Women Safety in India: भारत में आजादी से पहले ही महिला सुरक्षा को लेकर कानून आ गया था, आजादी के बाद यह और सशक्त होते गया। कानून बना, सशक्त हुआ ये एक बात है, लेकिन घटनाओं में कमी नहीं आई। रेप से लेकर महिला उत्पीड़न के तरह-तरह मामले रोज आते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार साल 2024 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4,41,534 मामले दर्ज किए गए थे। इस तरह औसतन हर दिन 1,210 मामले दर्ज हुए। इसमें से 2024 में भारत में बलात्कार के कुल 29,536 मामले दर्ज हुए, मतलब हर दिन रेप के 82 मामले दर्ज हुए। ये मामले तो वो हुए जो सामने आए, ऐसे दर्जनों मामले होते होंगे जो दर्ज ही नहीं होते हैं। अब एक सीधा और सपाट सवाल है, जब कानून है तो फिर अपराध में वृद्धि क्यों, क्या भारत में महिला सुरक्षा पर कानून ही कमजोर है या फिर उसके अमल में कोताही बरती जा रही है? कानून कमजोर है या पुलिस का एक्शन कमजोर होता है?
भारत में महिला सुरक्षा का कानून
सबसे पहले बात करते हैं भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के लिए कौन-कौन से कानून हैं? भारत में महिला अपराधों से निपटने के लिए एक नहीं, कई कानून हैं। खास तौर पर 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों को अलग अध्याय में रखा गया है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में बलात्कार, गैंगरेप, यौन उत्पीड़न, स्टॉकिंग और एसिड अटैक जैसे अपराधों के खिलाफ प्रावधान हैं। घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 घरेलू हिंसा से सुरक्षा देता है, जबकि POSH Act, 2013 कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से बचाव का कानूनी ढांचा देता है।
- अनैतिक देह व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 (Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956) commercial sexual exploitation और human trafficking से निपटने के लिए बनाया गया प्रमुख कानून है।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में धारा 63 से 79 के तहत महिलाओं के खिलाफ अपराधों (जैसे बलात्कार, यौन उत्पीड़न, स्टॉकिंग, एसिड अटैक) के लिए कड़े प्रावधान हैं। इसमें पहचान छिपाकर या शादी के झूठे वादे के जरिए यौन संबंध बनाने पर धारा 69 के तहत अलग अपराध का प्रावधान शामिल है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की जगह आया है, जो एफआईआर (FIR), जांच, गिरफ्तारी और ट्रायल की प्रक्रिया को संचालित करता है। इसमें ई-एफआईआर (e-FIR), फोरेंसिक जांच अनिवार्य करने और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसी तकनीक-आधारित प्रक्रिया शामिल की गई है।
- घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005) महिलाओं को शारीरिक, यौन, मौखिक/भावनात्मक और आर्थिक- हर तरह की घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करता है।
- POSH Act, 2013 (Prevention, Prohibition and Redressal) हर कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से सुरक्षा और आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee) के जरिए निवारण तंत्र देता है।
- POCSO Act, 2012 (Protection of Children from Sexual Offences Act) 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन अपराधों, उत्पीड़न और पोर्नोग्राफी से सुरक्षा प्रदान करता है।
- महिलाओं का अशोभनीय चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986 (Indecent Representation of Women (Prohibition) Act, 1986) विज्ञापनों, किताबों और मीडिया में महिलाओं के अशोभनीय निरूपण को रोकता है।
कानून कमजोर या फिर पुलिस का एक्शन?
अब सवाल ये है कि जब भारत में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर इतने सारे कानून मौजूद हैं, तो फिर क्राइम क्यों नहीं रूक रहा है? इसका एक लाइन में जवाब है, इसका पालन ठीक से नहीं हो रहा है। निर्भया केस में वकील रह चुकीं सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता सीमा समृद्धि कुशवाहा सीधे तौर पर कहती हैं कि कानून कमजोर नहीं है, बल्कि उसे लागू सही से नहीं किया जा रहा है। सीमा कुशवाहा कहती हैं, "जो कानून है, वो काफी स्ट्रांग हैं, सबसे बड़ी समस्या लागू करने की है और ये लागू इसलिए नहीं हो पाता है, क्योंकि लोगों के पास इच्छाशक्ति नहीं है, चाहे इसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति की बात हो, ज्यूडिशियल इच्छाशक्ति की बात हो या पुलिस की बात हो। जबतक इन लोगों की जवाबदेही फिक्स नहीं की जाएगी, तो वो जिम्मेदारी से काम करेगा ही नहीं। किसी के अंदर डर नहीं होगा। कानून का डर सिर्फ आरोपियों या अपराधियों को ही नहीं होना चाहिए, बल्कि सिस्टम में बैठे अधिकारियों को भी कानून का डर होना चाहिए।"
कुछ इसी तरह की बात उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ओपी सिंह (ओमप्रकाश सिंह) भी कहते हैं। पूर्व डीजीपी ओपी सिंह कहते हैं कि कानून कमजोर नहीं है। बल्कि समस्या उसके प्रभावी और निरंतर अमल में है। निर्भया के बाद कानून अधिक कठोर हुए, लेकिन केवल कठोर सजा अपराध नहीं रोकती। पूर्व IPS ओपी सिंह कहते हैं, "काफी हद तक यही चुनौती है। SOP और प्रोटोकॉल्स तभी प्रभावी हैं, जब उनकी जमीनी स्तर पर अनुपालन की नियमित ऑडिट और स्वतंत्र मॉनिटरिंग हो। केवल कागज पर प्रोटोकॉल बनाना पर्याप्त नहीं है। हर स्तर पर यह तय होना चाहिए कि किस अधिकारी की क्या जिम्मेदारी है और उल्लंघन होने पर जवाबदेही किसकी तय होगी।"
पूर्व डीजीपी ओपी सिंह
दिल्ली में निर्भया कांड 2 और उससे उठते सवाल
अभी अगस्त में ही दिल्ली में एक नाबालिग के साथ बस में रेप की घटना होती है। नोएडा से दिल्ली के बीच चलती बस में उसकी आबरू लूटी जाती है, घटना 4 अगस्त को घटती है, लेकिन सार्वजनिक डोमेन में यह मामला 31 अगस्त को आता है। आरोपी इसी दिन गिरफ्तार किए जाते हैं। घटना दिल्ली की है, आरोपी दिल्ली से ही गिरफ्तार होते हैं, घटना के 27 दिनों बाद, मतलब पुलिस के एक्शन की तत्परता देखिए, न मामला सामने आने देती है और न ही आरोपियों को गिरफ्तार करने में तत्परता दिखाती है। अगर पुलिस इस मामले में त्वरित कार्रवाई करती तो शायद आरोपी और पहले गिरफ्तार हो जाते। इसलिए पुलिस की जवाबदेही की बात उठती रही है। एडवोकेट सीमा कुशवाहा कहती हैं, " यहां किसी की भी जवाबदेही तय नहीं है, अगर किसी की ड्यूटी है, जांच करने की है, एक टाइम फ्रेम है इसके लिए, लेकिन अगर वो जांच सही से नहीं करता है, टाइम फ्रेम में नहीं करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं होती है। अगर कोई मैटर हाईलाइट हो जाता है, तो उसमें पुलिसवाले को सस्पेंड कर दिया जाता है, बाद में फिर उनकी कुछ समय बाद बहाली हो जाती है।"
सीमा कुशवाहा- एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट
दिल्ली रेपकांड पर बात करते हुए एडवोकेट सीमा कुशवाहा कहती हैं, "जो लड़की परीचौक से बस में बैठी, उसके साथ गैंगरेप हुआ। अगर इस केस की बात करें तो जो निर्भया केस के बाद गाइडलाइन आई थी कि जो भी बस है, उसमें ब्लैकफिल्म नहीं होगी, पर्दे नहीं होंगे, जहां पर बैरिकेडिग होगी, वहां पर प्रॉपर चेकिंग होगी। अब इस केस में देखिए, परीचौक से लेकर दिल्ली कश्मीरीगेट तक दो तो बड़े चेकपोस्ट थे, वहां पर बस क्यों नहीं चेक हुई? बस में सीसीटीवी काम नहीं कर रहा था। तो इन लापरवाहियों पर किसकी जिम्मेदारी है?
महिला सुरक्षा की चुनौती 'कमजोर कानून' की नहीं
निष्कर्ष यही निकलता है कि भारत में महिला सुरक्षा की चुनौती 'कमजोर कानून' की नहीं, बल्कि 'कमजोर क्रियान्वयन और जवाबदेही के अभाव' की है। निर्भया कांड के बाद से लेकर नए आपराधिक कानूनों तक, कानूनी ढांचा कागजों पर बेहद सख्त और व्यापक हो चुका है। लेकिन कड़े से कड़े प्रावधान भी तब तक बेअसर साबित होते रहेंगे जब तक उन्हें लागू करने वाले तंत्र के पास मजबूत इच्छाशक्ति और जवाबदेही न हो। जब दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में सीसीटीवी, बैरिकेडिंग और चेकिंग के तमाम दिशानिर्देशों के बावजूद वारदातें होती हैं और एफआईआर से लेकर गिरफ्तारी तक हफ्तों का समय लग जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि समस्या पुलिस और प्रशासन के सुस्त रवैये में है। जब तक सिस्टम में बैठे हर जिम्मेदार व्यक्ति की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक कानून चाहे कितना भी कड़ा क्यों न हो जाए, बेटियां सड़कों पर खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाएंगी।
