Delimitation Bill : 20 जुलाई यानी सोमवार से संसद के मानसूत्र सत्र की शुरुआत हो रही है। हर बार की तरह इस बार भी मानसून सत्र के हंगामेदार रहने के आसार हैं। इस सत्र के दौरान सरकार जहां कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की कोशिश करेगी तो वहीं विपक्ष उसे मुद्दों पर घेरने और कठघरे में खड़ा करने का प्रयास करेगा लेकिन इस बार सबसे ज्यादा जिस विधेयक पर सभी की नजरें लगी हैं, वह परिसीमन विधेयक है। समझा जाता है कि इस विधेयक को पारित कराने के लिए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लेकर आ सकती है। चूंकि, यह संविधान संशोधन विधेयक होगा ऐसे में इसे पारित कराने के लिए सरकार को साधारण नहीं बल्कि दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। एक्सपर्ट मान रहे हैं कि मौजूदा राजनीतिक समीणकरणों को देखते हुए इस बार इस विधेयक के पारित होने में दिक्कत नहीं आएगी। फिलहाल, परिसीमन विधेयक पर सरकार की रणनीति एवं फ्लोर मैनेजमेंट की परीक्षा होगी। इस विधेयक का सबसे ज्यादा विरोध मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस कर रही है।
बजट सत्र में पारित नहीं हो पाया विधेयक
पिछले बजट सत्र के दौरान सरकार ने परिसीमन विधेयक को पारित कराने की कोशिश की लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो पाई। सूत्रों का कहना है कि सरकार अब मानसून सत्र में इस विधेयक को पारित कराने के रास्ते पर बढ़ सकती है। इस विधेयक का इरादा लोकसभा में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर करीब 850 करना है, अभी लोकसभा में सदस्यों की कुल संख्या 543 है। इसके साथ ही यह विधेयक संसद एवं राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करेगा। महिलाओं के लिए यह 33 प्रतिशत आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव में लागू होगा।
पीएम ने कहा था-बिल की अड़चनों को दूर करेंगे
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 जिसे 16 अप्रैल 2026 को कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में पेश किया था। लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखता है, जिसमें 815 सीटें राज्यों से और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों से चुनी जाएंगी। बिल में यह भी प्रावधान है कि 2027 की जनगणना पूरी होने से पहले ही परिसीमन आयोग का गठन कर दिया जाए, ताकि महिला आरक्षण जल्द लागू हो सके। लेकिन 17 अप्रैल को जब यह बिल लोकसभा में वोटिंग के लिए आया, तो इसके पक्ष में 298 मत और विपक्ष में 230 वोट पड़े।
PM Modi
संवैधानिक संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत से सरकार दूर रह गई। बजट सत्र के दौरान इस विधेयक के गिर जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वह इसे पारित कराने में आने वाली अड़चनों को दूर करेंगे।
NCP ने दिए समर्थन के संकेत
सूत्रों का कहना है कि एनडीए के पास दो-तिहाई का बहुमत नहीं है लेकिन वह विपक्षी दलों के सदस्यों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। INDI ब्लॉक की बड़ी पार्टी शरद पवार के गुट वाली एनसीपी-एसपी ने इस बिल का समर्थन करने के संकेत दिए हैं। एनसीपी-एसपी की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने बुधवार को कहा कि परिसीमन विधेयक पर अभी उनकी पार्टी ने कोई निर्णय नहीं लिया है। उन्होंने कहा कि सरकार यह भरोसा दे कि इस विधेयक से सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत की वृद्धि होगी तो इसका विरोध करना बाकी दलों के लिए आसान नहीं रहेगा।
दक्षिण भारत का डर!
आंकड़ों से परे, इस बिल की सबसे बड़ी राजनीतिक बाधा तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों के दलों से है। इन्हें डर है कि जनसंख्या नियंत्रण और बेहतर सामाजिक संकेतकों के बावजूद परिसीमन के बाद संसद में उनका राजनीतिक प्रभाव घट सकता है। इन राज्यों का तर्क है कि जिन राज्यों ने राष्ट्रीय परिवार नियोजन नीतियों को ईमानदारी से लागू किया, उन्हें अब सीटों के मामले में नुकसान क्यों उठाना पड़े? यही वजह है कि यह सिर्फ बहुमत जुटाने का मसला नहीं, बल्कि संघीय ढांचे और क्षेत्रीय अस्मिता से जुड़ा गहरा राजनीतिक सवाल बन गया है।
मानसून सत्र में क्या बदलेगा?
रिपोर्टों में कहा गया है कि 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलने वाले मानसून सत्र में सरकार इस बिल को दोबारा लाने की तैयारी में है। पिछली बार की तुलना में राजनीतिक समीकरण कुछ बदले जरूर हैं, और खबरों के मुताबिक अब NDA के पास YSRCP के 4 सांसदों समेत कुल 298 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 लोकसभा सांसद और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के 6 सांसद भाजपा-नीत एनडीए के साथ आ जाने से दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की केंद्र की एनडीए सरकार की कोशिशों को एक नई गति मिली है। एनडीए के रणनीतिकारों का दावा है कि अप्रैल में लोकसभा में गठबंधन की संख्या 298 थी, जो अब बढ़कर 329 हो गई है।
Rahul Gandhi
...तो विपक्षी दल नरम रुख अपना सकते हैं
भाजपा नेताओं और सरकारी सूत्रों का कहना है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद बने नए राजनीतिक समीकरणों ने विपक्षी दलों के साथ बातचीत के नए रास्ते खोले हैं। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा ने कांग्रेस से दूरी बनने के बाद डीएमके के साथ भी बातचीत फिर शुरू की है और पार्टी को भरोसा दिलाया है कि परिसीमन को लेकर उसकी चिंताओं का समाधान किया जाएगा। सरकार को यह उम्मीद भी है कि यदि प्रस्तावित विधेयक में सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में समान रूप से 50% वृद्धि का प्रावधान किया जाता है, तो कुछ विपक्षी दल अपना रुख नरम कर सकते हैं।
क्रॉस-वोटिंग, बहिष्कार पर टिकी है सरकार की रणनीति!
यानी 360 के जादुई आंकड़े से सिर्फ 62 वोट कम। लेकिन यह फासला अब भी बहुत बड़ा है। अगर विपक्ष सख्त व्हिप जारी करे और शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करे, तो सरकार अपनी मौजूदा ताकत के दम पर यह संशोधन गणितीय रूप से पास ही नहीं करा सकती। सरकार की कामयाबी अब पूरी तरह इस पर टिकी है कि या तो भारी क्रॉस-वोटिंग हो, या फिर विपक्ष सदन का बहिष्कार कर दे, जिससे 'उपस्थित और मतदान करने वाले' सदस्यों की संख्या घट जाए और दो-तिहाई का आंकड़ा अपने आप छोटा हो जाए।
Amit Shah
गृह मंत्री शाह तभी बढ़ाएंगे कदम...
राज्यसभा में भी भाजपा की संख्या बढ़ने की संभावना है। टीएमसी के सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर रॉय और प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने के बाद 24 जुलाई के बाद भाजपा के सदस्यों की संख्या बढ़कर 117 हो जाएगी, जो अब तक का उसका सबसे बड़ा आंकड़ा होगा। सात मनोनीत सदस्यों, तीन निर्दलीय सांसदों और एनडीए सहयोगियों के समर्थन से सत्तारूढ़ गठबंधन की संख्या 153 तक पहुंचने की उम्मीद है। हालांकि, संविधान संशोधन के लिए आवश्यक 164 सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से यह अभी भी 11 सदस्य कम रहेगा। सरकारी सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मानसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयक तभी आगे बढ़ाएंगे, जब आवश्यक संख्या सुनिश्चित हो जाएगी। फिलहाल एनडीए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पीछे है, लेकिन भाजपा नेतृत्व को भरोसा है कि क्षेत्रीय दलों से लगातार संपर्क और राजनीतिक समर्थन के जरिए यह कमी जल्द पूरी की जा सकती है।
