राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी – शरदचंद्र पवार (NCP-SP), शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)- हाल ही में इन दोनों पार्टियों का जन्म तब हुआ था, जब मूल पार्टी एनसीपी और शिवसेना में टूट हुई। टूट के बाद शरद गुट के नाम पर NCP-SP और ठाकरे परिवार के नाम पर शिवसेना UBT का जन्म हुआ। लेकिन बिहार में बिना कोई टूट के, जनता दल यूनाइटेड (JDU) का नाम बदलने जा रहा है। जिस पार्टी की स्थापना जॉर्ज फर्नांडीस, शरद यादव और नीतीश कुमार ने की थी, अब उस पार्टी की पहचान मुख्य रूप से नीतीश कुमार बनने जा रहे हैं, कई सालों से पार्टी के प्रमुख चेहरे के तौर पर नीतीश कुमार ही रहे हैं। ऐसे में सवाल ये उठ रहा है आखिर अचानक से ऐसा क्या हुआ कि जदयू को अपना नाम बदलना पड़ रहा है? क्या पार्टी में कोई टूट की संभावना है? किसी तरह के वोट बैंक की बात है? आइए इस सवालों के जवाब विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं...।
नाम बदलने का प्रस्ताव आया कहां से?
दो दशक से ज्यादा पुरानी JDU बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय दल रही है। पार्टी की पहचान लंबे समय से नीतीश कुमार के नेतृत्व और उनके राजनीतिक योगदान से जुड़ी रही है। इसी पृष्ठभूमि में खगड़िया में एक कार्यक्रम के दौरान संजय झा ने पार्टी के नाम को लेकर यह प्रस्ताव रखा। उन्होंने सुझाव दिया कि जनता दल यूनाइटेड का नाम बदलकर ‘जनता दल नीतीश’ कर दिया जाना चाहिए। फिलहाल यह एक प्रस्ताव है, अंतिम फैसला नहीं। लेकिन प्रस्ताव सामने आते ही राजनीतिक चर्चा तेज हो गई। वजह साफ है-किसी पार्टी के नाम में उसके सबसे बड़े नेता का नाम जोड़ना महज औपचारिक बदलाव नहीं माना जाता। इससे पार्टी की पहचान और नेतृत्व को लेकर एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश जाता है।
क्या JDU अब ‘ब्रांड नीतीश’ को और मजबूत करना चाहती है?
JDU की राजनीति में नीतीश कुमार की भूमिका केंद्रीय रही है। पार्टी की पहचान, चुनावी राजनीति और बिहार में उसकी स्वीकार्यता का बड़ा हिस्सा उनके नेतृत्व से जुड़ा है। नीतीश कुमार अब बिहार छोड़ दिल्ली पहुंच चुके हैं, सीएम की गद्दी छोड़, राज्यसभा सांसद बन चुके हैं। ऐसे में ‘जनता दल नीतीश’ नाम का प्रस्ताव एक तरह से यह संदेश दे सकता है कि JDU की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी नीतीश कुमार का नाम और उनका नेतृत्व ही है, नीतीश कुमार जदयू से दूर नहीं हैं, बल्कि पार्टी का आधार ही अब नीतीश कुमार हैं।
इसे ब्रांडिंग की राजनीति के तौर पर भी देखा जा सकता है। जब किसी पार्टी का नाम उसके प्रमुख नेता से जुड़ता है, तो मतदाताओं के लिए उस पार्टी की पहचान और स्पष्ट हो जाती है। पार्टी का नाम सुनते ही नेतृत्व का चेहरा सामने आता है। ताकि उस नेता की दूरी, जनता के लिए महसूस न हो।
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं कि JDU की पूरी राजनीति सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित हो जाएगी। लेकिन नाम बदलने से नीतीश कुमार की भूमिका को पार्टी की पहचान में और प्रमुखता जरूर मिल सकती है।
सम्राट चौधरी को सीएम बना, खुद दिल्ली शिफ्ट हुए नीतीश कुमार (फोटो- NitishKumarJDU)
वोट बैंक का गणित कितना अहम है?
बिहार की राजनीति में किसी भी पार्टी के लिए नेतृत्व की पहचान और सामाजिक समीकरण दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। JDU भी इससे अलग नहीं है। नीतीश कुमार के नाम पर वोटर जदयू की ओर पिछले कई चुनावों से आकर्षित रहा है, ऐसे में पार्टी ये भी शायद सोच रही हो कि नीतीश की बढ़ती उम्र और दिल्ली शिफ्टिंग से उसके वोट बैंक का नुकसान न हो। अगर पार्टी का नाम ‘जनता दल नीतीश’ होता है, तो इससे नीतीश कुमार के समर्थक वर्ग के बीच नेतृत्व की पहचान को और मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। पार्टी यह संदेश देना चाह सकती है कि उसका नेतृत्व स्पष्ट है और उसकी राजनीतिक दिशा भी उसी नेतृत्व से जुड़ी है।
विपक्ष के टूट के दावे में कितनी सच्चाई?
नाम बदलने के प्रस्ताव के साथ ही विपक्ष ने इसे पार्टी के भीतर संभावित बदलाव से जोड़ना शुरू कर दिया है। RJD विधायक भाई वीरेंद्र ने दावा किया है कि JDU जल्द टूट सकती है और आखिर में ‘जनता दल नीतीश’ ही बच सकता है। उन्होंने आने वाले एक-दो महीनों में पार्टी में टूट की संभावना जताई है। लेकिन फिलहाल यह विपक्ष का राजनीतिक दावा है। उपलब्ध जानकारी में ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि JDU में वास्तव में टूट होने जा रही है।
दूसरी ओर, JDU के भीतर इस प्रस्ताव को लेकर समर्थन के सुर सुनाई दे रहे हैं। मंत्री श्रवण कुमार ने संजय झा के प्रस्ताव का खुलकर समर्थन किया है। वहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री विजेंद्र यादव से जब इस मुद्दे पर सवाल किया गया, तो वे RJD के टूट के दावे पर कुछ असहज नजर आए।
नीतीश कुमार बेटे निशांत कुमार के साथ (फोटो- nishantjdu)
बिहार की सियासत पर क्या होगा असर?
जदयू बिहार की राजनीति में 2005 से सत्ता में है, नीतीश जबतक सीएम रहे, जदयू बिहार की सत्ता के केंद्र में रही है, नीतीश के दिल्ली के आने के बाद जदयू सत्ता में तो है, लेकिन सीएम की कुर्सी बीजेपी के पास है। नीतीश की बढ़ती उम्र, उनकी सक्रियता को भी कम कर चुका है, नीतीश की विरासत के रूप में उनके बेटे निशांत कुमार की एंट्री हो चुकी है। ऐसे में जदयू के नाम में नीतीश कुमार जुटता है, तो जदयू के लिए फायदा ही होगा, जनता से नीतीश भले दूर रहें, पार्टी के नाम के साथ वो हमेशा के लिए जनता के पास पहुंचते रहेंगे और उनका अपना वोट बैंक, जदयू के साथ बना रह सकता है।
