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मध्य प्रदेश में UCC विधेयक पारित: अब क्या बदलेगा, किन नियमों का पड़ेगा असर और किसे मिलेगी छूट? जानिए विस्तार से

मध्य प्रदेश विधानसभा में आज यूसीसी विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया है। इससे पहले सदन में इसे लेकर काफी हो-हल्ला हुआ। अब जबकि यह बिल पारित हो गया है तो इसे राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। ऐसे में यह जानना बेहद अहम है कि आखिर यूसीसी क्या होता है और मध्य प्रदेश से पहले किन-किन राज्यों में ये लागू है। साथ ही यह भी कि मध्य प्रदेश में इसके लागू होने के बाद क्या क्या बदलेगा...विस्तार से जानते हैं

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मध्य प्रदेश विधानसभा में यूसीसी विधेयक पारित। (फोटो- AI)
Edited by: Shiv Shukla
Updated Jul 21, 2026, 17:39 IST
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भोपाल: मध्य प्रदेश विधानसभा ने भारी हंगामे और लंबी बहस के बाद समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) विधेयक, 2026 पारित कर दिया है। इसके साथ ही राज्य में एक समान पारिवारिक कानून लागू करने का रास्ता साफ हो गया है। सरकार का दावा है कि यह कानून सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करेगा, जबकि विपक्ष का कहना है कि इसके कुछ प्रावधानों पर अभी भी गंभीर चर्चा की जरूरत है।

विधेयक पारित होने के बाद मध्य प्रदेश उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो गया है, जिन्होंने समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है। हालांकि कानून लागू होने की प्रक्रिया में अब अधिसूचना और अन्य प्रशासनिक औपचारिकताएं भी पूरी की जाएंगी।

क्या है समान नागरिक संहिता?

समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून है। देश में क्रिमिनल कोड तो सबके लिए समान है। आपराधिक मामलों से जुड़े सभी कानून समान हैं, लेकिन संपत्ति, शादी, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने जैसे सिविल मामलों में अलग-अलग धर्म के लोगों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य धर्मों, रीति-रिवाजों और परंपराओं पर आधारित निजी कानूनों को सभी के लिए एक समान कानून के साथ बदलना है। सीधे शब्दों में कहें तो इसका उद्देश्य यह है कि देश के सभी नागरिकों के अधिकार समान हैं चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या विचारधारा का हो। निजी कानून मान्य नहीं होंगे।

क्या यूसीसी भारतीय संविधान का हिस्सा है?

समान नागरिक संहिता का जिक्र संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 44 में किया गया है। इसमें कहा गया है- राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। दरअसल, संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी कि देश में एक समान कानून होगा जो विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने के संबंध में हर धर्म के पुराने निजी कानूनों की जगह लेगा।

भारत में UCC का इतिहास क्या है?

भारत में समान नागरिक संहिता का विचार नया नहीं है। वर्ष 1835 में ब्रिटिश शासन के दौरान पहली बार भारतीय कानूनों में एकरूपता लाने का विचार सामने आया था। हालांकि अंग्रेजों ने आपराधिक और प्रशासनिक कानूनों में समानता लागू की, लेकिन विवाह और धार्मिक मामलों को अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों के अधीन ही रखा। स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद-44 के माध्यम से भविष्य में समान नागरिक संहिता लागू करने का लक्ष्य रखा, लेकिन विभिन्न सामाजिक और धार्मिक कारणों से इसे पूरे देश में लागू नहीं किया जा सका।

कहां कहां लागू है यूसीसी

देश में गोवा ही एकमात्र राज्य है जहां समान नागरिक संहिता पुर्तगाली काल से ही लागू है। 1867 में पुर्तगाल ने यहां एक पुर्तगाली नागरिक संहिता लागू की थी और 1869 में इसे पुर्तगाल के विदेशी प्रांतों (जिसमें गोवा भी शामिल था) तक बढ़ा दिया गया। आजादी के बाद भी इसे बरकरार रखा गया। हालांकि, जमीनी स्तर पर यह काफी जटिल है। इसे गोवा सिविल कोड के नाम से भी जाना जाता है। गोवा में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समेत सभी धर्म और जातियों के लिए एक फैमिली लॉ है। यानी शादी, तलाक और उत्तराधिकार के कानून हिंदू, मुस्लिम और ईसाई सभी के लिए एक समान हैं। वहीं, आजादी के बाद अब तक सिर्फ उत्तराखंड, गुजरात, असम में यूसीसी लागू किया गया है। उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना था जहां आजादी के बाद जनवरी 2025 में UCC लागू हुआ था। वहां विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप के लिए समान नियम लागू किए गए। बाद में गुजरात और असम ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया। इन तीनों राज्यों की तरह मध्य प्रदेश ने भी आदिवासी समुदाय को UCC के दायरे से बाहर रखने का निर्णय लिया है।

मध्य प्रदेश में UCC की तैयारी कैसे हुई?

मध्य प्रदेश सरकार ने अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में छह सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति को विभिन्न राज्यों के मॉडल का अध्ययन करने, विशेषज्ञों से चर्चा करने और जनता से सुझाव लेकर मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

समिति ने अलग-अलग जिलों में जाकर सामाजिक संगठनों, महिला समूहों, विधि विशेषज्ञों और आम नागरिकों से राय ली। सरकार ने ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भी सुझाव आमंत्रित किए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा में दावा किया कि तीन करोड़ से अधिक नागरिकों को सुझाव देने के लिए आमंत्रित किया गया और दस लाख से अधिक लोगों ने UCC का समर्थन किया।

एमपी यूसीसी।

एमपी यूसीसी।

किन प्रमुख विषयों को शामिल किया गया है?

विवाह के लिए एक समान व्यवस्था

नए कानून के तहत राज्य में सभी समुदायों के लिए विवाह का सरकारी पंजीकरण अनिवार्य होगा। इससे विवाह का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार होगा और भविष्य में किसी भी कानूनी विवाद की स्थिति में प्रमाण उपलब्ध रहेगा। सरकार का कहना है कि इससे बाल विवाह, फर्जी विवाह और विवाह संबंधी धोखाधड़ी के मामलों पर भी नियंत्रण लगाने में मदद मिलेगी।

बहुविवाह पर रोक

विधेयक के सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में बहुविवाह पर रोक शामिल है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि राज्य में एक समय में केवल एक वैध विवाह को ही कानूनी मान्यता मिलेगी। इसका उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान वैवाहिक व्यवस्था लागू करना बताया गया है।

तलाक की समान कानूनी प्रक्रिया

UCC के लागू होने के बाद विवाह विच्छेद केवल कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही संभव होगा। मुख्यमंत्री ने विधानसभा में कहा कि अब कोई भी व्यक्ति न्यायालय के बाहर विवाह समाप्त नहीं कर सकेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल "तलाक, तलाक, तलाक" कहकर विवाह समाप्त करने जैसी व्यवस्था को कानूनी मान्यता नहीं होगी।

भरण-पोषण और महिलाओं के अधिकार

सरकार का कहना है कि नए कानून में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को विशेष महत्व दिया गया है। तलाक या अलगाव की स्थिति में भरण-पोषण के अधिकार स्पष्ट होंगे। महिलाओं को संपत्ति और पारिवारिक अधिकारों के मामलों में समान कानूनी संरक्षण देने का भी प्रावधान किया गया है।

उत्तराधिकार और संपत्ति

विधेयक का उद्देश्य पैतृक और पारिवारिक संपत्ति के मामलों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करना है। महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों को समान बनाने की दिशा में प्रावधान किए गए हैं ताकि उत्तराधिकार संबंधी विवाद कम हों और सभी नागरिकों के लिए समान नियम लागू हों।

लिव-इन रिलेशनशिप के लिए नए नियम

मध्य प्रदेश का UCC लिव-इन रिलेशनशिप को भी कानूनी दायरे में लाता है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार लिव-इन संबंधों का पंजीकरण आवश्यक होगा। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य महिलाओं और ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा करना है। पंजीकरण होने पर भरण-पोषण और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में कानूनी स्पष्टता बढ़ेगी।

आदिवासी समुदाय को क्यों रखा गया बाहर?

मध्य प्रदेश सरकार ने स्पष्ट किया है कि आदिवासी समुदाय को UCC के दायरे से बाहर रखा गया है। राज्य की लगभग 22 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति वर्ग से आती है और उनकी सामाजिक परंपराएं, रीति-रिवाज तथा पारंपरिक व्यवस्थाएं अलग हैं। सरकार का कहना है कि उत्तराखंड और गुजरात की तरह मध्य प्रदेश में भी आदिवासी समाज की परंपराओं को संरक्षित रखने के लिए उन्हें इस कानून से छूट दी गई है। मुख्यमंत्री ने विधानसभा में भी दोहराया कि सरकार आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।

आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

UCC लागू होने के बाद सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग नियमों के बजाय एक समान कानूनी प्रक्रिया लागू होगी। विवाह पंजीकरण अनिवार्य होने से रिकॉर्ड व्यवस्थित होगा। बहुविवाह पर रोक और न्यायालय आधारित तलाक प्रक्रिया से कानूनी विवादों में स्पष्टता आने की उम्मीद है।

संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में महिलाओं के अधिकार मजबूत होने का दावा किया जा रहा है। वहीं लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी ढांचे में लाने से ऐसे संबंधों में रहने वाले लोगों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों, को कानूनी सुरक्षा मिलने की संभावना है।

UCC पर सरकार और विपक्ष के अलग-अलग तर्क

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा में कहा कि यह कानून भेदभाव समाप्त करने और सभी नागरिकों को समान अधिकार देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने कहा कि राम से रहीम, रविंदर से रॉबिन, अमर से एंथोनी और अकबर तक सभी पर एक समान कानून लागू होना चाहिए। सरकार का दावा है कि UCC सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और कानूनी एकरूपता सुनिश्चित करेगा।

दूसरी ओर विपक्ष ने विधेयक पर कई आपत्तियां जताईं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने चर्चा के दौरान संशोधन पेश किए और सरकार पर राजनीतिक उद्देश्य से कानून लाने का आरोप लगाया। हालांकि सदन ने विपक्ष के संशोधनों को स्वीकार नहीं किया और ध्वनिमत से विधेयक पारित हो गया।

आगे क्या होगा?

विधानसभा से विधेयक पारित होने के बाद अब इसे राज्यपाल की अनुमति के लिए भेजा जाएगा। राज्यपाल की अनुमति मिलने के बाद विधेयक कानून बन जाता है। इसते बाद सरकार इसकी अधिसूचना जारी करेगी। इसके बाद नियम (Rules) बनाए जाएंगे और संबंधित विभागों को नई व्यवस्था लागू करने की जिम्मेदारी दी जाएगी। विवाह पंजीकरण, लिव-इन पंजीकरण, उत्तराधिकार और अन्य पारिवारिक मामलों के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी तय की जाएंगी।
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