महात्मा गांधी, भगत सिंह, जतींद्रनाथ दास, पी. श्रीरामुलु, इरोम शर्मिला, अन्ना हजारे, प्रो. जी. डी. अग्रवाल... और अब सोनम वांगचुक। भारत में यह सूची बहुत लंबी है। समय बदला, शासक बदले और मुद्दे भी बदले, लेकिन व्यवस्था के खिलाफ विरोध जताने और अपनी बात को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने का सबसे अचूक और शक्तिशाली तरीका आज भी एक ही है-'अनशन' या 'भूख हड़ताल'। अनशन कुछ दिनों का रहा हो या फिर 16 साल तक खिंचा हो, इसने हर दौर में उस देश के दिल को झकझोरा है जो अन्याय के खिलाफ लड़ाई में अहिंसक प्रतिरोध की अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व करता है।
वर्तमान में, परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्रों की संस्था ’कॉकरोच जनता पार्टी’ (कॉजपा) के साथ एकजुटता दिखाते हुए शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे हैं। उनके इस आंदोलन का आज 20वां दिन है। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद वांगचुक का यह संकल्प समसामयिक भारतीय इतिहास में भूख हड़ताल की उसी गौरवशाली और दार्शनिक परंपरा का हिस्सा है, जिसकी नींव राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने रखी थी।
सत्याग्रह का अंतिम हथियार: गांधीवादी दर्शन
महात्मा गांधी के लिए उपवास या अनशन केवल एक राजनीतिक दबाव बनाने का जरिया नहीं था। उनके अनुसार, यह एक गहरे आत्मिक और दार्शनिक विचार से उपजा हुआ कदम था। PTI की रिपोर्ट के अनुसार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर अजय गुडावर्थी कहते हैं- "गांधीजी उपवास को सिर्फ सरकार को झुकाने का साधन नहीं मानते थे, बल्कि वे इसे अपने इरादों को पवित्र करने के लिए 'आत्म-शुद्धि' का एक तरीका मानते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि तर्कों और बहसों से इरादे साफ नहीं होते, बल्कि स्वेच्छा से तकलीफ सहने की तैयारी से होते हैं।"

1924 में अपने उपवास के दौरान युवा इंदिरा गांधी के साथ महात्मा गांधी (फोटो- Indira Gandhi memorial )
बापू ने किया था 18 बार अनशन
गांधीजी ने अपनी पत्रिका 'हरिजन' में लिखा था कि एक सत्याग्रही को कभी भी स्वयं को असहाय या उपायों से वंचित महसूस नहीं करना चाहिए। उनके लिए उपवास अंतिम उपाय था-ठीक वैसे ही जैसे किसी हिंसक व्यक्ति के लिए तलवार अंतिम हथियार होती है। गांधीजी ने अपने जीवन में अलग-अलग राष्ट्रीय और सामाजिक कारणों से 18 बार उपवास किए। इसकी शुरुआत दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स आश्रम से हुई थी। उनका सबसे लंबा अनशन 21 दिनों तक चला। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता (सांप्रदायिक सौहार्द), छुआछूत के खिलाफ और बिना किसी आरोप के अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को हिरासत में लिए जाने के विरोध में बार-बार अपने शरीर को तपाया। 13 जनवरी 1948 को बिड़ला हाउस में देश में शांति बहाली के लिए अपने जीवन का आखिरी उपवास शुरू करने के ठीक दो सप्ताह बाद उनकी हत्या कर दी गई थी।
भगत सिंह और जतींद्रनाथ दास की जेल-हड़ताल
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, अनशन का एक और रूप देखने को मिला, जो आत्म-शुद्धि से आगे बढ़कर 'अधिकारों की जंग' बन गया। साल 1929 में जॉन सॉन्डर्स की हत्या के मामले में जेल में बंद क्रांतिकारी भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और जतींद्रनाथ दास ने जेल की अमानवीय स्थितियों के खिलाफ ऐतिहासिक भूख हड़ताल शुरू की।
उनकी मांग बहुत स्पष्ट थी-उन्हें सामान्य अपराधियों के बजाय 'राजनीतिक कैदी' का दर्जा दिया जाए। साथ ही भोजन, कपड़े, साफ-सफाई, किताबें और अखबारों के मामले में यूरोपीय कैदियों के समान बराबरी का व्यवहार मिले। इस ऐतिहासिक हड़ताल के दौरान क्रांतिकारी जतींद्रनाथ दास ने 63 दिनों के कड़े अनशन के बाद अपने प्राणों की आहुति दे दी। वहीं, भगत सिंह ने 116 दिनों के लंबे संघर्ष के बाद अपना अनशन तब तोड़ा, जब वे जेल प्रशासन से भारतीय कैदियों के लिए महत्वपूर्ण सुधारों को मंजूरी दिलाने में सफल रहे।
जब भूख हड़ताल ने बदल दिया भारत का मानचित्र
आजादी के बाद स्वतंत्र भारत में भी अनशन की ताकत ने इतिहास की दिशा बदली। गांधीजी के परम अनुयायी पी. श्रीरामुलु ने भाषाई आधार पर तेलुगु भाषी लोगों के लिए एक अलग 'आंध्र राज्य' के गठन की मांग को लेकर अक्टूबर 1952 में आमरण अनशन शुरू किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस मांग के सख्त खिलाफ थे।
नेहरू के कड़े विरोध के बावजूद श्रीरामुलु अपने संकल्प पर अडिग रहे और अनशन के 58वें दिन उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद पूरे क्षेत्र में इस कदर हिंसक विरोध-प्रदर्शन भड़के कि केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और देश का नक्शा बदलते हुए भाषाई आधार पर 'आंध्र प्रदेश' के गठन की रूपरेखा तैयार करनी पड़ी।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की भूख हड़ताल का पोस्टर (फोटो- Punjab State Archives)
इरोम शर्मिला और अन्ना हजारे
समसामयिक भारत में अनशन की सबसे लंबी और भावुक दास्तां मणिपुर की 'आयरन लेडी' इरोम शर्मिला के नाम दर्ज है। 'सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम' (AFSPA) के विरोध में उन्होंने 5 नवंबर 2000 को अपनी भूख हड़ताल शुरू की, जो 16 साल तक चली। यह दुनिया की सबसे लंबी भूख हड़ताल का रिकॉर्ड है। इस दौरान उन्हें प्रशासन द्वारा बार-बार गिरफ्तार किया गया और नाक में नली डालकर जबरन जीवित रखा गया। हालांकि, 2016 में जब उन्होंने अनशन खत्म कर राजनीतिक रास्ता चुना, तो चुनावी राजनीति ने उन्हें नकार दिया, लेकिन उन्होंने इस क्रूर कानून के खिलाफ देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में एक बड़ी राजनीतिक अलख जगाई।
इसी तरह, अगस्त 2011 में भ्रष्टाचार-विरोधी 'जनलोकपाल कानून' बनाने की मांग को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे दिल्ली के रामलीला मैदान में भूख हड़ताल पर बैठे। उनका 11 दिनों का यह अनशन आधुनिक भारत के सबसे बड़े जन आंदोलनों में तब्दील हो गया, जिसने पूरे देश की चेतना और राजनीति को हिलाकर रख दिया था। इसी कड़ी में साल 2018 में पर्यावरणविद् प्रो. जी. डी. अग्रवाल का नाम भी जुड़ता है, जिन्होंने गंगा नदी के अविरल प्रवाह और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली जल विद्युत परियोजनाओं को रोकने के लिए 111 दिनों का लंबा अनशन किया और 68 वर्ष की आयु में दम तोड़ दिया।
सोनम वांगचुक और परीक्षा प्रणाली का संकट
आज इतिहास की वही कड़ियाँ जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के रूप में खुद को दोहरा रही हैं। देश की परीक्षा प्रणालियों में आई गड़बड़ियों और पेपर लीक के खिलाफ छात्रों की आत्महत्याओं से व्यथित होकर वांगचुक पिछले 20 दिनों से भूखे हैं। 'कॉकरोच जनता पार्टी' (कॉजपा) के इस आंदोलन के माध्यम से वे केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और पीड़ित परिवारों के लिए 1 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
गंभीर रूप से कमजोर हो चुके वांगचुक ने संकल्प लिया है कि वे '20 जुलाई तक किसी भी कीमत पर जीवित रहेंगे', क्योंकि इसी दिन छात्रों का संसद मार्च प्रस्तावित है। जंतर-मंतर पर जुट रही युवाओं और नागरिकों की भारी भीड़ यह साबित करती है कि सत्ता भले ही बहरी हो जाए, लेकिन जब कोई सत्याग्रही अपने शरीर को कष्ट देकर मौन उपवास पर बैठता है, तो उसकी गूंज को दबाना किसी भी हुकूमत के लिए आसान नहीं होता।
