4 अगस्त 2026 की बात है, एक नाबालिग लड़की मैनपुरी से नोएडा के लिए निकली। भारी बारिश के चलते वह रास्ता भटक कर परी चौक पहुंच गई। उसी वक्त सड़क से एक स्लीपर बस गुजरी। छात्रा के इशारा करने पर बस रुकी। बस में ड्राइवर और कंडक्टर थे, जिन्होंने छात्रा को उसे सेक्टर-63 तक छोड़ने का झांसा दिया और बस में बैठा लिया। इन दोनों आरोपियों ने बारी-बारी से छात्रा के साथ दुष्कर्म किया। छात्रा रोती-बिलखती रही, लेकिन 47 किलोमीटर लंबे रास्ते में दोनों दरिंदे उसके साथ हैवानियत करते रहे और विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी। देर रात आरोपियों ने छात्रा को ISBT कश्मीरी गेट के पास रिंग रोड पर बदहवास हालत में उतार दिया और फरार हो गए। ऐसी ही घटनाएं महिलाओं के सफर का दायरा तय करती हैं। आइए थोड़ा विस्तार से समझते हैं।
सफर का मतलब किसी पुरुष के लिए दो बिंदुओं के बीच की दूरी तय करना भर है, जो सफर की वास्तविक परिभाषा भी है। लेकिन एक स्त्री के लिए सफर के मायने केवल भौगोलिक दूरी तय करना नहीं है, बल्कि यह लगातार चौकन्ना रहने, मानसिक तनाव और सामाजिक ताने-बाने से जूझने का एक कठिन दौर है। जब यह सवाल पूछा जाता है कि "लड़की के सुरक्षित सफर का दायरा कहां तक है?", तो इसका जवाब किसी नक्शे की सीमाओं में नहीं मिलता। यह दायरा उस अदृश्य दहलीज पर निर्भर करता है, जहां से एक स्त्री सार्वजनिक स्थान में पहला कदम रखती है और शायद उसके पहले से ही।
देहरी के भीतर से शुरू होती सुरक्षा की चिंता
सुरक्षा की बात केवल तब शुरू नहीं होती जब कोई लड़की सड़क पर कदम रखती है, बल्कि इसकी शुरुआत घर की देहरी लांघने से बहुत पहले ही हो जाती है। कौन से कपड़े पहने जाएं ताकि कम से कम नजरें ठहरें, बैग में पेपर स्प्रे, बेहतर रास्ता और खुद ही जल्दी घर लौटने की चिंता। इस सब चीजों का पुलिंदा ढोना ही पर्याप्त है यह जानने के लिए कि एक महिला की स्वतंत्रता पहले से ही कई सामाजिक और पारिवारिक सीमाओं में बंधी होती है। पुरुषों के लिए जो दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है, महिलाओं के लिए वही योजनाबद्ध तैयारी और पहले से किए गए आकलन का विषय बन जाता है। घर के अंदर ही सुरक्षा की यह चिंता इस बात को दिखाती है कि हमारा समाज सार्वजनिक जीवन को स्त्री के लिए स्वाभाविक नहीं मानता।
सड़क पर पहला कदम: नजरों का पहरा और असुरक्षा की शुरुआत
जैसे ही कोई लड़की दरवाजा खोलकर सड़क पर निकलती है, उसका सामना सड़कों-चौराहों पर पुरुषों की घूरती नजरों से होता है, उसके अस्तित्व को केवल एक 'शरीर' मात्र में समेटने की कोशिश करती हैं। जब राह चलते एक अकेला लड़का होता है, तब भी असहजता का माहौल बनता है, लेकिन जब यह संख्या एक से अधिक होकर समूहों में तब्दील होती है, तो यह मोबाइल वल्गस का रूप ले लेती है, यानी वह भीड़ जो आसानी से बहक जाए। एक लड़के की उदंडता अकेले में कहीं कम और समूह में भारी अभद्रता का रूप ले लेती है। सार्वजनिक स्थानों पर लड़कों का यह हुजूम वर्चस्व की भावना से भरा होता है। सीटी बजाना, फब्तियां कसना, तेज आवाज में हंसना या जानबूझकर रास्ता रोकना, ये सभी हरकतें केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि यह संदेश देने की कोशिश हैं कि "यह सड़क उतनी तुम्हारी नहीं है, जितनी हमारी है।"
सार्वजनिक स्थानों पर लैंगिक विषमता
समाजशास्त्र के नजरिए से देखें तो हमारे शहर, सड़कें और सार्वजनिक परिवहन सभी पुरुषों को ध्यान में रखकर गढ़े गए हैं। पत्रकार और लेखिका जेन जैकब्स के शब्दों में, शहर वही सुरक्षित होते हैं जहां सड़कों पर हमेशा आम लोगों की मौजूदगी ('Eyes on the Street') हो। हालांकि, भारतीय परिप्रेक्ष्य में, इन सड़कों पर नजरें तो बहुत हैं, लेकिन वे सुरक्षा देने की बजाय नजरों का आतंक पैदा करती हैं।
स्त्री के लिए किसी सार्वजनिक स्थान का अर्थ पुरुषों से बिल्कुल अलग होता है। एक पुरुष किसी चाय की दुकान या चौराहे पर बिना किसी झिझक के घंटों खड़ा रह सकता है, जबकि एक स्त्री के लिए सार्वजनिक स्थान केवल 'पार' करने का जरिया है, वहां ठहरने का अधिकार उसे आसानी से नहीं मिलता। जब कोई स्त्री सड़क पर रुकती है या सुस्ताती है, तो उसे सामाजिक मानकों के विपरीत देखा जाता है।
क्या 'सुरक्षा' केवल पाबंदियों का पर्याय है?
फेमिनिज्म की नजर से देखें तो वह इस बात पर जोर देता है कि सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की आवाजाही पर रोक लगाना वास्तव में पितृसत्ता को बनाए रखने का एक तरीका है। जिसमें अक्सर समाज समाधान के रूप में महिलाओं को ही सलाह देता है कि यहां न जाओ, उधर से न निकलो। असल में सुरक्षा का दायरा बढ़ाने के बजाय, जोखिम पैदा करने वाले सामाजिक माहौल को बदला जाए। एक सुरक्षित सफर का अर्थ केवल अपराध से बचना नहीं है, बल्कि भयमुक्त होकर सार्वजनिक स्थानों का उपयोग करने का अधिकार होना है। यह मांग केवल शारीरिक सुरक्षा की नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और स्वतंत्रता की मांग है।
निरंतर मानसिक और शारीरिक तनाव का बोझ
एक लड़की का सुरक्षित सफर केवल शारीरिक घटना नहीं है, यह एक गहरा मानसिक अनुभव है। जब कोई लड़की किसी सुनसान सड़क या भीड़भाड़ वाले बस स्टॉप पर खड़ी होती है, तो उसका शरीर और दिमाग लगातार 'फाइट या फ्लाइट' की स्थिति में होता है। पीछे से आती किसी तेज बाइक की आवाज पर चौंकना, ऑटो या कैब में बैठते समय लोकेशन शेयर करना, और लगातार अपने आसपास के माहौल का जायजा लेना, यह निरंतर तनाव स्त्री के आत्म-सम्मान और मानसिक शांति को गहराई से प्रभावित करता है। एक पुरुष जिस स्वतंत्रता और बेफिक्री के साथ सड़क पर चल सकता है, वह बेफिक्री एक स्त्री से छीन ली जाती है।
सफर के दायरे को 'असीमित' बनाने की दिशा
एक लड़की के सुरक्षित सफर का दायरा कहां तक है, इस सवाल का कड़वा सच यह है कि वर्तमान सामाजिक ढांचे में यह दायरा बेहद सिमटा हुआ और अनिश्चित है। यह दायरा सिर्फ वहीं तक है, जहां तक समाज की पितृसत्तात्मक नजरें और भीड़ उसे इजाजत देती है। लेकिन एक संवेदनशील और प्रगतिशील समाज के रूप में हमारी जिम्मेदारी इस दायरे को असीमित बनाने की है। इसके लिए केवल कड़े कानूनों या पुलिस गश्त की आवश्यकता नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव की जरूरत है। पुरुषों में यह संवेदनशीलता विकसित करनी होगी कि सड़कें सभी की हैं और महिलाओं की मौजूदगी को सामान्य माना जाए। कानून लागू कराने वाली एजेंसियों को केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय, सड़क स्तर पर महिलाओं के लिए भयमुक्त माहौल बनाने पर ध्यान देना होगा।
एक स्त्री का सफर तब तक सही मायने में 'सुरक्षित' नहीं कहलाएगा, जब तक कि उसे घर से निकलते समय सुरक्षा की योजना न बनानी पड़े और वह दिन हो या रात, बिना किसी डर के, अपनी शर्तों पर दुनिया को नाप सके। सफर का वास्तविक दायरा वही होना चाहिए जो किसी भी इंसान की आजादी का दायरा होता है। असीमित और भयमुक्त।