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भारत-US ट्रेड डील में कहां फंसा पेच? अटकी बातचीत के पीछे क्या है असली वजह

पिछले महीने ट्रंप ने 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026' पर हस्ताक्षर किए। यह रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों, जिनमें भारत भी आता है, पर 100% तक टैरिफ की गुंजाइश देता है। इसका सबसे अहम पहलू यह है कि पुराने IEEPA वाले टैरिफ को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था।

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भारत-US ट्रेड डील में कहां फंसा पेच? अटकी बातचीत के पीछे क्या है असली वजह
Written by: आलोक कुमार राव
Updated Oct 3, 2026, 14:27 IST
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India US trade deal: अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जेमिसन ग्रीयर ने 1 अक्टूबर को कहा कि भारत के साथ व्यापार वार्ता अपने अंतिम चरण में है, लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर 'तुरंत होने वाले नहीं' हैं। उनके मुताबिक विवादित मुद्दों की पहचान हो चुकी है और उन पर काम चल रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी की जल्द ही एक और बातचीत हो सकती है। यह बयान चौंकाने वाला इसलिए था कि फरवरी में दोनों देश एक फ्रेमवर्क समझौते पर सहमत हो चुके थे। भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारी लगातार कहते रहे हैं कि डील लगभग हो चुकी है। माना जा रहा था कि भारत बेहतर टैरिफ दरों के इंतजार में दस्तखत टाल रहा है। अब अमेरिका की ओर से यह बयान बताता है कि मामला केवल औपचारिकता का नहीं, बल्कि असली सौदेबाजी का है।

टैरिफ वाले बिल पर ट्रंप ने किए हैं हस्ताक्षर

पिछले महीने ट्रंप ने 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026' पर हस्ताक्षर किए। यह रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों, जिनमें भारत भी आता है, पर 100% तक टैरिफ की गुंजाइश देता है। इसका सबसे अहम पहलू यह है कि पुराने IEEPA वाले टैरिफ को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था, जबकि इस नए कानून के तहत लगने वाले टैरिफ को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। यानी अमेरिका के हाथ में अब ऐसा औजार है जो कानूनी रूप से कहीं ज्यादा मजबूत है। कुल मिलाकर भारत और अमेरिका दोनों तरफ से संकेत मिले-जुले हैं। फरवरी में अमेरिका ने भारत पर लगा अतिरिक्त 25% टैरिफ इस बदले में हटाया था कि भारत रूसी तेल की खरीद रोकेगा। लेकिन अब वही मुद्दा एक स्थायी कानूनी खतरे के रूप में मेज़ पर लौट आया है। भारत के लिए संदेश साफ है: छूट मिली है, पर शर्तों के साथ और कभी भी वापस ली जा सकती है।

सेक्शन 301: अनिश्चितता की मार निर्यातकों पर

दूसरी चिंता सेक्शन 301 जांच की है। अमेरिका यह परखने में लगा है कि क्या भारत के पास जरूरत से ज्यादा औद्योगिक क्षमता है और क्या उसका उत्पादन अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचा रहा है। इस तंत्र के तहत पहले दौर में 10% टैरिफ लग चुके हैं, और नए दौर का फैसला आना बाकी है। इस अनिश्चितता का असर जमीन पर दिखने लगा है। भारतीय निर्यातकों के अनुसार अमेरिकी खरीदार अब थोक ऑर्डर नहीं दे रहे और आयात का स्रोत बदल रहे हैं। जब तक डील पर दस्तखत नहीं होते, यह प्रवृत्ति लंबे समय में भारतीय कारोबार के ऑर्डर घटा सकती है। अमेरिका के प्रमुख व्यापारिक साझेदार 10-15% टैरिफ दायरे में रखे गए हैं, और भारत की मांग है कि उसे आसियान देशों और चीन से बेहतर दर मिले। यही असली अटकाव है: भारत केवल डील नहीं, प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बढ़त चाहता है।

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वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस जांच पर भारत का पक्ष रखा है। उनका कहना है कि भारत की विनिर्माण क्षमता घरेलू और वैश्विक जरूरतें पूरी करती है और देश में 'संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता' नहीं है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत G20 के कई सदस्यों की तरह व्यापार-विकृत सब्सिडी से होने वाली डंपिंग को लेकर चिंतित है और उससे WTO के नियमों के तहत एंटी-डंपिंग व काउंटरवेलिंग ड्यूटी जैसे साक्ष्य-आधारित उपायों से निपटता है।

क्या सौदा एकतरफा है?

फ्रेमवर्क के तहत भारत ने अगले पाxच साल में अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने की मंशा जताई है, जिसमें ऊर्जा, विमान और उनके पुर्ज़े, कीमती धातुएँ, तकनीक और कोकिंग कोल शामिल हैं। विशेषज्ञों का सवाल यह है कि अमेरिका की ओर से भारतीय उत्पाद खरीदने की कोई प्रतिबद्धता नहीं है। इस लिहाज़ से डील का संतुलन भारत के पक्ष में नहीं दिखता। इसके साथ भारत ने डिजिटल व्यापार के लिए 'मजबूत द्विपक्षीय नियम' बनाने पर बातचीत की प्रतिबद्धता भी जताई है, जिनमें भेदभावपूर्ण या बोझिल प्रथाओं को निशाना बनाया जाएगा। यानी दबाव केवल माल की खरीद का नहीं, नियम-कायदों के ढाँचे का भी है।

व्यापार से आगे: संप्रभुता का सवाल

सबसे गंभीर बहस 'आर्थिक सुरक्षा तालमेल' को लेकर है। फ्रेमवर्क में दोनों देश आपूर्ति श्रृंखला की मज़बूती के लिए तीसरे देशों की गैर-बाजारू नीतियों से निपटने, निवेश की जांच और निर्यात नियंत्रण में सहयोग पर सहमत हुए हैं। एक विशेषज्ञ ने, नाम न छापने की शर्त पर, चेताया कि अगर भारत पर वैसे ही प्रावधान थोपे गए जो अमेरिका के कुछ अन्य 'रेसिप्रोकल ट्रेड' समझौतों में हैं, तो विदेश नीति, व्यापार और आर्थिक मामलों में भारत की संप्रभुता काफी सीमित हो जाएगी। कनाडा का उदाहरण चेतावनी की तरह है। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के संकेतों के मुताबिक अमेरिका चाहता था कि कनाडा चीन के साथ समझौता न करे। यानी अमेरिकी माँगें अब माल और डिजिटल व्यापार से कहीं आगे जा चुकी हैं। भारत से भी ऐसी अपेक्षाएँ हो सकती हैं, यह आशंका बेबुनियाद नहीं लगती।

india us 2

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अमेरिकी विदेश विभाग की निवेश माहौल रिपोर्ट भी इसी दिशा में इशारा करती है। उसमें कहा गया कि FEMA एक ही निवेश समूह के स्वतंत्र फंडों को एक साथ FDI और FPI के रास्ते IPO में हिस्सा लेने से रोकता है, जिसे उसने "अनावश्यक और विशिष्ट रूप से बोझिल" बताया। रिपोर्ट के अनुसार विदेशी बैंकों की प्रभावी कर दर 38.22% है, जो घरेलू बैंकों से 4.63 प्रतिशत अंक ज़्यादा है। यानी वार्ता में भारत की वित्तीय नीतियाँ भी निशाने पर हैं।

भारत के पास क्या विकल्प हैं

तस्वीर यह बनती है कि अमेरिका के पास दबाव के तीन औज़ार हैं: अदालत-प्रूफ रूस प्रतिबंध कानून, लंबित सेक्शन 301 जाँच, और खरीदारों की बदलती ऑर्डर-नीति से पैदा होती अनिश्चितता। भारत के पास अपना बाज़ार, 500 अरब डॉलर की खरीद का वादा और यह तर्क है कि उसकी क्षमता विश्व की जरूरत पूरी करती है। जल्दबाजी में दस्तखत का जोखिम यह है कि भारत ऐसे प्रावधान स्वीकार कर ले जो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को बांध दें। देरी का जोखिम यह है कि निर्यातकों के ऑर्डर खिसकते रहें। इसलिए ग्रीयर का 'अंतिम चरण, पर तुरंत नहीं' वाला बयान एक संतुलन-बिंदु की ओर इशारा करता है, जहां बात टैरिफ दर से ज्यादा इस पर टिकी है कि भारत कितनी नीतिगत आजादी बचाकर रख पाता है। आने वाले हफ्तों में तीन चीजें देखने लायक हैं। मोदी-ट्रंप की संभावित बातचीत, सेक्शन 301 का फैसला, और आर्थिक सुरक्षा वाले प्रावधानों की अंतिम भाषा। इन्हीं से तय होगा कि यह डील भारत के लिए बराबरी की साझेदारी बनेगी या दबाव में किया गया समझौता।
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