल ले गई।
क्या है अनशन की वजह?
सोनम वांगचुक का यह मौजूदा आंदोलन लद्दाख के मुद्दों से अलग देश के युवाओं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है। वे 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) (युवा संगठन) के साथ मिलकर नीट पेपर लीक और परीक्षाओं में हुई गड़बड़ी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उनकी मुख्य मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और परीक्षा प्रणाली में पूरी पारदर्शिता व जवाबदेही तय करना है।
कब-कब वांगचुक ने उठाया लोकतांत्रिक हथियार
यह पहली बार नहीं है जब सोनम वांगचुक ने किसी सामाजिक कारण के लिए अपने शरीर को दांव पर लगाया है। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने कई बार भूख हड़ताल को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है। आइए जानते हैं कि उन्हें कब-कब अनशन के जरिए अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाई है।
जनवरी 2023: लद्दाख के लिए पहली बड़ी भूख हड़ताल
आंदोलन की वजह
सोनम वांगचुक ने लद्दाख के नाजुक ग्लेशियरों, पर्यावरण और वहां की जनजातीय संस्कृति को बचाने के लिए यह 5 दिनों का अनशन (क्लाइमेट फास्ट) किया था। उनकी मांग थी कि लद्दाख को भारतीय संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल किया जाए, ताकि वहां के लोगों को अपनी जमीन और संसाधनों के संरक्षण का कानूनी अधिकार मिल सके।
ग्लेशियरों, पर्यावरण और वहां की जनजातीय संस्कृति को बचाने के लिए वांगचुक ने किया था अनशन।
आंदोलन का नतीजा
इस अनशन ने लद्दाख के मुद्दों को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया। शुरुआत में प्रशासन ने उन्हें नजरबंद करने की कोशिश की, जिससे लोगों में भारी आक्रोश फैल गया। देश-विदेश से मिले भारी समर्थन के बाद केंद्र सरकार हरकत में आई और लद्दाख के नेताओं के साथ बातचीत के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक हाई-पावर्ड कमिटी (HPC) का गठन किया।
2. मार्च 2024: 21 दिनों का ऐतिहासिक 'क्लाइमेट फास्ट'
आंदोलन की वजह
जब गृह मंत्रालय की कमिटी के साथ लद्दाख के प्रतिनिधियों की बातचीत बेनतीजा रही, तो वांगचुक ने लेह में शून्य से नीचे के तापमान (-12°C) में 21 दिनों का लंबा अनशन शुरू किया। उनकी मांगें अब और बड़ी हो चुकी थीं, जिसमें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा, दो लोकसभा सीटें और स्थानीय युवाओं के लिए नौकरियों में आरक्षण शामिल था।
आंदोलन का नतीजा
इस आंदोलन ने लद्दाख में एक अभूतपूर्व एकजुटता पैदा की, जहां उनके समर्थन में महिलाओं, युवाओं और भिक्षुओं ने भी क्रमिक भूख हड़ताल की। सरकार को लद्दाख के प्रतिनिधियों के साथ कई दौर की नई बैठकें करने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालांकि कोई अंतिम लिखित आश्वासन नहीं मिला, लेकिन इस अनशन ने सरकार पर अत्यधिक राजनीतिक दबाव बना दिया।
सितंबर-अक्टूबर 2024: 'दिल्ली चलो' मार्च
सितंबर 2024 में सोनम वांगचुक ने 100 से अधिक समर्थकों के साथ 'दिल्ली चलो' अभियान की शुरुआत की। इस दौरान उन्होंने लद्दाख से दिल्ली तक करीब 1,000 किलोमीटर की पदयात्रा की। इस मार्च का उद्देश्य लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा दिलाने और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी चार प्रमुख मांगों को केंद्र सरकार के सामने मजबूती से उठाना था।
करीब एक महीने की यात्रा के बाद जब यह समूह 1 अक्टूबर 2024 को दिल्ली की सीमा पर पहुंचा, तो राजधानी में लागू निषेधाज्ञा (धारा 144) का हवाला देते हुए दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक समेत कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। हालांकि, हिरासत के बाद भी आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से जारी रहा। इस दौरान केंद्र सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत दोबारा शुरू हुई, लेकिन आंदोलन की प्रमुख मांगों पर कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका।
3. सितंबर 2025: 35 दिनों का सबसे लंबा संघर्ष
आंदोलन की वजह
सोनम वांगचुक ने लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल कराने की मांग को लेकर उन्होंने लेह से दिल्ली तक पैदल मार्च निकाला था। दिल्ली की सीमा पर उन्हें हिरासत में ले लिया गया था, जिसके विरोध में उन्होंने 35 दिनों का अपना सबसे लंबा अनशन शुरू किया। वे सरकार से लद्दाख के विकास और सुरक्षा पर ठोस और लिखित वादे की मांग कर रहे थे।
आंदोलन का नतीजा
यह आंदोलन कानूनी और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हो गया क्योंकि वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में ले लिया गया था। हालांकि, चौतरफा दबाव के बाद मार्च 2026 में उन्हें अदालत के हस्तक्षेप से रिहा किया गया। इसके बाद केंद्र सरकार और लद्दाख के नेताओं के बीच रुकी हुई बातचीत की प्रक्रिया एक बार फिर आधिकारिक रूप से शुरू हुई।
लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा की मांग को लेकर वांगचुक ने किया प्रदर्शन।
जून-जुलाई 2026: NEET परीक्षा धांधली के खिलाफ राष्ट्रीय अनशन
आंदोलन की वजह
यह वांगचुक का पहला ऐसा अनशन है जो लद्दाख से बाहर, देश के करोड़ों छात्रों के हक के लिए है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर वे नीट यूजी पेपर लीक (NEET-UG 2026) परीक्षा में हुई कथित धांधली, पेपर लीक और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कमियों के खिलाफ 20 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे थे। वे परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
आंदोलन का नतीजा
इस आंदोलन को देश भर के छात्रों, विपक्ष के बड़े नेताओं और नोबेल पुरस्कार विजेताओं का भारी समर्थन मिला है। 20वें दिन उनकी सेहत बहुत ज्यादा बिगड़ने के बाद, कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली पुलिस ने उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया है। भले ही वे अस्पताल में हैं, लेकिन उनके इस कदम ने नीट मुद्दे पर सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विरोध की आग को और तेज कर दिया है और 20 जुलाई को उनके समर्थकों ने 'संसद मार्च' का एलान किया है।
