Times Now Navbharat Explainer: जून 2026 में मध्य पूर्व (Middle East Crisis) एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है। कुछ ही दिन पहले जब अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम समझौते (MoU) पर हस्ताक्षर हुए, तो दुनिया ने राहत की सांस ली थी। लेकिन जमीन पर हकीकत बिल्कुल उलट है।
दोनों देशों (US Iran Conflict) के बीच एक बार फिर तनाव इस कदर बढ़ चुका है कि इसे ब्रिंकमैनशिप (Brinkmanship) यानी युद्ध के मुहाने पर खड़े होने की नीति कहा जा रहा है, जहां एक भी गलत कदम वैश्विक तबाही ला सकता है आखिर इस समझौते के बाद भी दोनों देश शांत क्यों नहीं हो रहे हैं? आइए इस पूरे संकट को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।
हालिया टकराव
ताजा तनाव की शुरुआत तब हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर एक मालवाहक जहाज पर हमला करके युद्धविराम के उल्लंघन का आरोप लगाया। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान के राडार सिस्टम, मिसाइल ठिकानों और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण केश्म द्वीप पर भीषण हवाई हमले कर दिए।
इस अमेरिकी कार्रवाई ने ईरान के 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) को भड़का दिया। ईरान ने इसके बाद अमेरिकी ठिकानों पर अब तक का सबसे बड़ा जवाबी हमला करने का दावा किया।
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ईरान ने किया बड़ा दावा
ईरानी मीडिया की मानें तो उन्होंने कुवैत के अली अल सालेम बेस, बहरीन में मौजूद अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के मुख्यालय और जॉर्डन सहित कुल 8 सैन्य अड्डों को निशाना बनाया। उन्होंने दावा किया कि करीब 18 से 21 अमेरिकी टारगेट पूरी तरह तबाह हो गए हैं।

(Photo: ANI)
ईरान के इस दावे पर अमेरिका का जवाब
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय यानी कि पेंटागन ने ईरान के इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे केवल प्रोपेगैंडा बताया है। अमेरिका का कहना है कि उनके एयर डिफेंस सिस्टम ने ज्यादातर ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों को हवा में ही मार गिराया, जिससे उनके ठिकानों को मामूली नुकसान पहुंचा है। इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच 14-17 जून को हुआ सीजफायर समझौता अब वेंटिलेटर पर आ गया है।
साल 2026 में अब तक क्या-क्या हुआ?
फरवरी 2026 में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया। ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई समेत कई शीर्ष नेता मारे गए। ईरान ने जवाबी मिसाइलें दागकर युद्ध शुरू किया। 8 अप्रैल 2026 को पाकिस्तान की मध्यस्थता से दो हफ्ते का अस्थायी युद्धविराम हुआ, जिसमें इजरायल भी शामिल था।
वहीं पर 11-12 अप्रैल को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी अधिकारियों के बीच परमाणु मुद्दे पर बातचीत बेनतीजा रही।
अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी कर दी। इसके बाद 14-17 जून 2026 को अमेरिका-ईरान के बीच MoU पर हस्ताक्षर हुए। राष्ट्रपति ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियन के बीच समझौता हुआ। होर्मुज को खोलने और 60 दिनों में परमाणु वार्ता पूरी करने पर सहमति बनी।
विवाद न थमने के 4 मुख्य वजहें
तमाम बातचीत और समझौतों के बावजूद यह जंग खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। इसके पीछे मुख्य रूप से चार बड़ी वजहें हैं:
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया की सबसे बड़ी तेल लाइफलाइन है। दुनिया का एक-तिहाई समुद्री तेल यहीं से होकर गुजरता है। ईरान इस पूरे रास्ते पर अपना एकाधिकार चाहता है ताकि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था को अपने इशारों पर नचा सके। वहीं, अमेरिका ने इसके जवाब में नौसैनिक नाकेबंदी कर रखी है। यह इलाका अब दोनों के लिए 'ईगो वॉर' और आर्थिक दबाव का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है।
दूसरी वजह परमाणु कार्यक्रमों पर रोक
ईरान किसी भी कीमत पर अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को बंद करने को तैयार नहीं है, क्योंकि उसे लगता है कि परमाणु ताकत ही उसकी सुरक्षा की गारंटी है। दूसरी तरफ, अमेरिका का रुख साफ है कि जब तक ईरान घुटने नहीं टेकता, तब तक आर्थिक प्रतिबंध नहीं हटाए जाएंगे। दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि समझौते के कागजात टेबल पर धरे के धरे रह जाते हैं।
प्रॉक्सी नेटवर्क
ईरान केवल अपनी सेना के दम पर नहीं लड़ रहा है। लेबनान में हिजबुल्लाह और मध्य पूर्व के अन्य उग्रवादी संगठन ईरान के इशारे पर लगातार अमेरिकी और इजरायली ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। भले ही ईरान सरकार समझौते पर दस्तखत कर दे, लेकिन ये प्रॉक्सी ग्रुप्स हमले बंद नहीं करते, जिससे अमेरिका को जवाबी कार्रवाई करनी ही पड़ती है।
घरेलू राजनीति
अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी जनता के सामने एक 'मजबूत और सख्त' कमांडर-इन-चीफ की छवि बनाए रखना चाहते हैं। वहीं, ईरान का नया नेतृत्व अपनी जनता के सामने कमजोर नहीं दिखना चाहता। उनके लिए यह लड़ाई अपनी सत्ता को बचाने की है।
