Andy Burnham : ब्रिटेन ने कम समय के अंतराल में कई प्रधानमंत्रियों को देखा है। इस देश में बीते एक दशक में छह प्रधानमंत्री आए तो जरूर लेकिन ये सभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। यही हश्र किएर स्टार्मर का भी हुआ। डाउनिंग स्ट्रीट से 20 जुलाई को उनकी भी विदाई हो गई। स्टार्मर के बाद पीएम पद की कुर्सी पर अब लेबर पार्टी के ही एंडी बर्नहम की ताजपोशी हुई है। 56 साल के बर्नहम का काफी तेज तर्रार और ऊर्जावान नेता माना जाता है। उन्हें पार्टी के करीब 95 प्रतिशत नेताओं का समर्थन है। एंडी ब्रिटेन के पीएम बन गए हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या उनकी नीतियां भी स्टार्मर जैसी रहेंगी या वह उनसे अलग रास्ता चुनेंगे? उनके आने से भारत और ब्रिटेन के संबंधों पर क्या कोई असर पड़ेगा? इसे हम यहां समझने की कोशिश करेंगे-
कारोबार-रणनीतिक सहयोग पर रहेगा ज्यादा जोर-एक्सपर्ट
भारत और ब्रिटेन के द्विपक्षीय संबंधों की जानकारी रखने वाले एक्स्पर्ट की राय है कि एंडी के आने से दोनों देशों के संबंधों पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। एंडी भी अपने पूर्ववर्ती स्टार्मर की नीतियां आगे बढ़ाते हुए नजर आ सकते हैं। खासतौर से ब्रिटेन और भारत के बीच व्यापार और रणनीतिक सहयोग पर ज्यादा जोर रहेगा। भारत के प्रति एंडी के नजरिए को परिभाषित करने के लिए कुछ एक्सपर्ट साल 2019 में उनकी मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली की यात्रा का जिक्र करते हैं। उनकी इस यात्रा का आयोजन मैनचेस्टर इंडिया पार्टनरशिप (MIP) ने किया था। एमआईपी का गठन भारत के साथ कारोबार एवं विश्वविद्यालय से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए किया गया। अपनी इस यात्रा के दौरान एंडी ने कहा, 'भारत, ग्रेटर मैनचेस्टर की अंतरराष्ट्रीयकरण रणनीति का एक प्रमुख बाजार है, क्योंकि यह सिटी-रीजन के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। हालांकि, ये अवसर एकतरफा नहीं बल्कि पारस्परिक हैं। ग्रेटर मैनचेस्टर भी भारत की आर्थिक विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने और उसके विकास लक्ष्यों को हासिल करने में सहयोग कर रहा है।'
'भारत के साथ मजबूत संबंध चाहते हैं बर्नहम'
भारत-ब्रिटेन के रिश्ते पर प्रवासी समूह लेबर फ्रेंड्स ऑफ इंडिया (LFIN) के चेयरमैन राजेश अग्रवाल ने कहा कि एंडी इस बात को समझते हैं कि विकास लंबे समय के संबंधों से आता है। मैनचेस्टर में उनके ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो कारोबार, विश्वविद्यालय, नवाचार, भारत और मैनचेस्टर के बीच सीधी उड़ान सेवा में कनेक्टिविटी बेहतर बनाते हुए उन्होंने नई दिल्ली के साथ संबंधों को मजबूत बनाने की दिशा में काम किया है। यही नहीं, आगे के सालों में ग्रेटर मैनचेस्टर ने भारतीय कारोबार, स्टार्ट-अप्स, विश्वविद्यालय, एआई, डिजिटल सेवा, फिनटेक, हेल्थ टेक्नॉलजी एवं उन्नत उत्पादन के क्षेत्र में दिल्ली का सहयोग लिया है। मैनचेस्टर में भारत की महावाणिज्यदूत विशाखा यादववंशी ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि मेयर के रूप में एंडी बर्नहैम ने भारत के साथ व्यापार, विश्वविद्यालयों, नवाचार (इनोवेशन) नेटवर्क और क्षेत्रीय साझेदारियों के जरिए मजबूत संबंधों को बढ़ावा देने का समर्थन किया है।
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'पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं भारत-यूके संबंध'
हालांकि बर्नहैम ने शासन में कई बदलावों का संकेत दिया है, लेकिन विदेश नीति के मामले में भारत के साथ संबंधों में निरंतरता बनाए रखने की उम्मीद जताई जा रही है। ब्रिटेन में भारत के नए महावाणिज्य दूतावास की पहली प्रमुख के रूप में यदुवंशी ने मार्च 2025 में मैनचेस्टर स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास की स्थापना को एक 'ऐतिहासिक उपलब्धि’ बताया। उन्होंने कहा, 'बर्नहैम की 2019 की भारत यात्रा, दिसंबर 2025 में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त विक्रम दोरईस्वामी से मुलाकात तथा मार्च 2026 में इंडिया-नॉर्थ इंग्लैंड ऑपर्च्युनिटी समिट में उनकी वर्चुअल भागीदारी इस साझेदारी के प्रति उनकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है।’ लंदन स्थित 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज’ के दक्षिण एशिया मामलों के वरिष्ठ फेलो राहुल रॉय चौधरी ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत-ब्रिटेन संबंध कभी इतने मजबूत नहीं रहे जितने अब हैं। पिछले वर्ष दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की पारस्परिक यात्राओं और इस सप्ताह सीईटीए लागू होने से यह संबंध और मजबूत हुए हैं।
'बर्नहम का फोकस कई दिशाओं में बंट सकता है'
हालांकि, इस आशावाद के बीच विशेषज्ञों ने सतर्क रहने की भी सलाह दी है। ब्रिटिश-भारतीय थिंक टैंक 1928 इंस्टीट्यूट ने कहा, 'भारत नीति और भारतीय प्रवासी समुदाय (डायस्पोरा) के दृष्टिकोण से एंडी बर्नहैम को एक मजबूत आधार विरासत में मिलेगा। लेकिन उनके घरेलू एजेंडे पर अधिक ध्यान रहने की वजह से उनका फोकस कई दिशाओं में बंट सकता है। इसलिए मौजूदा गति को बनाए रखने के लिए 'इंडिया टास्क फोर्स' का गठन करना और/या 'इंडिया ट्रेड एनवॉय' नियुक्त करना एक विवेकपूर्ण कदम होगा।'
तीसरी कोशिश में पीएम पद तक पहुंचे बर्नहम
ग्रेटर मैनचेस्टर के 56-वर्षीय पूर्व महापौर बर्नहम अपनी तीसरी कोशिश में देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं। उन्होंने वर्ष 2010 और 2015 में भी प्रधानमंत्री पद की दौड़ में अपनी किस्मत आजमाई थी, लेकिन असफल रहे। पूर्व महापौर ने पिछले महीने उत्तरी इंग्लैंड के मेकरफ़ील्ड में उपचुनाव जीतकर वेस्टमिंस्टर की राजनीति में वापसी की। इस जीत को 'रिफ़ॉर्म यूके’ (एक दक्षिणपंथी पार्टी) से बढ़ते ख़तरे का मुकाबला करने की उनके नेतृत्व क्षमता के सबूत के तौर पर देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद दिये अपने पहले भाषण में बर्नहम ने एक नई '10-वर्षीय’ योजना का वादा किया है। वह उम्मीद कर रहे हैं कि 2029 में होने वाले अगले आम चुनाव तक इस नई जिम्मेदारी में अपना सब कुछ झोंककर वह कई कार्यकाल तक पद पर बने रहेंगे। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से स्तानक बर्नहम का जन्म उत्तर-पश्चिम इंग्लैंड के मर्सीसाइड में हुआ था। उनके पिता टेलीफ़ोन इंजीनियर थे और मां एक जीपी क्लिनिक में रिसेप्शनिस्ट थीं। वह वेल्स की सीमा से सटे चेशायर में पले-बढ़े।
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गॉर्डन ब्राउन के मंत्रिमंडल में बनाई खास पहचान
बर्नहम ने लेबर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के लिए अनुसंधानकर्ता और विशेष सलाहकार के तौर पर राजनीतिक पारी की शुरुआत की तथा 2001 में ग्रेटर मैनचेस्टर के ली से सांसद के तौर पर अपना पहला आम चुनाव जीता। प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के कार्यकाल में एक होनहार युवा सांसद के तौर पर उभरने के बाद, उनके उत्तराधिकारी गॉर्डन ब्राउन की मंत्रिमंडल में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। ब्राउन सरकार में उन्हें राजकोष मामलों के प्रमुख से लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय तक कई अहम जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने 2010 में प्रधानमंत्री पद के लिए पहली बार नाकाम दावेदारी पेश की और उसी साल आम चुनाव में लेबर पार्टी की हार के समय वह मिलिबैंड के छद्म मंत्रिमंडल में काम किया। इसके बाद, 2015 में नेतृत्व की दौड़ में वह जेरेमी कॉर्बिन से हार गए और फिर महापौर बनने की कोशिश की वजह से 2017 में उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देना पड़ा।
बर्नहम को 'किंग ऑफ द नॉर्थ’ की मिली उपाधि
बर्नहम के मैनचेस्टर का महापौर चुने जाने के बाद, उन्हें 'किंग ऑफ द नॉर्थ’कहा जाने लगा। यह नाम अमेरिकी नाटक 'गेम ऑफ थ्रोन्स’से लिया गया था। वह लेबर पार्टी के नेतृत्व के लिए तीसरी बार कोशिश करने का सही मौका तलाश रहे थे जो पिछले सप्ताह मिला और वह सफल रहे। उनकी नीदरलैंड मूल की पत्नी मैरी-फ्रांस वैन हील और 20 की उम्र वाले उनके तीन बच्चे –जिमी, रोजी और ऐनी-मैरी –लंदन और उत्तरी इंग्लैंड के बीच अपना समय बिताएंगे। यह कयास बर्नहम द्वारा 'नंबर 10 नॉर्थ’के दिये गए प्रस्ताव मद्देनजर लगाया जा रहा है। बर्नहम का कहना है कि सत्ता केवल ’10 डाउनिंग स्ट्रीट’ तक ही सीमित न रहे।
