दुनिया में जारी अस्थिरता के बीच ब्रिक्स समिट के सफल आयोजन की चर्चा दुनियाभर में हो रही है। दरअसल, 18वें ब्रिक्स समिट (BRICS Summit) के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक संगठन के भीतर मौजूद मतभेदों को दूर करना था।
खासतौर पर पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने ब्रिक्स के दो सदस्य देशों ईरान और यूएई को आमने-सामने ला दिया था। ऐसे समय में भारत के सामने चुनौती थी कि वह एक ऐसी संयुक्त घोषणा पर सभी देशों की सहमति बनाए, जिसमें पश्चिम एशिया के संकट का जिक्र भी हो और ईरान-यूएई जैसे देशों के अलग-अलग हित भी टकराएं नहीं।
भारत की अध्यक्षता में हुई बैठकों और पर्दे के पीछे चली बातचीत के बाद आखिरकार ब्रिक्स देशों ने नई दिल्ली घोषणापत्र को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। इस पूरी प्रक्रिया में भारत ने अलग-अलग पक्षों के बीच संवाद और सहमति बनाने पर जोर दिया। यही वजह है कि इस ब्रिक्स समिट को भारत के लिए एक अहम कूटनीतिक परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा था।
ब्रिक्स में शामिल सदस्य देशों की फाइल फोटो। PTI
ईरान और यूएई के बीच विवाद क्या है?
ब्रिक्स के विस्तार के बाद ईरान और यूएई दोनों इस ग्रुप का हिस्सा बने, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद मतभेदों को और गंभीर बना दिया। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के बाद तेहरान की ओर से खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। इनमें यूएई क्षेत्र भी प्रभावित हुआ। इसके बाद ईरान और यूएई के बीच तनाव बढ़ गया। यानी एक तरफ ब्रिक्स का मंच था, जहां सभी देशों को एक साथ बैठकर साझा घोषणापत्र पर सहमति बनानी थी, वहीं दूसरी तरफ उसके दो सदस्य देशों के हित एक-दूसरे से टकरा रहे थे।
यही कारण था कि ब्रिक्स की शुरुआती बैठकों में पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर संयुक्त भाषा पर सहमति बनाना आसान नहीं रहा। पहले विदेश मंत्रियों की बैठक भी बिना संयुक्त बयान के खत्म हुई थी। इसके बाद भारत के सामने चुनौती और बड़ी हो गई थी।
हालांकि, इस समिट में दोनों देशों ने परिपक्वता दिखाई। शनिवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने शनिवार को संयुक्त अरब अमीरात के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर बातचीत हुई। हालांकि, बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा हुई।
यूएई के राजनेताओं और ईरान के राजनेताओं की फाइल फोटो।
भारत ने कैसे शुरू किया ‘डैमेज कंट्रोल?'
भारत ने इस पूरे विवाद को किसी एक देश के पक्ष या विपक्ष में खड़े होकर हल करने के बजाय डिप्लोमैटिक बैलेंस का रास्ता अपनाया। भारतीय अधिकारियों ने ईरान और यूएई के प्रतिनिधियों के साथ अलग-अलग बातचीत की।
मकसद था कि दोनों देशों के लिए ऐसी भाषा तैयार की जाए, जिस पर वे आपत्ति न करें और ब्रिक्स के बाकी सदस्य भी उसे स्वीकार कर सकें। भारतीय अधिकारियों के साथ रूस, ब्राजील और मिस्र के प्रतिनिधि भी मतभेदों को दूर करने की कोशिशों में शामिल थे।
भारत के लिए यह इसलिए भी जरूरी था क्योंकि ब्रिक्स अब सिर्फ पांच देशों का ग्रुप नहीं रहा। इसका विस्तार हो चुका है और इसमें पश्चिम एशिया, अफ्रीका और एशिया की अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं वाले देश शामिल हैं। ऐसे में अगर पश्चिम एशिया के मुद्दे पर ही संगठन बंट जाता, तो BRICS की सामूहिक ताकत और विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते थे।
ब्रिक्स सदस्य के राजनेताओं के साथ पीएम मोदी की फोटो।
घोषणापत्र पर सहमति बनाना इतना मुश्किल क्यों था?
ब्रिक्स के संयुक्त घोषणापत्र में पश्चिम एशिया के युद्ध का जिक्र होना तय माना जा रहा था। लेकिन असली सवाल था कि युद्ध के लिए जिम्मेदारी किस तरह तय की जाए और किन शब्दों का इस्तेमाल किया जाए। ईरान चाहता था कि युद्ध और उसके खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई को स्पष्ट रूप से उठाया जाए, जबकि यूएई सहित कुछ देशों के लिए ऐसी भाषा स्वीकार करना आसान नहीं था, जिससे वह सीधे किसी एक पक्ष के साथ खड़ा दिखाई दे। यही वजह थी कि घोषणापत्र के शब्दों को लेकर लंबी बातचीत चली। रिपोर्टों के मुताबिक, बातचीत शनिवार तड़के तक जारी रही और अंततः सदस्य देश संयुक्त दस्तावेज पर सहमत हो गए।पीएम मोदी और पेजेशकियन की मुलाकात क्यों अहम थी?
ब्रिक्स समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से भी मुलाकात की। यह दोनों नेताओं की दो सप्ताह से भी कम समय में दूसरी मुलाकात थी। इससे पहले दोनों की मुलाकात एससीओ समिट (SCO Summit) के दौरान हुई थी। पीएम मोदी ने साफ कहा कि पश्चिम एशिया के सभी मुद्दों का समाधान संवाद और कूटनीति के जरिए होना चाहिए। उन्होंने क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता के साथ-साथ समुद्री रास्तों और व्यापार की सुरक्षा पर भी जोर दिया।
यह भारत की व्यापक पश्चिम एशिया नीति को भी दिखाता है। भारत, ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्ते बनाए रखना चाहता है, वहीं UAE जैसे खाड़ी देशों के साथ भी उसके मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं।
यूएई भी भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत और यूएई के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में तेजी से मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा और रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ा है। ब्रिक्स के दौरान यूएई के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मौजूदगी ने इस समीकरण को और महत्वपूर्ण बना दिया। प्रधानमंत्री मोदी और UAE नेतृत्व के बीच रक्षा, सहयोग और परमाणु ऊर्जा सहित कई क्षेत्रों में साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।
इसलिए भारत के लिए ईरान और यूएई दोनों के साथ रिश्ते महत्वपूर्ण हैं। किसी एक के पक्ष में खुलकर खड़ा होना भारत के दूसरे रिश्ते को प्रभावित कर सकता था।
भारत के लिए यह ‘बैलेंसिंग एक्ट’ क्यों था?
इसे आसान भाषा में समझें तो भारत के सामने तीन बड़े लक्ष्य थे।
पहला- ब्रिक्स को बिखरने से को बचाना
अगर ईरान और UAE के मतभेद संयुक्त घोषणापत्र पर भारी पड़ते, तो संगठन के भीतर एकता पर सवाल उठते।
दूसरा- पश्चिम एशिया में अपने हितों की रक्षा करना
भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र ऊर्जा, व्यापार, प्रवासी भारतीयों और समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
तीसरा—सभी पक्षों से रिश्ते बनाए रखना
भारत ईरान के साथ चाबहार जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट पर काम करता है, जबकि यूएई भारत का महत्वपूर्ण व्यापारिक और निवेश साझेदार है। यानी भारत को ऐसी कूटनीति करनी थी जिसमें ईरान भी नाराज न हो, यूएई भी अलग-थलग महसूस न करे और ब्रिक्स की एकता भी बनी रहे।
ईरान भारत के लिए क्यों जरूरी?
ईरान भारत के लिए सिर्फ एक पश्चिम एशियाई देश नहीं है। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक रास्ता है। इसके अलावा पश्चिम एशिया में युद्ध बढ़ने से तेल की कीमतों और समुद्री व्यापार पर सीधा असर पड़ सकता है।
मौजूदा संघर्ष के बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने की आशंका और आपूर्ति बाधित होने की चिंता ने भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए संकट बढ़ा दिया है। इसीलिए मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति के साथ बातचीत में फ्रीडम ऑफ नेविगेशन, व्यापार और समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा को भी प्रमुखता दी।
ब्रिक्स के लिए यह सहमति कितनी बड़ी बात?
ब्रिक्स का विस्तार होने के साथ संगठन के अंदर विचारों और हितों की विविधता भी बढ़ी है। भारत, चीन और रूस जैसे बड़े देशों के अलावा अब ईरान, यूएई, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे देशों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट पर एक साझा बयान तैयार करना पहले की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल है।
इसके बावजूद नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों का संयुक्त घोषणापत्र स्वीकार किया जाना भारत की अध्यक्षता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है। घोषणापत्र में पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर चिंता जताई गई और तनाव कम करने तथा कूटनीतिक समाधान की जरूरत पर जोर दिया गया।
यह कहना सही नहीं होगा कि भारत ने ईरान और यूएई के बीच सभी राजनीतिक या रणनीतिक मतभेद खत्म कर दिए। ऐसा किसी एक ब्रिक्स समिट से संभव भी नहीं है, लेकिन भारत ने जो किया, वह इससे अलग और ज्यादा व्यावहारिक है। दोनों देशों को एक ही मंच पर सहमति के न्यूनतम साझा बिंदु तक लाना।
