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क्या होता है राजनयिक पासपोर्ट, राहुल गांधी को क्यों सरेंडर करना पड़ा था इसे? जानें नॉर्मल पासपोर्ट से कितना है अलग

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated May 26, 2023, 06:01 PM IST

Rahul Gandhi Passport Case: राहुल गांधी ने पासपोर्ट के लिए एनओसी क्यों मांगी? उन्होंने अपना राजनयिक पासपोर्ट सरेंडर क्यों किया था? ये राजनयिक पासपोर्ट होता क्या है और कौन इसे इस्तेमाल कर सकता है? सामान्य पासपोर्ट से यह किस तरह से अलग है? आइए जानते हैं सभी सवालों के जवाब...

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Rahul Gandhi Passport Case

Photo : BCCL

Rahul Gandhi Passport Case: कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को शुक्रवार को बड़ी राहत मिली है। दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने राहुल गांधी की नया पासपोर्ट (Rahul Gandhi Passport) जारी करने की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर दिया है। कोर्ट की तरफ से उन्हें तीन साल के लिए एनओसी दी गई है। हालांकि, राहुल गांधी ने 10 साल के लिए एनओसी की मांग की थी। कोर्ट के आदेश के बाद अब राहुल गांधी नया पासपोर्ट बनवा सकेंगे।

राहुल गांधी को लेकर कोर्ट के इस फैसले के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर यह पूरा मामला है क्या? राहुल गांधी ने पासपोर्ट के लिए एनओसी क्यों मांगी? उन्होंने अपना राजनयिक पासपोर्ट (Diplomatic Passport)सरेंडर क्यों किया था? ये राजनयिक पासपोर्ट होता क्या है और कौन इसे इस्तेमाल कर सकता है? सामान्य पासपोर्ट से यह किस तरह से अलग है? आइए जानते हैं सभी सवालों के जवाब...

पहले मामले को समझें

बीते दिनों गुजरात की सूरत कोर्ट ने राहुल गांधी को मोदी सरनेम मामले में सजा सुनाई थी। इसके बाद राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द कर दी गई थी। सदस्यता जाते ही राहुल गांधी के वे अधिकार भी छिन गए थे, जो बतौर सांसद मिलते हैं। इसके बाद राहुल गांधी को अपना राजनयिक पासपोर्ट भी सरेंडर करना पड़ा था। अब राहुल जल्द ही अमेरिका दौरे पर जाने वाले हैं, ऐसे में उन्हें विदेश की यात्रा करने के लिए नए पासपोर्ट की जरूरत थी।

पासपोर्ट के लिए कोर्ट से एनओसी क्यों चाहिए?

दरअसल, राहुल गांधी चर्चित नेशनल हेराल्ड केस में आरोपी हैं। इस केस में वे जमानत पर हैं। ऐसे में अगर उन्हें नया पासपोर्ट चाहिए तो उन्हें कोर्ट से एनओसी की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि राहुल गांधी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

अब जानिए राजनयिक पासपोर्ट होता क्या है?

राजनयिक पासपोर्ट मरून रंग का होता है। यह भारतीय राजनयिकों, सरकारी अधिकारियों और उन चुनिंदा व्यक्तियों को दिया जाता है, जो भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में यात्रा करते हैं। इस पासपोर्ट को रखने वाले व्यक्ति को यात्रा के दौरान और विदेश में भारतीय दूतावासों में विशेष सुविधा दी जाती है। इसके अलावा एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन भी सामान्य लोगों की तुलना में काफी आसानी से हो जाता है। राजनयिक पासपोर्ट पांच साल या उससे कम की अवधि के लिए जारी किए जाते हैं।

सामान्य पासपोर्ट से कैसे है अलग?

राजनयिक पासपोर्ट, एक सामान्य पासपोर्ट से काफी अलग होता है। सबसे पहले तो राजनयिक पासपोर्ट जहां मरून रंग का होता है तो वहीं सामान्य पासपोर्ट नीले रंग का होता है। वहीं सामान्य पासपोर्ट 10 साल के लिए जारी किया जाता है तो वहीं राजनयिक पासपोर्ट पांच साल या इससे कम समय के लिए जारी होता है। राजनयिक पासपोर्ट राजनयिक मिशनों पर भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों के लिए एक आधिकारिक पहचान दस्तावेज के रूप में कार्य करता है। इसके अलावा इस तरह के पासपोर्ट को रखने वाला व्यक्ति सामान्य तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कुछ विशेषाधिकार रखता है। इसमें मेजबान देश में गिरफ्तारी, हिरासत और कुछ कानूनी कार्यवाही से प्रतिरक्षा शामिल है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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