रूसी सुरक्षा बलों ने जैसे ही यूक्रेनी सरजमीं पर अपना मोर्चा खोला तो कथित पश्चिमी उदारवादी जम्हूरियत पसंद मुल्कों ने क्रेमलिन पर नकेल कसने की हरमुमकिन कोशिश को अंजाम दिया। मॉस्को के हौंसले को तोड़ने के लिए उस पर बड़े पैमाने पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। पूर्वी यूरोप में उसके आयात-निर्यात को खासतौर से रोका गया, अमेरिका के इशारे पर रूसी अर्थव्यवस्था को बेल्जियम ने स्विफ्ट बैकिंग सिस्टम से बाहर कर दिया। इन कवायदों ने आधे अधूरे तौर पर मॉस्को को परेशान किया, लेकिन इसका दीर्घकालीन असर नदारद रहा। अभी तक पश्चिमी मुल्कों के साथ रूस के तिजारती तालुक्कात खटास भरे हैं, बावजूद इनके रूसी इकोनॉमी लड़खड़ाते-लड़खड़ाते ट्रैक पर बनी रही। जहां एक ओर अमेरिकी अगुवाई वाले देशों ने रूसी निर्यात को रोका तो वहीं क्रेमलिन ने पश्चिम की ओर होने वाले आयात प्रवाह को बाधित किया। प्रतिबंधों के चलते रूस से होने वाले डॉलर और यूरो एक्सचेंज को भी सीमित दायरे में बांध दिया गया। इन हालातों को दरकिनार करते हुए मॉस्को ने करीबी दोस्ताना मुल्कों के साथ अपने रिश्तों को धार दी और पश्चिमी बॉयकाट के असर को धत्ता बता दिया। इस फेहरिस्त में मॉस्को और नई दिल्ली एक दूसरे के साथ खड़े नजर आए।
रूस को बैकफुट पर लाने की हो रही हैं कोशिशें
‘सिर पर लाल टोपी रूसी’ भले ये गाने की लाइनें हो लेकिन इसके पीछे बेहद गहरे मायने छिपे है, वो कुछ यूं है कि मौजूदा हालातों में रूस के साथ जुड़कर काम करने वाली हिंदुस्तानी कंपनियों के लिए रिस्क फैक्टर बेहद कम है। इसके पीछे की बड़ी वजह मॉस्को-नई दिल्ली के गर्मजोश रिश्ते, दोनों मुल्कों के बीच दशकों से पनपी मजबूत तिजारती रवायतें और भारत के कारोबारियां का सधा-सतर्क नजरिया है। बीते साल जुलाई महीने के बाद से अमेरिकी अगुवाई वाले कई अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद रूस में भारतीय कंपनियों का कारोबार बढ़ा है। बता दें कि प्रोडक्शन, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सैक्टर के अपने खास किस्म जोखिम होते है, जिन पर भू-राजनीतिक, सामरिक, कूटनीतिक और द्विपक्षीय नीतिगत संबंधों का असर अलग अलग तरीके से पड़ता है। शीतयुद्ध से पहले वाशिंगटन और मॉस्को के बीच जंगी मोर्चें भले ही खत्म हो गए हों लेकिन इसके बाद से पॉलिसी वॉर में इजाफा देख गया खासतौर से अमेरिकी हुक्मरान की ओर से। आज से करीब आठ साल पहले अमेरिकी निजाम ने ये कानून कायम किया कि तरह-तरह के बैन लगाकर अमेरिका के दुश्मनों को घुटनों पर ला दिया जाए। इसी कानून (Countering America's Adversaries Through Sanctions Act.) की बुनियाद पर उन मुल्कों पर भी नकेल कसी जाने लगी, जो कि रूसी जंगी साजोसामान के बड़े खरीदार थे। कथित बैन की लपटें बीजिंग और अंकारा की दहलीज तक भी पहुंची हालांकि इन लपटों में तपिश बेहद कम रही। इस कानून के जरिए रूस से जंगी हथियार हासिल करने वाले खास अफसरों और सरकारी तंजीमों को निशाने पर लिया जाने लगा।
अमेरिकी प्रतिबंधों का असर बेहद सीमित
दिलचस्प है कि रूसी जंगी साजोसामान के सबसे बड़े खरीदार भारत इन कथित प्रतिबंधों के दायरे से अछूता ही रहा। साउथ ब्लॉक में बैठे अफसरों का रूख साफ है कि किसी भी तरह के बैन से ज्यादा मुल्क की हिफाजत उनके लिए सबसे ऊपर है। वाशिंगटन इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि अगर उसे बीजिंग से दौड़ में आगे रहना है तो दक्षिण एशिया में भारत से अच्छे रिश्ते बनाए रखना उसकी मजबूरी है, ऐसे में वो नई दिल्ली के साथ अपने रिश्ते ताजातरीन बनाए रखने की जुगत में लगा रहता है। सामरिक नजरिए से देखा जाए तो हिंदुस्तानी हथियारखाने में रूसी हथियारों का लंबे समय तक एकाधिकार रहा है, कई नाज़ुक जंगी हालातों में मॉस्को ने बिना शर्त नई दिल्ली को मदद मुहैया करवायी है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा जंगी साजोसामान बनाने वाला मुल्क है, वो भारत को बड़े बाजार के तौर पर देखता है, जिस पर अभी तक रूस काबिज है। ऐसे में वाशिंगटन अपने हथियार खापने के लिए रूस-भारत द्विपक्षीय संबंधों में सेंधमारी कर अपनी जगह बनाने के लिए बेकरार बैठा है। हाल में जैसे ही क्रेमलिन ने साउथ ब्लॉक को सुखोई एसयू-57 के पेशकश की तो अमेरिका ने तुरंत लॉकहीड मार्टिन एफ-35 लाइटनिंग को आगे कर दिया। कुल मिलाकर हथियारों के एवज में लगने वाले अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध अंकल सैम चाहकर भी भारत पर नहीं लगा सकते। साफ है कि व्हाइट हाउस की कारोबारी मजबूरिया उनके नीतिगत फैसलों पर भारी पड़ रही है, इसकी मिसाल भारत में साफ दिखाती है। दूसरी ओर आने वाले कई दशकों तक क्रेमलिन साउथ ब्लॉक के लिए हथियारों का बड़ी सप्लायर बना रहेगा। जिस तरह से यूक्रेन जंग में रूसी हथियारों ने अपनी काबिलियत का परचम लहराया है, उससे उनकी वैश्विक विश्वसनीयता में काफी इजाफा हुआ है।
बड़ी चुनौती नहीं है, अमेरिकी सदर का कार्यकारी आदेश
रूस पर लगाम कसने के लिए अमेरिकी सिपहसालारों ने मसौदा तैयार किया, जिसके मुताबिक रूसी डिफेंस इडंस्ट्री और उससे जुड़ी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को लेन-देन की मदद मुहैया कराने वाली कंपनियों (तीसरे पक्ष की कंपनियां) के ट्रांजेक्शन पर बैन लगाया जाए। इस मसौदे को हरी झंडी दिखाते हुए पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने दो पहले कार्यकारी आदेश जारी किया। पिछले साल ही अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने स्पष्टीकरण जारी किया कि प्रतिबंधों की जद में ना सिर्फ रूसी डिफेंस इडंस्ट्री और उसकी सहयोगी कंपनियां है बल्कि रूसी बैंक भी इसमें शामिल है। ओवल ऑफिस का आरोप था कि रूसी बैंक वहां की फौजी इकोनॉमी को लगातार मजबूती दे रहा है, इस वजह से बैन का फैसला लिया गया। इस कवायद के असर भारत पर ना के बराबर ही रहा। रूसी खेमे में खड़े देशों के लिए ये अमेरिकी कदम दबाव का सबब बना गया, ऐसे उन मुल्कों के बैंक रूस से लेन-देन करने को लेकर ज्यादा सतर्कता दिखाने लगे। उन्हें लगने लगा कि जिस तरह से अमेरिका का केंद्रीय बैंक रूस के खिलाफ कड़े फैसले ले रहा है, उससे उनकी बैकिंग प्रणाली पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। हालांकि कार्यकारी आदेश के असर वहां कम पड़ा जहां लेन-देन डॉलर और यूरो नहीं हो रहा था, साथ ही ट्रांजेक्शन ट्रांसफर के लिए जहां स्विफ्ट सिस्टम का इस्तेमाल नहीं हो रहा हो। फिलहाल रूस ऐसी बैकिंग व्यवस्था बनाने लगा हुआ है, जिस पर अमेरिका दबाव काम ना करे। लगातार आर्थिक प्रतिबंध झेल रहे रूस के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया है। अगर कोई मुल्क रूस के साथ रूबल में कारोबारी लेन-देन कर तो उसके लिए खास तरजीह दी जायेगी, जिसका खाका फिलहाल खींचा जा रहा है। आर्थिक जोखिम कम करने के लिए क्रेमलिन स्वतंत्र रूप से इस मोर्चे पर दीर्घकालीन रणनीति बनाने की कोशिशों में लगा हुआ है। फिलहाल रूसी हुक्मरान ये मकसद हासिल कर नहीं पाए हैं, अगर उन्हें इसमें कामयाबी हासिल हो जाती है तो उनकी बड़ी दुश्वारी खत्म हो जायेगी।
कई भारतीय कंपनियों पर भी लगा बैन
रूस के एनर्जी सेक्टर पर अमेरिकी प्रतिबंधों का असर ज्यादा देखा गया। रूसी एनर्जी सेक्टर में होने वाले कारोबारी लेन-देन पर अमेरिकी कार्यकारी आदेश लागू किया गया। इस दौरान रूसी कच्चे तेल के ट्रांसपोर्टेशन और सप्लाई को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। लगने वाले प्रतिबंधों की वज़ह से मॉस्को के पेट्रोलियम प्रोडक्ट और कच्चे की कीमतों पर दबाव बढ़ा। इस दबाव के असर को सहते हुए भारतीय बाज़ारों के लिए रूस ने मूल्य सीमा को पहले से ज्यादा लोचशील बना दिया, जिससे भारत की ओर होने वाले रूसी ऊर्जा संसाधनों की अवाक लगातार बेरोकटोक बनी रही। कुछ यहीं तस्वीर रूसी फूड इंडस्ट्री सैक्टर में देखी गयी। काबिलगौर ये भी है कि अमेरिका रूस के जिन सैक्टर्स को प्रतिबंधों से छूट दे रहा है, उसे वो कभी भी खत्म कर सकता है। फिलहाल गाज़ उन भारतीय कंपनियों पर भी गिर सकती है, जो कि रूस से सामान इम्पोर्ट करके उसे प्रोसेस करके वापस रूस को एक्सपोर्ट कर रही हैं। कई भारतीय कंपनियां इसी कार्यशैली के चलते अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ गयी, इनमें कई मध्यम दर्जें की इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग फॉर्मास्यूटिकल, ऑटोमेशन और एयरोनॉटिक्स वाली कंपनियां शामिल है। रूस से मशीनरी इम्पोर्ट करने के चलते इन्हें अमेरिकी बैन से दो-चार होना पड़ा। अगर मार्केट कैप के हिसाब से देखा जाए तो प्रतिबंध झेल रही कंपनियां ज्यादा बड़ी नहीं है। दूसरे मुल्कों के मुकाबले बेहद कम भारतीय कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंधों को झेल रही हैं। यूक्रेन में रूसी सैन्य दखल होने के बाद से सबसे पहले चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा, जिसकी तादाद दो सौ से ज्यादा है। ठीक इसी तरह वाशिंगटन ने रूस से तिजारती रिश्ता रखने के लिए सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, स्विट्जरलैंड और तुर्किए की भी कंपनियों पर बैन की चाबुक चलायी।
कामयाब नहीं हो पायेगी अमेरिकी मंशा
अमेरिकी कानूनी दखल के तहत काम करने वाली हिंदुस्तानी कंपनियां लेन-देन को लेकर वैसे काफी चुस्त रहती है लेकिन गफलत में उठाए गए कदमों के चलते उन्हें अमेरिकी तफ्तीश, छानबीन, जांच-पड़ताल और बैन का सामना करना पड़ जाता है। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो भारतीय कारोबारियों से जुड़ी अमेरिकी जांच पड़ताल का कोई बड़ा मामला आज तक सामने नहीं आया है। इसके उलट अमेरिकी प्रशासन ने कई मर्तबा ब्रिटिश, यूरोपीय यूनियन और अपने खुद के मुल्क की कंपनियों को छानबीन के दायरे में रखा। मौजूदा अमेरिकी सदर ट्रंप खांटी कारोबारी शख्स है, ऐसे में वो नई दिल्ली के हुक्मरानों और हिंदुस्तानी कारोबारियों पर दबाव बढ़ायेगें कि वो ज्यादा से ज्यादा कारोबार अमेरिका के साथ करें। अगर ऐसा होता है तो इसका साफ और सीधा मकसद ये होगा कि वो भारत से होने वाले रूसी कारोबार की राह में रोड़े पुख्ता तौर पर अटकाना चाहते हैं। इस तरह का दबाव रूस-भारत रिश्तों पर असर डालने में उतना कारगर नहीं होगा, जितना कि अमेरिकी नीति-नियंता उम्मीद लगाए बैठे हैं। रूसी इकोनॉमी को अलगाव में डालकर उसकी चौतरफा घेरेबंदी करना दिन में सपने देखने के मानिंद है।
इस आलेख के लेखक राम अजोर वरिष्ठ पत्रकार एवं समसमायिक मामलों के विश्लेषक हैं।
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