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Operation Kaveri:कैसे पड़ा ऑपरेशन कावेरी नाम? सूडान से अब तक कितने भारतीयों को बचाया गया; यहां जानें सबकुछ

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Apr 26, 2023, 10:30 AM IST

Operation Kaveri: ऑपरेशन कावेरी के तहत अब तक सूडान में फंसे भारतीयों के दो जत्थे जेद्दा एयरपोर्ट पहुंच चुके हैं। 135 भारतीयों को लेकर तीसरा जत्था भी सूडान से जेद्दा एयरपोर्ट के लिए रवाना हो चुका है। सूडान में करीब 3000 भारतीय फंसे हुए हैं।

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सूडान में भारत का निकासी अभियान ऑपरेशन कावेरी (@MEAIndia)

Photo : Twitter

Operation Kaveri: सूडान (Sudan) इन दिनों संघर्ष की आग में जल रहा है। इस लड़ाई का केंद्र अर्धसैनिक बल रैपिड सपोर्ट फोर्स (RSF) और सेना के बीच छिड़ा यु्द्ध है। दोनों सूडान (Sudan Conflict) में अपने दबदबे के लिए संघर्षरत हैं। इस लड़ाई में अब तक 400 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और करीब 10 दिन से देश युद्ध का मैदान बना हुआ है। इस बीच मोदी सरकार (Modi Government) ने सूडान (Sudan War) में फंसे भारतीयों को बचाने के लिए ऑपरेशन कावेरी (What is operation Kaveri) शुरू किया है। इसके तहत युद्धग्रस्त देश में फंसे करीब 3000 भारतीयों की वापसी के लिए निकासी अभियान चलाया जा रहा है।

भारत सरकार ने इस ऑपरेशन का नाम 'ऑपरेशन कावेरी'(Operation Kaveri kya hai) दिया है। इससे पहले भारत ने अफगानिस्तान में तालिबान का शासन होने के बाद वहां 'ऑपरेशन देवी शक्ति' (Operation Devi shakti) चलाया था। वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध में फंसे भारतीयों को सुरक्षित वापस लाने के लिए 'ऑपरेशन गंगा'(Operation Ganga) चलाया गया था। भारत सरकार द्वारा विदेशों में फंसे भारतीयों को वापस लाने के लिए चलाए गए ऑपरेशन को इस तरह नाम देने की एक खास वजह होती है? आइए जानते हैं सूडान में कितने भारतीय फंसे हैं? अब तक कितनों को बचाया गया और इसे ऑपरेशन कावेरी नाम क्यों दिया गया है?

कितने भारतीय फंसे हैं?

भारत सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, सूडान के अलग-अलग इलाकों में करीब 3000 भारतीय फंसे हुए हैं। इसमें ज्यादातर लोग भारत के दक्षिणी राज्यों में से हैं। जानकारी के मुताबिक, सूडान के बंदरगाह पर करीब 500 भारतीय पहुंच चुके हैं। इन भारतीयों को भारतीय वायु सेना के विमान सी- 130 और INS सुमेधा के जरिए भारत लाया जा रहा है।

अब तक कितने भारतीयों को निकाला गया?

सूडान में फंसे भारतीयों को निकालने के लिए भारत सरकार ने प्रयास तेज कर दिए हैं। विदेश मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, वायुसेना के सी-130जे विमान से 135 अन्य भारतीयों को लेकर तीसरा जत्था सूडान से रवाना हो गया। यह जेद्दा एयरपोर्ट पहुंचेगा। इससे पहले विदेश राज्य मंत्री ने वायु सेना के इसी विमान से 148 लोगों की दूसरे जत्थे की जेद्दा एयरपोर्ट पर अगवानी की। वहीं इससे पहले नौसेना के पोत आईएनएस सुमेधा से 278 भारतीयों को जेद्दा बंदगाह पहुंचाया गया था।

अब जानिए क्यों पड़ा ऑपरेशन कावेरी नाम

एक रिपोर्ट के मुताबिक, सूडान में फंसे ज्यादातर भारतीय दक्षिणी राज्यों के हैं। ऐसे में इस ऑपरेशन को कावेरी नाम दिया गया है। दरअसल, कावेरी कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में बहने वाली प्रमुख नदियों में से एक है। यह नदी इस क्षेत्र की पवित्र नदी मानी जाती है। यहां के लोग इस नदी की पूजा कावेरीअम्मा (मां कावेरी) के रूप में करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, मां के रूप में यह नदी तमाम बाधाओं के बावजूद अपने गंतव्य तक पहुंचती है। भारत सरकार ने इस अपॅारेशन की बागडोर केंद्रीय मंत्री मुरलीधरन को दी है। वह केरल से ही आते हैं।
प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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