UK Breakup Explained: क्या यूनाइटेड किंगडम टूटने की कगार पर है? दरअसल, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के स्वतंत्रता समर्थक नेता जल्द ही कार्डिफ में एक साथ मिलने जा रहे हैं। तीनों पक्ष एक साझा घोषणा पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, जिसमें अपने-अपने देशों के लिए आत्मनिर्णय और आजादी पर जनमत संग्रह के अधिकार की मांग होगी।
सबसे बड़ी बात यह है कि पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड, इन तीनों विकेंद्रीकृत क्षेत्रों में स्वतंत्रता समर्थक राजनीति सत्ता के केंद्र में है। स्कॉटलैंड में स्कॉटिश नेशनल पार्टी (SNP) के जॉन स्विनी फर्स्ट मिनिस्टर हैं। वहीं, वेल्स में प्लैड सिमरू के रून एपी इओर्थ मई में हुए चुनाव के बाद फर्स्ट मिनिस्टर बने हैं। नॉर्दर्न आयरलैंड में सिन फेन की मिशेल ओ’नील इस पद पर हैं। यही वजह है कि कार्डिफ में होने वाली इन नेताओं की बैठक को महज एक औपचारिक मुलाकात के तौर पर नहीं देखा जा रहा है।
तीनों नेता अपने-अपने क्षेत्रों के लिए आत्मनिर्णय के अधिकार और स्वतंत्रता के सवाल पर जनमत संग्रह की मांग को साझा राजनीतिक मुद्दे के तौर पर आगे बढ़ाना चाहते हैं। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बैठक में आयरलैंड की नेता मैरी लू मैकडॉनल्ड भी शामिल होंगी। स्कॉटलैंड पहले ही स्वतंत्रता के सवाल पर जनमत संग्रह करा चुका है। 2014 में हुए इस जनमत संग्रह में स्कॉटलैंड के लोगों ने UK में बने रहने के पक्ष में मतदान किया था। हालांकि, अब एसएनपी एक बार फिर स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह कराने की मांग जोर-शोर से उठा रही है।
नॉर्दर्न आयरलैंड की फर्स्ट मिनिस्टर मिशेल ओ’नील, स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी, वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर रून एपी इओर्थ की फोटो।
ट्रंप ने डाल दी 'आग में घी'
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने आयरलैंड के एकीकरण यानी यूनाइटेड आयरलैंड की बहस को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। डबलिन दौरे के दौरान ट्रंप ने कहा कि वह भविष्य में आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना पसंद करेंगे। उन्होंने इसे एक सकारात्मक घटनाक्रम बताते हुए कहा कि अगर ऐसा होता है तो यह अच्छी बात होगी। हालांकि, साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस संवेदनशील मुद्दे में ब्रिटेन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी।
ट्रंप का बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि नॉर्दर्न आयरलैंड के संवैधानिक भविष्य और आयरलैंड के साथ उसके संभावित एकीकरण का मुद्दा बेहद संवेदनशील माना जाता है। ऐसे मामलों में अमेरिका आम तौर पर अपनी स्थिति बेहद सावधानी से रखता रहा है। ट्रंप के बयान ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा में भी जगह दे दी है।
ट्रंप ने आयरलैंड की एकता की वकालत की। AP
लंदन में क्यों है टेंशन की स्थिति?
स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के नेताओं का एक मंच पर आना लंदन यानी वेस्टमिंस्टर (ब्रिटेन की केंद्रीय संसद) पर संवैधानिक बदलाव को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ा सकता है। तीनों क्षेत्रों की मांगें पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं, लेकिन अपने राजनीतिक और संवैधानिक भविष्य पर ज्यादा अधिकार हासिल करना इनके एजेंडे में प्रमुख है।हालांकि, इस बैठक को सीधे तौर पर यूके के टूटने की शुरुआत मानना अभी जल्दबाजी होगी। स्वतंत्रता समर्थक नेताओं की राजनीतिक मांग और वास्तव में किसी क्षेत्र के यूके से अलग होने के बीच लंबी संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक प्रक्रिया होती है। ऐसे में कार्डिफ की बैठक को फिलहाल UK की एकता को लेकर बढ़ती राजनीतिक बहस और वेस्टमिंस्टर पर बढ़ते दबाव के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है। खास बात यह है कि पहली बार यूके के इन तीनों हिस्सों में ऐसी पार्टियां सत्ता में हैं, जो किसी न किसी रूप में यूके से अलग होने या अपने संवैधानिक भविष्य पर खुद फैसला लेने का समर्थन करती हैं।
आखिर कार्डिफ में होने वाली बैठक इतनी अहम क्यों है?
कार्डिफ में वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर रून एपी इओर्थ,स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी और नॉर्दर्न आयरलैंड की फर्स्ट मिनिस्टर मिशेल ओ’नील की मुलाकात हो रही है। सिन फेन की अध्यक्ष मैरी लू मैकडॉनल्ड भी इस बैठक में शामिल होंगी। बैठक में आर्थिक सहयोग, ऊर्जा, यूरोप से रिश्ते और फंडिंग जैसे मुद्दों पर चर्चा के साथ-साथ इन देशों के संवैधानिक भविष्य पर भी बातचीत होगी।
यूके आखिर है क्या?
यूके का पूरा नाम ग्रेट ब्रिटेन और उत्तरी आयरलैंड का यूनाइटेड किंगडम है। चार प्रमुख देश मिलकर यूके का गठन करते हैं। इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड। हालांकि, इन चारों का हिस्सा एक ही यूनाइटेड किंगडम है, लेकिन स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड को अलग-अलग स्तर पर विकेंद्रीकृत शासन के अधिकार मिले हुए हैं।
इनके पास अपनी संसद/विधानसभा और सरकार हैं, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन जैसे कई घरेलू मामलों पर फैसले ले सकती हैं, लेकिन रक्षा, विदेश नीति, आव्रजन और कई महत्वपूर्ण आर्थिक व संवैधानिक मामलों पर अंतिम अधिकार वेस्टमिंस्टर यानी यूके की संसद के पास है। यही सत्ता के बंटवारे का सवाल अब राजनीतिक विवाद का बड़ा कारण बन रहा है।
यूनाइटेड किंगडम मैप की फोटो।
स्कॉटलैंड क्यों चाहता है अपना रास्ता?
यूके के भीतर स्वतंत्रता की मांग सबसे मजबूत और पुरानी स्कॉटलैंड में रही है। यहां स्कॉटिश नेशनल पार्टी यानी एसएनपी लंबे समय से आजादी की मांग करती रही है। 2014 में स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह भी कराया गया था। उस समय करीब 55% लोगों ने यूके में बने रहने, जबकि 45% ने स्वतंत्रता के पक्ष में मतदान किया था। लेकिन, एसएनपी का तर्क है कि 2014 के बाद हालात बदल चुके हैं। खास तौर पर ब्रेक्जिट के बाद स्कॉटलैंड और वेस्टमिंस्टर के बीच राजनीतिक मतभेद और बढ़े हैं।
एसएनपी, नेता जॉन स्विनी अब फिर से इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अगर स्कॉटलैंड में स्पष्ट जनसमर्थन बनता है तो लोगों को अपनी संवैधानिक स्थिति पर मतदान करने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने यूके के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम को चिट्ठी लिखकर इस राजनीतिक सिद्धांत को कानूनी व्यवस्था में बदलने की मांग भी की है। हालांकि, वेस्टमिंस्टर की मौजूदा स्थिति साफ है। यूके सरकार ने संसद में कहा है कि वह स्कॉटलैंड की आजादी या दूसरे जनमत संग्रह का समर्थन नहीं करती।
जानें आखिर क्या है तीनों देशों की मांग। AI IMAGE
वेल्स की मांग क्या है?
वेल्स में हालिया चुनाव के बाद प्लैड सिमरू सत्ता में आई है। रून एपी इओर्थ अब फर्स्ट मिनिस्टर हैं। वेल्स का मामला स्कॉटलैंड से थोड़ा अलग है। वहां फिलहाल तत्काल स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह कराने की बजाय अधिक अधिकार और स्वायत्तता पर जोर दिया जा रहा है।
वेल्श सरकार चाहती है कि वेल्स को पुलिसिंग और न्याय जैसे क्षेत्रों में भी ज्यादा अधिकार दिए जाएं। रून एपी इओर्थ का कहना है कि वेल्स को इंग्लैंड का सिर्फ एक क्षेत्र समझने के बजाय एक अलग राष्ट्र के तौर पर देखा जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि वेल्स की स्वतंत्रता का अंतिम फैसला भविष्य में वेल्श लोगों की इच्छा पर निर्भर करेगा। यानी वेल्स का रास्ता फिलहाल सीधे यूके छोड़ने से ज्यादा विकेंद्रीकरण बढ़ाने और भविष्य में स्वतंत्रता के विकल्प को खुला रखने वाला है।
नॉर्दर्न आयरलैंड का मामला सबसे अलग क्यों?
नॉर्दर्न आयरलैंड की संवैधानिक स्थिति स्कॉटलैंड और वेल्स से काफी अलग है। यहां 1998 के गुड फ्राइडे समझौते के तहत यह व्यवस्था है कि अगर परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि नॉर्दर्न आयरलैंड के लोगों का बहुमत रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहता है, तो सीमा जनमत संग्रह यानी बॉर्डर पोल कराया जा सकता है। यानी नॉर्दर्न आयरलैंड के पास संवैधानिक बदलाव के लिए पहले से एक तय लोकतांत्रिक रास्ता मौजूद है। सिन फेन लंबे समय से यूनाइटेड आयरलैंड की मांग करता रहा है और मिशेल ओ’नील के नेतृत्व में यह मुद्दा अब और प्रमुख हो गया है।
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी नॉर्दर्न आयरलैंड के रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के साथ एकीकरण के समर्थन में बयान दिया है। हालांकि, यूके सरकार का कहना है कि फिलहाल ऐसी परिस्थितियां नहीं हैं, जिनमें आयरिश यूनिटी रेफरेंडम कराया जाए।
ब्रेक्जिट ने इस विवाद को कैसे बढ़ाया?
यूके के संवैधानिक संकट को समझने के लिए ब्रेक्जिट भी बेहद महत्वपूर्ण है। 2016 में यूके ने यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने के लिए मतदान किया था। लेकिन स्कॉटलैंड में ब्रेक्जिट को लेकर समर्थन यूके के बाकी हिस्सों से अलग था।
स्कॉटलैंड में बहुमत ईयू में बने रहने के पक्ष में था। इसके बावजूद पूरे यूके के वोट के आधार पर ब्रेक्जिट लागू हुआ। इससे स्कॉटलैंड के राष्ट्रवादी नेताओं को यह तर्क देने का मौका मिला कि स्कॉटलैंड की जनता कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अलग राय रखती है, लेकिन अंतिम फैसला वेस्टमिंस्टर के बहुमत के आधार पर होता है। यही वजह है कि स्वतंत्रता समर्थक पार्टियां अब “अपने भविष्य पर खुद फैसला लेने के अधिकार” को केंद्र में रख रही हैं।
साल 2016 में हुआ था ब्रेक्जिट का जनमत संग्रह।
क्या तीनों देश मिलकर यूके को तोड़ सकते हैं?
अभी यूनाइटेड किंगडम के विघटन की कोई औपचारिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। कार्डिफ में होने वाली बैठक या किसी राजनीतिक समझौते से अपने आप स्कॉटलैंड, वेल्स या नॉर्दर्न आयरलैंड यूनाइटेड किंगडम से अलग नहीं हो जाते। हर देश के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया अलग होगी।
स्कॉटलैंड को स्वतंत्रता पर जनमत संग्रह कराने के लिए वेस्टमिंस्टर के साथ कानूनी मुद्दे का समाधान करना होगा। वेल्स में फिलहाल स्वतंत्रता की दिशा में राजनीतिक समर्थन मजबूत करने और अधिक अधिकार हासिल करने पर जोर है।
वहीं, नॉर्दर्न आयरलैंड में गुड फ्राइडे समझौते के तहत सीमा जनमत संग्रह यानी बॉर्डर पोल का अलग संवैधानिक ढांचा मौजूद है। इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को UK के तत्काल टूटने की घोषणा के बजाय यूनाइटेड किंगडम की एकता और भविष्य को लेकर बढ़ते राजनीतिक दबाव के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।
अगर यूके टूटता है तो क्या होगा?
अगर भविष्य में स्कॉटलैंड या नॉर्दर्न आयरलैंड, यूके से अलग होने की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो इसका असर बहुत बड़ा होगा। सीमाएं, मुद्रा, व्यापार, रक्षा, सैन्य अड्डे, सरकारी कर्ज, अंतरराष्ट्रीय संधियां और नागरिकता जैसे कई मुद्दे सामने आएंगे।
स्कॉटलैंड के मामले में यूके की परमाणु हथियार व्यवस्था और सैन्य ढांचे को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। नॉर्दर्न आयरलैंड के मामले में सबसे बड़ा सवाल रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के साथ संभावित एकीकरण का होगा। यानी यूके का संभावित विघटन सिर्फ घरेलू राजनीति का मामला नहीं होगा, बल्कि यूरोप की सुरक्षा और आर्थिक व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ सकता है।
