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बिहार में कितनी सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ेगी जन सुराज पार्टी? समझिए प्रशांत किशोर का सारा प्लान

PK Plan's for Election: बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत आजमाने के लिए अब प्रशांत किशोर पूरी तरह तैयार हो चुके हैं। उन्होंने अपना राजनीतिक दल बना लिया है। जन सुराज पार्टी नाम से उनके दल को चुनाव आयोग ने मंजूरी दे दी है। ऐसे में उनका आगे का प्लान क्या हो सकता है, आपको समझाते हैं।

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प्रशांत किशोर

Photo : टाइम्स नाउ डिजिटल

Prashant Kishor's Political Plan: प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी अब चुनावी रणभूमि पर उतरने के लिए तैयार है। बिहार की सियासत में एक और राजनीतिक दल की आधिकारिक एंट्री हो चुकी है। क्या आप जानते हैं कि पीके की पार्टी कितनी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का प्लान बना रही है? उनके इस फैसले से किस पार्टी को फायदा पहुंचेगा और किसे कितना नुकसान हो सकता है, आपको सारा समीकरण समझना चाहिए।

पीके ने 'जन सुराज पार्टी' के नाम से बनाया राजनीतिक दल

चुनाव रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर ने बुधवार को ‘जन सुराज पार्टी’ के नाम से अपना राजनीतिक दल गठित करने की घोषणा कर दी। पटना के वेटरनरी कॉलेज मैदान में बुधवार को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान किशोर ने यह घोषणा की। इस दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र प्रसाद यादव, राजनयिक से नेता बने पवन वर्मा और पूर्व सांसद मोनाजिर हसन सहित कई जानी मानी हस्तियां मौजूद थीं।

बिहार में तैयार हुआ नया राजनीतिक विकल्प

किशोर ने चंपारण से राज्य की तीन हजार किलोमीटर से अधिक लंबी ‘पदयात्रा’ शुरू करने के ठीक दो साल बाद इस पार्टी का गठन किया, जिसका उद्देश्य लोगों को प्रदेश में एक ‘नया राजनीतिक विकल्प’ देकर उन्हें संगठित करना है। चंपारण से ही महात्मा गांधी ने देश में पहला ‘‘सत्याग्रह’’ शुरू किया था।

बिहार की कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी जन सुराज पार्टी?

इसी साल सितंबर के महीने में राजनीतिक रणनीतिकार की भूमिका से स्वयं राजनेता की भूमिका में आए प्रशांत किशोर ने अपने चुनावी रणनीति के बारे में बताया था। उस वक्त उन्होंने बताया था कि ‘जन सुराज’ एक महीने से भी कम समय में राजनीतिक पार्टी बनने जा रही है और आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में सभी 243 सीट पर चुनाव लड़ेगी। पीके ने कहा था कि 'मैं स्पष्ट कर दूं कि जन सुराज सभी 243 सीट पर चुनाव लड़ेगी, इससे एक भी कम नहीं।'

सत्ता में आते ही प्रशांत किशोर की पार्टी हटाएगी शराबबंदी

इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आईपीएसी) के संस्थापक किशोर पूर्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आम आदमी पार्टी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल जैसे विभिन्न नेताओं के चुनाव अभियानों को संभाल चुके हैं। उन्होंने बिहार में शराबबंदी कानून के बारे में कहा था कि पार्टी की सरकार बनने के एक घंटे के भीतर प्रदेश से शराब पर लगी रोक हटा दी जाएगी।

बिहार में शराबबंदी कानून के आलोचक रहे आईपीएसी संस्थापक ने आरोप लगाया था कि यह नीतीश कुमार की ओर से दिखावा के अलावा और कुछ नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानूर ने शराब की अवैध ‘होम डिलीवरी’ के लिए रास्ता साफ किया। इस कानून के जरिए राज्य को आबकारी शुल्क के माध्यम से अर्जित होने वाले 20,000 करोड़ रुपये से वंचित किया जा रहा है। इसकी आड़ में नेता और नौकरशाह अपनी हिस्सेदारी पा रहे हैं।

भाजपा, कांग्रेस और राजद के प्रति क्या है पीके की राय?

प्रशांत किशोर का मानना है कि कांग्रेस ने लालू प्रसाद के गलत कार्यो के प्रति आंखें मूंद लीं क्योंकि उनकी राजद पिछली संप्रग सरकार की अहम सहयोगी थी। इससे उन्हें सत्ता में बने रहने में मदद मिली, हालांकि राजद के पास कभी भी विधानसभा में बहुमत नहीं था। इसके अलावा बिहार की दुर्दशा के लिए प्रशांत किशोर की नजर में नीतीश कुमार और उनके पूर्ववर्ती लालू प्रसाद को मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं, हालांकि उनका मानना ये भी है कि कांग्रेस और भाजपा भी इसमें दोषी हैं।

'नीतीश का साथ देने से कांग्रेस जैसा होगा भाजपा का हश्र'

प्रशांत किशोर का मानना है कि "शारीरिक और मानसिक रूप से" स्वस्थ नहीं होने के बावजूद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का समर्थन करने के लिए बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का वही हश्र होगा, जो राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद को "जंगल राज" लागू करने में मदद के लिए कांग्रेस का हुआ था। पीके ये तक दावा कर चुके हैं कि कि लोग दोनों प्रतिद्वंद्वी गठबंधनों को उखाड़ फेंकेंगे, जिन्होंने 30 साल से अधिक समय तक राज्य को सबसे गरीब और पिछड़ा बना कर रखा है, ताकि उनकी (किशोर की) पार्टी को 243 सदस्यीय विधानसभा में पूर्ण बहुमत मिल सके।

इसी साल हुए लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद प्रशांत किशोर ने कहा था कि 'लोगों ने हाल के लोकसभा चुनाव में स्पष्ट संदेश दिया है कि वे "अहंकार" बर्दाश्त नहीं कर सकते या किसी भी नेता को उन्हें हल्के में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।' उनका इशारा साफ है कि उन्हें और उनकी जन सुराज पार्टी को हल्के में लेने की गलती नहीं करनी चाहिए।

किन-किन मुद्दों पर मुख्य रूप से फोकस कर रहे हैं पीके?

प्रशांत किशोर की पार्टी का नाम तय हो चुका है, अगले साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। आने वाले एक साल पीके और उनकी पार्टी के लिए बेहद अहम होंगे। शराबबंदी, बेरोजगारी, महंगाई और जनहित से जुड़े मुद्दों की बात करने वाले प्रशांत किशोर ने अपनी कमर कस ली है। वो भले ही ये दावा कर रहे हैं कि लालू और नीतीश दोनों को उनकी पार्टी पटखनी दे देगी, लेकिन ये इतना आसान नहीं है। प्रशांत किशोर को बिहार की जनता स्वीकार करती है या फिर सिरे से नकार देती है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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