दिल्ली में पिछले 15 वर्षों में कई ऐतिहासिक आंदोलन हुए हैं—चाहे वह 2012 का निर्भया आंदोलन हो या 2021 की ट्रैक्टर रैली। लेकिन 20 जुलाई को हुए 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के 'संसद चलो' मार्च ने हर किसी को चौंका दिया। इस घटना ने एक बार फिर दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया इनपुट पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। इस हिंसक झड़प में 200 से अधिक लोग घायल हुए, जिनमें पुलिसकर्मियों की संख्या (118) छात्रों (60) से दोगुनी थी। आइए समझते हैं कि आखिर सुरक्षा तंत्र से कहां और कैसे चूक हुई।
1. खुफिया इनपुट बनाम जमीनी हकीकत
पुलिस और गृह मंत्रालय ने आंदोलनकारियों की संख्या का जो अनुमान लगाया था, वह पूरी तरह फेल साबित हुआ। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, रविवार शाम तक जंतर-मंतर पर 3,000 से 5,000 लोग थे और सोमवार को 7,000 से 8,000 लोगों के जुटने की उम्मीद थी। लेकिन वास्तविक संख्या कहीं अधिक थी। सोमवार सुबह तक संसद मार्ग की ओर जाने वाली सड़कों पर लगभग 1 लाख प्रदर्शनकारी उमड़ पड़े। इनमें बड़ी संख्या में 12 से 17 साल के नाबालिग और अन्य राज्यों से आई महिलाएं शामिल थीं, जो व्हाट्सएप ग्रुप्स के जरिए एक-दूसरे से जुड़ी थीं।
2. टर्निंग पॉइंट: सोनम वांगचुक को अस्पताल शिफ्ट करना भारी पड़ा
NEET-UG पेपर लीक मामले को लेकर यह आंदोलन पिछले एक महीने से शांतिपूर्ण चल रहा था और इसमें बहुत ज्यादा भीड़ नहीं जुट रही थी। लेकिन 18 जुलाई को पासा पलट गया। पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक (जो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर 28 जून से भूख हड़ताल पर थे) को पुलिस ने तड़के जबरन उठाकर सफदरजंग अस्पताल शिफ्ट कर दिया। सरकार को लगा था कि इससे आंदोलन खत्म हो जाएगा, लेकिन इसने 'आग में घी' का काम किया। वांगचुक के साथ हुई इस कार्रवाई से आक्रोशित होकर हजारों युवा दिल्ली पहुंच गए।
3. सरकार का ढीला रवैया: सिर्फ दोपहर तक की थी तैयारी
जमीनी तैयारियां बताती हैं कि सरकार को लग रहा था कि यह मार्च दोपहर तक कमजोर पड़ जाएगा। शुरुआत में केवल 2,000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था, जो 1 लाख की भीड़ के सामने बेहद कम थे।
इंटरनेट बैन की टाइमिंग: गृह मंत्रालय ने शुरुआत में इंटरनेट सुबह 6 बजे से केवल दोपहर 12 बजे तक के लिए बंद किया था। जब स्थिति हाथ से निकल गई, तो इसे शाम 6 बजे तक बढ़ाना पड़ा।
मेट्रो स्टेशन बंद: भीड़ को रोकने के लिए DMRC ने आनन-फानन में 5 मेट्रो स्टेशन बंद किए, जिससे आम दफ्तर जाने वाले लोग घंटों फंसे रहे और दिल्ली ठप हो गई।
4. साजिश या लापरवाही? जंतर-मंतर पर पत्थरों से भरा ट्रक
इस पूरे आंदोलन में सबसे रहस्यमयी बात रही जंतर-मंतर के पास पत्थरों से लदे एक ट्रक का मिलना। CJP चीफ अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर सवाल उठाया कि जब इलाके में धारा 163 (BNSS) लागू थी, तो पत्थरों से भरा ट्रक वहां कैसे पहुंचा? उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को फंसाने के लिए खुद पत्थरबाजी की साजिश रच रही थी। वहीं, पुलिस का मानना है कि इस छात्र आंदोलन में कुछ असामाजिक तत्वों और 'बाहरी लोगों' ने घुसपैठ की थी, जिन्होंने सुनियोजित तरीके से हिंसा भड़काई।
छात्रों के गुस्से की गहराई को भांपने में सरकार-पुलिस पूरी तरह रही नाकाम
यह स्पष्ट है कि सरकार और दिल्ली पुलिस युवाओं और छात्रों के गुस्से की गहराई को भांपने में पूरी तरह नाकाम रही। हफ्तों पहले से अल्टीमेटम मिलने के बावजूद, न तो समय रहते प्रदर्शनकारियों से कोई ठोस संवाद शुरू किया गया और न ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए। नतीजा—दिल्ली ने एक और हिंसक और अराजक दिन देखा।