China J-7 fighter plane : बांग्लादेश में वायु सेना के प्रशिक्षण लड़ाकू विमान के ढाका में एक स्कूल की इमारत से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना में मरने वालों की संख्या बढ़कर 27 हो गई है। मरने वालों में 25 बच्चे हैं। जबकि 170 लोग घायल हुए हैं और इनमें कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। दुर्घटना का शिकार हुआ फाइटर जेट चीन निर्मित है और इसका नाम F-7 है। यह विमान काफी पुराना हो चुका है। इसे चीन ने सोवियत संघ के साथ संयुक्त रूप से बनाना शुरू किया लेकिन बाद में मास्को के साथ रिश्ते में आई खटास के बाद उसने मिग-21 की तकनीक में कथित रूप से हेर-फेर कर जे-7 अथवा एफ-7 नाम से इस फाइटर प्लेन को बनाया। इसे निर्मित करने के बाद उसने कई देशों को इसका निर्यात किया।
बांग्लादेश वायु सेना के पास हैं एफ-7 के दो स्क्वॉड्रन
बांग्लादेश के अलावा पाकिस्तान, ईरान, म्यांमार, नामीबिया, नाइजीरिया, उत्तर कोरिया, श्रीलंका, सूडान, तंजानिया और जिम्बॉब्वे की वायु सेना इस F-7 को उड़ाती है। बांग्लादेश के पास एफ-7 के दो स्क्वॉड्रन यानी 36 फाइटर प्लेन हैं। ये फाइटर प्लेन J-7 के निर्यात संस्करण हैं। वहीं, एशिया में F-17 को उड़ाने वाला पाकिस्तान सबसे बड़ा देश है। बताया जाता है कि पाकिस्तान के पास कम से कम 120 एफ-17 लड़ाकू विमान हैं। कहा जाता है कि चीन के जितने भी फाइटर प्लेन हैं वे या तो रूसी या अमेरिकी फाइटर प्लेन की नकल हैं। चीन पर दूसरों की तकनीक चोरी कर अपने लड़ाकू जहाज निर्मित करने के आरोप लगते आए हैं। हालांकि, चीन चोरी की तकनीक पर लड़ाकू विमान बनाने के दावों और आरोपों को खारिज करता आया है।
क्या होती है रिवर्स इंजीनियरिंग?
रिवर्स इंजीनियरिंग एक तकनीकी प्रक्रिया है, जिसमें किसी तैयार उत्पाद को खोलकर, उसके घटकों, डिजाइन, कार्यप्रणाली और निर्माण विधियों का विश्लेषण किया जाता है ताकि उसकी नकल या बेहतर संस्करण तैयार किया जा सके। यह प्रक्रिया तब अपनाई जाती है जब मूल डिजाइन या तकनीकी जानकारी उपलब्ध न हो, लेकिन उस उत्पाद को समझकर वैसा ही कुछ बनाना हो। रिवर्स इंजीनियरिंग का उपयोग आमतौर पर रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, सॉफ्टवेयर और उपग्रह तकनीक जैसे क्षेत्रों में होता है। चीन ने इस क्षेत्र में विशेष रूप से रक्षा उपकरणों के मामले में काफी प्रगति की है। उसका लक्ष्य रहा है कि विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम की जाए और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए। चीन ने 1960 के दशक में सोवियत संघ से प्राप्त मिग-21 लड़ाकू विमान की रिवर्स इंजीनियरिंग करके अपना पहला सुपरसोनिक फाइटर J-7 तैयार किया। आज चीन ड्रोन, मिसाइल सिस्टम, जहाज, और यहां तक कि स्मार्टफोन और चिप्स तक की तकनीक में रिवर्स इंजीनियरिंग के दम पर दुनिया में प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
हसीना सरकार के समय चीन हथियारों पर उठे थे सवाल
चीन से हथियार खरीदने वाले देशों में बांग्लादेश एक प्रमुख देश है। वह बड़ी संख्या में चीन से फाइटर प्लेन, नौसेना के लिए जहाज और अन्य हथियार खरीदता आया है लेकिन इन हथियारों पर बांग्लादेश सेना के अधिकारी सवाल उठाते और शंका जाहिर करते रहे हैं। शेख हसीना का तख्तापलट होने से करीब एक साल पहले बांग्लादेश वायु सेना के अधिकारियों ने चीनी लड़ाकू जहाजों के कलपुर्जों में खामी और उपकरणों के बदले जाने का मुद्दा उठाया था। अधिकारी लड़ाकू जहाजों के प्रदर्शन से खुश नहीं थे। उन्होंने चीनी हथियारों में खामी होने का इशारा किया था। हालांकि, तब की बात आई और गई हो गई। कहने का मतलब यह है कि चीन और बांग्लादेश के बीच रक्षा सहयोग काफी पुराना है। इन सबके बीच इस दुर्घटनाग्रस्त हुए विमान के विकास की कहनी पर चर्चा करनी जरूरी है।
एक समय IAF का प्रमुख फाइटर प्लेन था मिग-21
साल 1961 में चीन के माओ जेदोंग और सोवियत संघ के निकिता ख्रुश्चेव ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत चीन को लाइसेंस के तहत मिग-21 लड़ाकू विमान का उत्पादन करना था। अगस्त 1962 में मिग-21 के साथ कुछ तकनीकी दस्तावेज शेनयांग फैक्ट्री भेजे गए, लेकिन दोनों देशों के बीच बिगड़ते संबंधों के कारण यह समझौता टूट गया और चीन ने सोवियत सहायता के बिना ही आगे बढ़ने का फैसला किया। मिग-21 के बारे में कहा जाता है कि इस फाइटर जेट जितना किसी और विमान का उत्पादन दुनिया में नहीं हुआ। एक समय में यह भारतीय वायुसेना का प्रमुख लड़ाकू विमान था।
मिग-21 F-13 वेरिएंट को 'रिवर्स इंजीनियर' किया
चीन का दावा है कि समझौते के तहत फाइटर प्लेन बनाने के लिए रूस ने जो दस्तावेज भेजे थे, वे अधूरे थे। हालांकि, सोवियत संघ ने इस दावे को खारिज कर दिया। इसके बाद कहा जाता है कि शेनयांग के इंजीनियरों ने सोवियत संघ के मिग-21 F-13 वेरिएंट को रिवर्स इंजीनियर किया और इसमें 249 समस्याएं पहचानीं और हल कीं। उन्होंने विमान के लिए कम से कम आठ तकनीकी दस्तावेज तैयार किए। 1964 में शेनयांग एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन ने पहले विमान जे-7I का निर्माण शुरू किया, जो दिखने में मिग-21 जैसा ही था, जिसमें स्वेप्ट डेल्टा विंग डिजाइन और नोज में एयर इनलेट था, लेकिन अंदर से दोनों विमानों में काफी अंतर था।
मिग-21 की तकनीक में बदलाव किए
मिग-21 एक साधारण एयरफ्रेम पर आधारित था। यह सस्ता था और सुपरसोनिक गति प्राप्त कर सकता था। इसे प्वाइंट ऑफ डिफेंस के उद्देश्य से और एयर-टू-ग्राउंड हमले की क्षमता के साथ डिजाइन किया गया। चीन सोवियत रणनीति को अपनाना चाहता था, जो पीएलए की रणनीति के अनुकूल थी। यानी वह बड़ी संख्या में लड़ाकू विमान चाहता था ताकि पश्चिमी देशों, खासकर ताइवान के खिलाफ मोर्चा लिया जा सके, जो चीन की सबसे बड़ी कमजोरी रहा है। कहा जाता है कि चीन ने केवल मिग-21 की नकल नहीं की, बल्कि उसमें कुछ बदलाव किए, जिससे जे-7 की एरोडायनामिक्स पर असर पड़ा। उन्होंने मिग के हाइड्रोलिक सिस्टम में एक समस्या पहचानी, जिसके कारण स्क्वाड्रनों में 70% विमान ग्राउंडेड रहते थे, और फ्यूल टैंक के स्थान से अस्थिरता उत्पन्न होती थी।
एक समय PLA वायुसेना की रीढ़ था जे-7
हालांकि, जे-7 चीन का सबसे अधिक मात्रा में उत्पादित विमान बना और इसके कई ऑपरेटर मध्य-पूर्व, एशिया और अफ्रीका में रहे। यह एक समय पर पीएलए वायुसेना की रीढ़ बन गया था। जे-7 का बड़े पैमाने पर उत्पादन चीन को तेजी से विमान विकसित और निर्मित करने की क्षमता देने लगा, जिससे वह अमेरिका से संख्या में आगे निकल सके। मिग-21 में अधिकतर फ्यूल फॉरवर्ड फ्यूसलाज में होता था और करीब 45 मिनट की उड़ान के बाद विमान अस्थिर हो जाता था। चीन ने जे-7 में फ्यूल टैंकों की स्थिति बदली और बड़े ड्रॉप टैंक जोड़े जिससे उड़ान के दौरान ऊपर-नीचे होने पर विमान की अपनी स्थिति में लौटने की प्रवृत्ति बेहतर हो गई।
चीन ने जे-7 के वैरिएंट बनाए
हालांकि, 1960 का दशक चीन के लिए उथल-पुथल भरा था। माओ की 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' और 'कल्चरल रेवोल्यूशन' जैसी नीतियों ने देश की औद्योगिक वृद्धि और निर्माण क्षमता को प्रभावित किया। चीन ने जे-7 का बड़े पैमाने पर उत्पादन केवल 1980 के दशक में देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में किया। पहला जे-7 वेरिएंट – जे-7I –में WP-7 इंजन था, जो रूसी R-11 टर्बोजेट जैसा था। इसमें 30 मिमी की तोप थी, जो रूसी NR-30 की तरह थी, और PL-2 एयर-टू-एयर मिसाइल थी, जो रूसी AA-2 जैसी थी। लेकिन इसके इजेक्शन सीट में कुछ जटिलताएं थीं। बाद में चीन ने J-7II वेरिएंट विकसित किया, जिसमें बेहतर इजेक्शन सीट और WP-7B इंजन था। विमान की शुरुआत से लगभग 20 साल बीत चुके थे और 1980 के दशक में इसमें महत्वपूर्ण सुधार हुए। बाद के वेरिएंट WP-13 इंजन से लैस थे।
विमान के रडार में पाकिस्तान ने की मदद
वेबसाइट एयरवेक्टर्स के मुताबिक 1980 के मध्य में पाकिस्तान ने बेहतर रडार क्षमता वाला J-7 वेरिएंट चीन से मांगा। चीन का मानक रडार और ब्रिटिश मारकोनी रडार दोनों को ग्राउंड क्लटर की समस्या थी, और चीन के पास एयर-टू-ग्राउंड रडार का अनुभव नहीं था। 1984 में पाकिस्तान ने F-16 के अमेरिकी प्रशिक्षित पायलटों को चीन भेजा, ताकि वे ग्राउंड अटैक रडार के इस्तेमाल पर चीनियों को प्रशिक्षण दे सकें। इससे J-7M का विकास हुआ। पाकिस्तान J-7 के सबसे बड़े ऑपरेटरों में शामिल है। पाकिस्तानी वायुसेना ने विमान के रडार में सुधार करने में मदद की।
J-7M वेरिएंट बांग्लादेश को दिया
आगे चलकर चेंग्दू एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (CAC) ने जमीन से भी इजेक्शन करने वाली एक 'जीरो-जीरो इजेक्शन सीट' डिजाइन की। यह उस समय सोवियतों की केएम-1 इजेक्शन सीट से बेहतर थी। हालांकि, जे-7 या एफ-7 में चीनी एचटीवाई-5 सीट का डिजाइन ब्रिटिश मार्टिन-बेकर सीट से मिलता-जुलता था, जिसे J-7M वेरिएंट में इस्तेमाल किया गया और बांग्लादेश को भी निर्यात किया गया। मिग-21 में फॉरवर्ड-ओपनिंग, फॉरवर्ड-जेटिसन कैनोपी थी, जबकि चीन ने J-7 के लिए इसे रियर-हिंग्ड, ऊपर की ओर खुलने वाली कैनोपी में बदला। J-7 ने केवल 1980 के दशक के मध्य में ही सोवियत MiG-21 के बराबर क्षमताएं हासिल कीं।
भारत में मिग-21 की जगह लेगा तेजस
1987 में J-7E पहला मिग-21 वेरिएंट बना जिसमें हेलमेट-माउंटेड साइट, HOTAS (हैंड्स ऑन थ्रॉटल एंड स्टिक) और मल्टी-पर्पस डिस्प्ले जैसी विशेषताएं थीं। इनमें से कई पुर्जे गन साइट और डिस्प्ले ब्रिटिश निर्मित थे। आगे के सुधारों के साथ यह विमान एक चौथी पीढ़ी का शॉर्ट-रेंज इंटरसेप्टर बन गया। चीन ने इसका उत्पादन 2013 में बंद कर दिया, लेकिन आज भी कई देशों में यह इस्तेमाल में है। दुनिया भर में मिग-21 के हादसों को देखते हुए इसे अक्सर 'फ्लाइंग कॉफिन' कहा जाता है। हालांकि, मिग-21 और जे-7 दोनों का क्रैश इतिहास अलग-अलग है। मिग-21 का विकास 1955 में शुरू हुआ था और इसके कई वेरिएंट बने, लेकिन इसका उत्पादन कई साल पहले बंद हो चुका है और स्पेयर पार्ट्स की कमी अक्सर इसके रखरखाव में समस्या बनती रही है। भारतीय वायुसेना ने 1963 में मिग-21 को शामिल किया था और आज भी इसके दो स्क्वाड्रन काम कर रहे हैं। हालांकि, इस साल के अंत तक इन्हें स्वदेशी तेजस विमान के साथ बदल दिया जाएगा।
