एक्सप्लेनर्स

Indus Water Treaty: क्या है सिंधु जल संधि, पाकिस्तान के साथ क्यों चल रहा 62 साल से विवाद?

  • Authored by: अमित कुमार मंडल
  • Updated Apr 18, 2023, 01:38 PM IST

आइए जानते हैं कि क्या है सिंधु जल संधि और इसे लेकर क्यों भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद रहता है।

Image

जानिए क्या है सिंधु जल संधि

Photo : PTI

Indus Waters Treaty- सिंधु जल संधि से जुड़े मामलों पर संचालन समिति की छठी बैठक 17 अप्रैल 2023 को हुई। बैठक में सिंधु जल संधि की चल रही संशोधन प्रक्रिया का जायजा लिया गया। संचालन समिति की बैठक में सिंधु जल संधि की संशोधन प्रक्रिया की समीक्षा हुई। जल शक्ति मंत्रालय के जल संसाधन विभाग के सचिव पंकज कुमार की अध्यक्षता में हुई बैठक में विदेश सचिव वी एम क्वात्रा भी शामिल हुए। इस संशोधन प्रक्रिया पर पाकिस्तान शुरू से ही आपत्ति जताता रहा है। आइए जानते हैं कि क्या है सिंधु जल संधि और इसे लेकर क्यों भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद रहता है।

कब हुई थी संधि?

लगभग छह दशक पहले 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि (IWT) पर हस्ताक्षर किए, जिसकी मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के बाद नौ साल की बातचीत हुई और इसे विश्व बैंक ने सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय संधियों में से एक कहा था। 1960 में संधि पर हस्ताक्षर किए जाने के समय अमेरिका के राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ते और उन्होंने इसे "एक बहुत ही निराशाजनक विश्व परिदृश्य में एक उज्ज्वल स्थान" बताया था। यह संधि दोनों देशों द्वारा सिंधु नदी के पानी के उपयोग से जुड़ी है। भारत के पास पूर्वी नदियों - ब्यास, सतलज और रावी का पूरा नियंत्रण है,- जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों का पानी हासिल करने की अनुमति है, जिसे मानना भारत के लिए जरूरी है। चिनाब, झेलम और सिंधु पश्चिमी नदियां जम्मू और कश्मीर से होकर बहती हैं और इन्हीं नदियों से पाकिस्तान को पानी मिलता है।

तनाव के केंद्र में पनबिजली परियोजनाएं

इस संधि पर इसी साल फरवरी में तनाव बढ़ गया था जब भारत ने पनबिजली परियोजनाओं के निर्माण पर बार-बार आपत्ति जताते हुए समझौते को लागू करने में इस्लामाबाद की लगातार हठधर्मिता पर पाकिस्तान को नोटिस भेजा था। झेलम और चिनाब नदियों की सहायक नदियों पर समझौते और दो पनबिजली केंद्रों को लेकर एक दशक से अधिक समय से दोनों देशों के बीच गतिरोध बना हुआ है। इस विवाद को पड़ोसी देशों के बीच दशकों पुराने कश्मीर मुद्दे से जोड़कर भी देखा जाता है।

किशनगंगा जलविद्युत परियोजना

झेलम की एक सहायक नदी में किशनगंगा जलविद्युत परियोजना शामिल है। 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया था। चूंकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदी के पानी के इस्तेमाल की अनुमति थी, उसने भारत की परियोजना के खिलाफ आपत्तियां उठाईं और दावा किया कि यह नदी के जल स्तर को कम करेगा। एक और परियोजना जिसका पाकिस्तान ने विरोध किया, वह है चिनाब नदी पर निर्माणाधीन रातले नदी परियोजना। 2021 में पीएम मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 850 मेगा वाट पनबिजली परियोजना के लिए 5,281 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दी, जिसका उद्देश्य केंद्र शासित प्रदेश में बिजली आपूर्ति की स्थिति में सुधार करना है।

2010 में किशनगंगा परियोजना को चुनौती देते हुए पाकिस्तान हेग के स्थायी मध्यस्थता न्यायालय पहुंचा और नई दिल्ली पर संधि का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। 2011 में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में नीलम-झेलम परियोजनाओं और किशनगंगा सुविधा की समीक्षा के लिए कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के दौरे के बाद भारत को इससे जुड़ा डेटा पेश करने के लिए कहा गया था। दो साल बाद अदालत ने भारत को परियोजना के लिए न्यूनतम पानी देने के लिए कहा। 9 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड (क्यूमेक्स) के न्यूनतम प्रवाह की अनुमति दी गई, जो भारत सरकार के 4.25 क्यूमेक्स के प्रस्ताव से कहीं अधिक था। हालांकि, नई दिल्ली बांध का निर्माण जारी रखने की भी अनुमति दी जो पाकिस्तान के लिए झटका था।

2016 में नियंत्रण रेखा पर झड़पों से श्रमिकों में दहशत फैल गई और कुछ समय के लिए निर्माण बाधित हुआ। उस समय कर्मियों को गुरेज से बांदीपोरा भेज दिया गया था। पाकिस्तान ने 2016 में विश्व बैंक से एक मध्यस्थता अदालत की स्थापना की सुविधा देने की भी गुजारिश की। तब विश्व बैंक ने मध्यस्थता अदालत और तटस्थ विशेषज्ञ दोनों के संबंध में अपने प्रक्रियात्मक दायित्वों को पूरा करने की बात कही। उसने कहा, यह संधि विश्व बैंक को यह तय करने का अधिकार नहीं देती है कि क्या एक प्रक्रिया को दूसरे पर वरीयता लेनी चाहिए, बल्कि यह क्षेत्राधिकार के निर्धारण को निहित करती है। साथ ही विश्व बैंक ने सक्रिय रूप से दोनों देशों को मुद्दों को हल करने के लिए एक तंत्र पर सौहार्दपूर्ण ढंग से सहमत होने के लिए प्रोत्साहित किया।

पाकिस्तान के लिए जीवन रेखा

सिंधु जल को पाकिस्तान के लिए एक जीवन रेखा माना जाता है, जिसे दुनिया के सबसे अधिक पानी से जुड़े तनाव वाले देशों में गिना जाता है। 2018 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की एक रिपोर्ट ने पानी की गंभीर कमी का सामना कर रहे देशों की सूची में पाकिस्तान को तीसरे स्थान पर रखा। इसके चलते परमाणु हथियार रखने वाले इन दो राष्ट्रों के बीच जलवायु संबंधी संघर्ष की आशंका बनी रहती है। वहीं, भारत के जल शक्ति मंत्रालय ने हाल ही में एक दस्तावेज जारी कर कहा था कि देश घरेलू उपयोग के लिए पश्चिमी नदियों के पानी का उपयोग कर सकता है, जिसमें कृषि उपयोग और हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर का उत्पादन शामिल है। इसमें कहा गया है कि भारत को संधि के अनुबंध ई में बताए गए विभिन्न उद्देश्यों के लिए पश्चिमी नदियों पर 3.6 मिलियन एकड़ फीट तक पानी के भंडारण की अनुमति है।

भारत ने इसी साल जनवरी में सिंधु जल संधि में संशोधन को लेकर पाकिस्तान को नोटिस भेजा था। इस नोटिस के भेजे जाने के बाद शुरू में पाकिस्तान ने कोई भी बात नहीं करने की अकड़ दिखाई, लेकिन जल्द ही बातचीत करने को तैयार हो गया। पाकिस्तान ने एक बयान में कहा कि भारत ने 25 जनवरी को सिंधु जल आयुक्त के जरिए पाकिस्तान को संधि के अनुच्छेद 12 के तहत संशोधन के लिए बातचीत का नोटिस भेजा था। भारत ने नोटिस में सिंधु जल की समीक्षा और संसोधन की मांग रखी थी। पाकिस्तान नेक नीयत से संधि को लागू करने और अपनी जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। जवाब सिंधु जल आयुक्त के जरिए भेजा गया था।

नोटिस में भारत ने क्या कहा था

नोटिस में भारत ने कहा था कि 2017 से 2022 के बीच स्थायी सिंधु आयोग की पांच बैठकों में से किसी में भी पाकिस्तान ने अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं करवाई। पाक लगातार इस मुद्दे पर चर्चा करने से इनकार करता रहा है। इसलिए भारत को नोटिस जारी करना पड़ा है। इस नोटिस का मकसद 90 दिनों के अंदर पाकिस्तान को अंतर-सरकारी बातचीत करने का मौका देना है। ऐसा नहीं करने पर भारत अपनी तरफ से कोई भी कदम उठाने को स्वतंत्र है।

क्या भारत इस समझौते को तोड़ सकता है

भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 का हवाला देते हुए यह कह कर पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान चरमपंथी गुटों का उसके खिलाफ इस समझौते का इस्तेमाल कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का कहना है कि अगर मूलभूत स्थितियों में बदलाव हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है। लेकिन भारत के लिए समझौता तोड़ना आसान नहीं है। भारत समय-समय पर पानी को नियंत्रित करने पर अपने भौगोलिक अधिकारों का हवाला देता आया है, लेकिन अभी तक इस तरह का सख्त कदम नहीं उठाया है।

अमित कुमार मंडल
अमित कुमार मंडलauthor

अमित मंडल टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में न्यूज डेस्क पर Assistant Editor के रूप में काम कर रहे हैं। प्रिंट, टीवी और डिजिटल—तीनों माध्यमों में कुल मिलाकर 15 सालों से अधिक का अनुभव उन्हें खबरों को देखने की व्यापक दृष्टि देता है। ब्रेकिंग न्यूज, लाइव ब्लॉग, स्पेशल स्टोरीज और एक्सप्लेनेर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। एंगल चुनने की कला, खबरों की गति को समझना और समय पर सही जानकारी पहुंचाना—ये उनकी सबसे बड़ी खूबियां हैं। अमित अपने करियर में करीब 20 हजार से अधिक न्यूज आर्टिकल, एनालिसिस और एक्सप्लेनर पब्लिश कर चुके हैं।

और पढ़ें
End of Article