भारत-बांग्लादेश संबंध एक बार फिर नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। नई दिल्ली और ढाका उच्च स्तरीय संबंधों को पुनर्जीवित करने के लिए प्रयासरत हैं, और बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की नई दिल्ली यात्रा को लेकर लगातार आधिकारिक स्तर की वार्ता चल रही है। हालांकि, राजनयिक संबंधों में सुधार एक और विवाद का कारण बन रहा है, बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना द्वारा नई दिल्ली से बार-बार दिए जा रहे भाषण, जिनसे ढाका की सत्ता प्रतिष्ठान लगातार नाराज है। इस बीच दक्षिण एशिया के बदलते रणनीतिक माहौल में बांग्लादेश का तेजी से बढ़ता ड्रोन आधुनिकीकरण कार्यक्रम (Drone Modernization Push) भारत की पूर्वी सीमाओं और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक नई और गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है। ढाका जिस रफ्तार से सैन्य और निगरानी ड्रोन्स की खरीद व स्वदेशी विकास पर जोर दे रहा है, उसने भारतीय रक्षा विशेषज्ञों और खुफिया एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।
क्या है बांग्लादेश का ड्रोन पुश?
बांग्लादेश अपनी तीनों सेनाओं (स्थल, नौसेना और वायु सेना) को आधुनिक मानवरहित हवाई वाहनों (UAV) और कॉम्बैट ड्रोन्स (UCAV) से लैस करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। बांग्लादेश ने तुर्की से घातक 'बायराक्तार टीबी2' ड्रोन्स (BAYRAKTAR TB2) हासिल किए हैं। ये वही ड्रोन्स हैं जिन्होंने यूक्रेन-रूस युद्ध और अज़रबैजान-आर्मेनिया संघर्ष में अपनी क्षमता साबित की है। ढाका सिर्फ तुर्की ही नहीं, बल्कि चीन और पाकिस्तान से भी निगरानी और टोही ड्रोन्स हासिल करने और अपनी स्वदेशी ड्रोन तकनीक को विकसित करने पर काम कर रहा है। बांग्लादेश बंगाल की खाड़ी और भारत से सटी अपनी सीमाओं पर 24 घंटे निगरानी क्षमता हासिल करना चाहता है।
भारत के पूर्वी क्षेत्र के लिए यह बड़ी चुनौती क्यों है?
अब तक भारत का पूर्वी मोर्चा (भारत-बांग्लादेश सीमा) पश्चिमी (पाकिस्तान) और उत्तरी (चीन) सीमाओं की तुलना में अपेक्षाकृत शांत माना जाता था। लेकिन बांग्लादेश की यह नई सैन्य तैयारी भारत के लिए कई रणनीतिक खतरे पैदा करती है।
'सिलिगुड़ी कॉरिडोर' पर सीधी नजर
भारत का सबसे संवेदनशील हिस्सा 'चिकन नेक' या सिलिगुड़ी कॉरिडोर (जो पूर्वोत्तर भारत को बाकी देश से जोड़ता है) बांग्लादेश की सीमा के बेहद करीब है। बांग्लादेश की सीमा से उड़ने वाले आधुनिक ड्रोन्स इस कॉरिडोर पर किसी भी सैन्य गतिविधि की रियल-टाइम निगरानी करने में सक्षम हो जाएंगे।
पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद और तस्करी का खतरा
भारत-बांग्लादेश सीमा पर घने जंगल, नदियां और जटिल इलाके हैं। ड्रोन्स के अत्यधिक इस्तेमाल से अवैध घुसपैठ, हथियारों की तस्करी, जाली नोटों के कारोबार और पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों को मदद मिलने की आशंका बढ़ जाती है।
चीन और पाकिस्तान का बढ़ता प्रभाव: बांग्लादेश के सैन्य ढांचे में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती पैठ भारत के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। यदि बांग्लादेश के ड्रोन नेटवर्क और सर्विलांस डेटा तक चीनी या पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों की पहुंच बनती है, तो भारत का पूरा पूर्वी एयर डिफेंस ग्रिड एक्सपोज़ हो सकता है।
बंगाल की खाड़ी में नौसैनिक सुरक्षा
बंगाल की खाड़ी में भारत के कई महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डे (जैसे विशाखापट्टनम और अंडमान-निकोबार कमांड) स्थित हैं। बांग्लादेशी नौसेना द्वारा समुद्री गश्ती ड्रोन्स की तैनाती से बंगाल की खाड़ी में भारत की रणनीतिक बढ़त पर असर पड़ सकता है।
दोनों देशों के रुख में अंतर
बांग्लादेश का कहना है कि इन ड्रोन्स का मुख्य उद्देश्य आपदा प्रबंधन, रोहिंग्या संकट पर नजर रखना, तटीय सुरक्षा और 2030 तक अपनी सेना का आधुनिकीकरण करना है। वहीं, भारत की मुख्य चिंता यह है कि सीमा से सटे भारतीय सैन्य ठिकानों और 'चिकन नेक' की जासूसी हो सकती है, और चीनी और पाकिस्तानी सिस्टम्स का भारतीय सीमा के पास सक्रिय होना सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है।
भारत का क्या होगा कदम?
बांग्लादेश के इस कदम को देखते हुए भारत को अपने पूर्वी मोर्चे की सुरक्षा समीक्षा करनी पड़ रही है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) और भारतीय सेना भारत-बांग्लादेश सीमा पर इजरायली व स्वदेशी एंटी-ड्रोन गन और रडार सिस्टम तैनात कर रही है। शिलांग और कोलकाता स्थित भारतीय वायुसेना और थलसेना की पूर्वी कमान को काउंटर-ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर (EW) तकनीकों से मजबूत किया जा रहा है। भारत लगातार ढाका के साथ उच्च स्तरीय सैन्य वार्ता के जरिए यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है कि बांग्लादेशी क्षेत्र का इस्तेमाल किसी तीसरे देश (चीन/पाकिस्तान) द्वारा भारत विरोधी गतिविधियों के लिए न हो।
बांग्लादेश का ड्रोन पुश भले ही उसकी अपनी रक्षा नीति का हिस्सा हो, लेकिन चीन और पाकिस्तान के साथ उसके सैन्य जुड़ाव को देखते हुए यह भारत के लिए पूर्वी मोर्चे पर एक नया सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है। भारत को अपनी पूर्वी सीमा पर सिर्फ भौतिक गश्त के भरोसे रहने के बजाय तकनीकी और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस ग्रिड को कई गुना मजबूत करना होगा।