साल 2013 में उस दौरान के अमेरिकी सदर बराक ओबामा के सिपहसालारों ने तेहरान के साथ बातचीत की सिलसिला शुरू किया। ये दौर दो सालों तक चला, ओबामा की रूखसती के बाद ट्रंप सरकार 1.O ने सत्ता संभाली तो इस सिलसिले को और बढ़ाया गया। इस शानदार पहल का खुलासा यूएन की ओर से भी किया गया, इन सबके के बावजूद ये दौर थम गया। ट्रंप सरकार 1.O के बाद जैसे ही अमेरिकी तख्त पर जो बिडेन तख्तनशीं हुए तो उन्होनें इस ओर ध्यान देना भी गंवारा नहीं समझा। उस कथित बातचीत का दौर इतिहास के भूले बिसरे पन्ने में सिमटकर रह गया। उस सुलह के सिलसिले को शांति पहल और तेहरान-वाशिंगटन रिश्ते की नयी ताबीर कहकर पेश किया गया था, लेकिन जैसे ही इस पर साझा सहमति की बात आयी तो मामला खटाई में पड़ गया नतीजन दोनों के तालुक्कातों में तल्खियां पहले से ज्यादा बढ़ गयी।
ठंडे बस्ते में गया JCPOA
वियना में 14 जुलाई 2015 को वाशिंगटन और तेहरान समेत ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस, और जर्मनी ने संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) पर आपसी रजामंदी ज़ाहिर की। इसके तहत तेहरान ने यूरेनियम संवर्धन की रफ्तार को कम करके सेंट्रीफ्यूज की तादाद को भी घटा दिया। इसके एवज़ में अमेरिका समेत दूसरे देशों ने ईरान पर लगाए प्रतिबंधों में ढील दी ताकि ईरानी इक्नॉमी राहत की सांस ले सके। ईरान ने सभी को भरोसा दिया था कि वो अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम का इस्तेमाल हथियार बनाने के लिए नहीं करेगा। साल 2018 तक आतेआते अमेरिका ने खुद को JCPOA से अलग कर लिया। तेहरान पर फिर से बैन की चाबुक चला दी गयी। जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान ने भी JCPOA की शर्तों को मानना बंद कर दिया, जिसके साथ ये समझौता कमजोर पड़ता चला गया।
ओबामा को मिली थी थोड़ी कामयाबी
फिलहाल वाशिंगटन और तेहरान नाज़ुक होते हालातों के बीच बातचीत की मेज पर वापसी कर रहे है। ऐसे में दुनिया भर के लोगों खासतौर से कूटनीतिज्ञों के निगाहें इस ओर लगी हुई है कि बारह साल पहले जो बातचीत का दौर शुरू होकर थम गया था, उससे हालिया होने वाली वार्ता किस मायने में अलग होगी? गौरतलब है कि अमेरिकी सदर काफी तीखे लहज़े में ये साफ कर चुके है कि वो बातचीत के जरिए सुलगते मामलों का हल निकलना चाहते है, अगर उनकी ये कवायद नाकामयाब रही तो मैदान में अमेरिकी जंगबाज़ों को ईरान के खिलाफ उतार दिया जायेगा। साफ है कि दोनों ही खेमे एक दूसरे के खिलाफ ज़हर उगलने के बावजूद मामले का हल सियासी गलियारों में घुसकर निकलना चाह रहे है। समझौता, बातचीत और नेकनीयती से समस्या का समाधान निकलना बेहतरीन कदम है, जिसे ओबामा ने असल मायने में हासिल किया था। इसी कवायद का असर था कि अयातुल्ला अली खामेनेई के सिपहसालारों ने यूरेनियम उन्नत करना कम कर दिया था।
डगमगाया है मध्यपूर्व का शक्ति संतुलन
ओबामा के कार्यकाल के दौरान यूरेनियम संवर्धन रोककर तेहरान भले ही बैकफुट पर आ गया हो लेकिन उसने इस मौके को जमकर भुनाया। उन दिनों IRGC ने दबे-छिपे पश्चिम एशिया में अपने मोबालाइजेशन को काफी बढ़ाया। बता दे कि ओबामा ने इरादतन तौर पर उस बातचीत में तेल अवीव और खाड़ी मुल्कों को शामिल नहीं किया। साथ ही उन्होनें मध्य-पूर्व के कई मुल्कों की चिंताओं को दरकिनार करते हुए पूरी तरह से नज़र अंदाज़ कर दिया था। बेमन से ही सही तेहरान उस समझौते पर राज़ी हुआ, यूरेनियम संवर्धन को उसने रोका। इसके एवज़ में उसने अपने वर्चस्व का विस्तार बगदाद, सना, दमिश्क, बेरूत और गाजा तक कर लिया। अमेरिकी ढील के चलते ईरान ने अकूत पैसा अपनी जंगी कवायदों में लगाया, जिसके चलते मध्य-पूर्व का शक्ति संतुलन बुरी तरह डगमगा गया।
नयी शांति वार्ता का पुराना एजेंडा
अब ओमान दूसरी बार अमेरिकी-ईरानी वार्ता का गवाह बनने जा रहा है। इस बार मस्कट में बराक ओबामा के उदारवादी रूख़ की जगह ट्रंप का आक्रामक रवैया रहेगा। बातचीत के मसले वहीं 12 साल पुराने वाले है, जिनमें खासतौर से शामिल है, पश्चिम एशिया में ईरानी दबदबे पर नकेल कसना, तेहरान के गैर-सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम को रोकना, मध्यपूर्व के विद्रोही (शिया) गुटों को मिलने वाली ईरानी तकनीक, पैसा और हथियार को जड़ से खत्म करना। गौरतलब है कि इन तीन मुद्दों को लेकर ओबामा का ज्यादा जोर गैर-सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम वाले समझौते पर था, जिसे हासिल करने में वो आंशिक तौर पर कामयाब भी रहे थे।
मस्कट पहुंचने से पहले ट्रंप ने बनाया दबाव
मौजूदा तनातनी के बीच मामले पर ट्रंप का नज़रिया बराक ओबामा के मुकाबले ज्यादा साफ और मजबूत रहा है। मौके की नज़ाकत भांपते हुए वो बैकफुट पर भी आए। सीरिया में कत्लोगारत के बावजूद उन्होनें असद की कारगुज़ारियों को दरकिनार किया और सब्र की लक्ष्मण रेखा के पीछे कायम रहे। अब मस्कट पहुंचने से पहले ही ट्रंप मामले को खासा गर्माये हुए है। बातचीत की बिसात पर अपने मोहरे आगे रखने से पहले ही वो मध्यपूर्व में अमेरिकी सेना की मूवमेंट को बढ़ा चुके है। व्हाइट हाउस में बेंजामिन नेतन्याहू का ख़ैर-मक़्दम, ईरानी पेट्रोलियम के एक्सपोर्ट पर नकेल कसना, हूतियों पर एमक्यू-9 रीपर ड्रोन की बमबारी और ईरान को जंग में झोंकने से जुड़े उनके खुले बयान उनकी मंशा को काफी हद तक साफ कर देते है। पुख्ता कयास लगाए जा रहे है कि मस्कट में ट्रंप ईरानी नेताओं के सामने एकतरफा बात रखते हुए अपनी शर्तें पर उन पर थोपेगें। इसी फेहरिस्त में हाल ही में अमेरिकी हुकूमत के खास नुमांइदे स्टीव विटकॉफ ने ईरान से राब्ता करना शुरू कर दिया है, साफ है बातचीत में जो भी होगा और उससे निकलकर जो कुछ भी सामने आयेगा वो पश्चिम एशिया का मुस्तकबिल तय करेगा।
बराबरी की टक्कर देता तेहरान
अमेरिका के सामने ईरान खुद को किसी भी मामले में कमतर नहीं रखना चाहता। गाहे बगाहे वो कई मौकों पर वाशिंगटन को सख्त पैगाम देने से नहीं चूकता। अयातुल्ला अली खामेनेई का रूख़ अमेरिका को लेकर हमेशा तल्ख ही रहा, साथ ही उन्होनें आखिरी कदम उठाने की छूट अपनी सरकार को दे रखी है। पिछले दरवाज़े से वो लगातार वाशिंगटन को चुनौती देना जारी रखे हुए है, तेल अवीव के साथ शांति समझौते को लेकर हिज़्बुल्लाह की नाफरमानी, अमेरिकी अपील को दरकिनार करते हुए हूतियों की ओर से तिज़ारती जहाज़ों पर हमले और उनका महीने भर की भारी बमबारी के बीच मैदान में टिके रहना इसी की बानगी है। होने वाली कथित बातचीत के दौरान इनकी बुनियाद पर तेहरान अपनी मजबूती ज़ाहिर करेगा।
ट्रंप के लिए बेहतरीन मौका
ये ट्रंप के लिए बेहतरीन मौका है कि वो बातचीत कर अपने लिए ईरान से बेहतर डील हासिल करे। अपने साफ और मजबूत रूख की बदौलत ट्रंप तेहरान की चालों को मात दे सकते है। मध्यपूर्व का शक्ति संतुलन फिलहाल इस्राइल के खेमे में बना हुआ है, इसी के चलते हमास, हिजबुल्लाह और हूतियों की कार्रवाईयां लगभग थम सी गयी हैं। इन्हीं नॉन स्टेट एक्टर्स के दम पर तेहरान हथियारबंद कार्रवाई, धमकी और फिरौती को अंज़ाम दिया करता है। बातचीत शुरू होने से पहले ही ट्रंप ने तेल से होने वाली तेहरान की कमाई पर रोक लगा दी, इसके चलते पूरे मुल्क की माली हालत खस्ताहाल हो चली है। ट्रंप ये नकेल तब तक कसे रहेगें जब तक ईरान उनकी बातें मान नहीं लेता। भले ही दोनों ने अपनी स्थिति मजबूत बनाने की भरसक कोशिश की है, लेकिन इनके बीच तेहरान के पास गिने चुने ही रास्ते बचे है। ट्रंप हर हाल में मनमाफिक़ डील हासिल करेगें साथ ही उनके पास हर मोर्चे पर बढ़त भी है।
इस लेख के लेखक राम अजोर जो स्वतंत्र पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं।
Disclaimer: ये लेखक के निजी विचार हैं, टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल इसके लिए उत्तरदायी नहीं है।
