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UNSC 2028: एशिया-प्रशांत सीट के लिए भारत की राह क्यों है चुनौतीपूर्ण, समझें कूटनीतिक समीकरण

अतीत में भारत रिकॉर्ड 8 बार अ-स्थायी सदस्य रह चुका है और आमतौर पर आम सहमति से जीतता आया है। लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग हैं। संयुक्त राष्ट्र के चुनावों में वोटिंग गुप्त होती है। कूटनीति का एक कड़वा सच यह है कि कई बार छोटे देश बड़े और शक्तिशाली देशों के दबदबे के खिलाफ गुप्त रूप से वोट कर देते हैं।

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Photo : AP
यूएनएससी में अ-स्थायी सदस्यता की रेस में भारत।
Written by: Alok Rao
Updated Jul 15, 2026, 15:05 IST

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अ-स्थायी सीट के लिए भारत ने 2028-29 के कार्यकाल के लिए अभी से अपना 'शांति विजन' (SHINE) अभियान शुरू कर दिया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 13 जुलाई को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आधिकारिक रूप से भारत के इस मुहिम की शुरुआत की। भारत का असली इरादा तो यूएनएससी की स्थायी सदस्यता हासिल करना है। फिलहाल, इस 'शांति विजन' (सेक्युरिंग हॉलिस्टिक एडवांसमेंट थ्रू नॉर्म्स, ट्रस्ट, इंटेग्रिटी) का उद्देश्य अ-स्थायी सीट को जीतना है। इस अभियान की शुरुआत के मौके पर कई मौके के राजदूत, राजनयिक और यूएन के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। यह अभियान 2028-29 के लिए है और इसके लिए जून 2027 में चुनाव होंगे। खास बात यह है कि यूएनएससी की अ-स्थायी सीट के लिए भारत ने करीब एक साल पहले अपने 'शांति विजन' कार्यक्रम की शुरुआत की है। वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच, आइए समझते हैं कि इस बार नई दिल्ली के सामने क्या चुनौतियां हैं।

एशिया-प्रशांत समूह में असल चुनौती कौन है?

इस सीट के लिए भारत का सीधा मुकाबला ताजिकिस्तान से है। ताजिकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है। चुनाव में इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) के 57 सदस्य देशों का ब्लॉक-वोटिंग (एकतरफा मतदान) का झुकाव ताजिकिस्तान की तरफ हो सकता है। यही कारण है कि भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क जाने से पहले कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान जैसे खाड़ी देशों का दौरा कर भारत के लिए समर्थन जुटाना शुरू कर दिया। लेकिन यह भी सच है कि केवल मुस्लिम देश होने भर से ही ताजिकिस्तान को सभी मुस्लिम देशों का समर्थन नहीं मिल जाएगा। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देशों के साथ भारत के बहुत ही गहरे रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध हैं।

यह चुनाव भारत के लिए कठिन क्यों है?

अतीत में भारत रिकॉर्ड 8 बार अ-स्थायी सदस्य रह चुका है और आमतौर पर आम सहमति से जीतता आया है। लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग हैं। संयुक्त राष्ट्र के चुनावों में वोटिंग गुप्त होती है। कूटनीति का एक कड़वा सच यह है कि कई बार छोटे देश बड़े और शक्तिशाली देशों के दबदबे के खिलाफ गुप्त रूप से वोट कर देते हैं। हाल ही में एक चुनाव में शक्तिशाली जर्मनी को ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल जैसे अपेक्षाकृत कम प्रभाव वाले देशों से हार का सामना करना पड़ा था। भारत इस जोखिम को हल्के में नहीं ले सकता। रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-गाजा संकट और अमेरिका-ईरान तनाव के कारण दुनिया गुटों में बंट चुकी है। ऐसे में हर एक वोट हासिल करने के लिए भारी कूटनीतिक मेहनत की जरूरत है।

महासभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने होंगे

अस्थायी सदस्यता पाने के लिए भले ही मुकाबला एक देश से हो, लेकिन UNSC की सीट जीतने के लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत (कम से कम 129 वोट) हासिल करना अनिवार्य होता है। भारत केवल एक अ-स्थायी सीट नहीं, बल्कि भविष्य में सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का दावा पेश कर रहा है। इसके पक्ष में भारत के पास ठोस तर्क हैं। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और सबसे बड़ा जीवंत लोकतंत्र है, जो वैश्विक मंच पर प्रतिनिधित्व का हकदार है। GDP के मामले में भारत दुनिया की शीर्ष 5 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जो वैश्विक निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। यही नहीं भारत दशकों से संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में से एक रहा है। ग्लोबल साउथ विजन के जरिए भारत विकासशील देशों की आवाज बन रहा है, जिससे उसे छोटे देशों का भरोसा मिल सके।

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भारत का यह अभियान केवल 2 साल के कार्यकाल के लिए नहीं है, बल्कि यह दुनिया को यह दिखाने का एक मौका है कि 1945 के पुराने नियमों पर चल रही सुरक्षा परिषद में अब सुधार की सख्त जरूरत है। ताजिकिस्तान के खिलाफ यह चुनावी मुकाबला भारत की कूटनीतिक परीक्षा होगी।

तेजी से बदल रहे वैश्विक स्तर पर समीकरण

यूएनएससी की अ-स्थायी सदस्यता के लिए भारत की यह दावेदारी ऐसे समय हुई जब दुनिया उथल-पुथल, संघर्षों और युद्धों से गुजर रही है। वैश्विक घटनाओं का असर भू-राजनीति पर पड़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान-अमेरिका, इजराइल जंग, गाजा संकट का असर क्षेत्रीय संतुलन पर हुआ है। असुरक्षा की भावना से ग्रसित देशों के बीच नए-नए रणनीतिक संबंध और ब्लॉक बन रहे हैं। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान मिलकर मुस्लिम NATO बनाना चाहते हैं। इजराइल चाहता है कि यूएई, मिस्र, भारत जैसे देशों को मिलाकर वह एक नया ग्रुप बनाए। आसियान देशों में भी नए ब्लॉक की सुगबुगाहट है। भारत भी अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने एवं उसे सुरक्षित रखने के लिए कूटनीतिक पहल कर रहा है। विश्व की मौजूदा समस्याओं और चुनौतियों को देखते हुए एक बार सवाल फिर खड़ा हुआ है कि संयुक्त राष्ट्र क्या इन समकालीन वैश्विक संकटों का समाधान करने में समर्थ है?

आज दुनिया के सामने अलग तरह की चुनौतियां

यूएनएससी की असली ताकत इसके पांच स्थायी सदस्यों के हाथों में है। इन पांच सदस्य देशों के पास ही वीटो का अधिकार है और साल 1945 से ही वीटो की इस व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ है। 1945 के बाद शुरुआती दशकों में दुनिया के सामने दूसरी तरह की वास्तविकताएं और चुनौतियां थीं, आज दूसरी हैं। भारत बार-बार कहता आया है कि आज की वैश्विक चुनौतियों एवं जरूरतों के हिसाब से इस संस्था में सुधार की जरूरत है और स्थायी सदस्य के रूप में भारत अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए पूरी तरह से तैयार है।

UN में पुर्तगाल-ऑस्ट्रिया से जर्मनी को मिली हार

हाल के समय में संयुक्त राष्ट्र के चुनावों में समीकरण लगातार बदले हैं। ऐसा देखने में आया है कि संयुक्त राष्ट्र में ज्यादा कूटनीतिक प्रभाव रखने वाले देश को भी मनमाफिक नतीजे नहीं मिले हैं और उसे निराश होना पड़ा है। इसे देखते हुए कोई भी रसूखदार देश अपनी जीत को अब हल्के में नहीं ले सकता। सुरक्षा परिषद के एक हालिया चुनाव में जर्मनी जैसे देश को कूटनीतिक रूप से कम प्रभावी माने जाने वाले पुर्तगाल एवं ऑस्ट्रिया के आगे हार का सामना करना पड़ा। यह चुनाव इस बात की ओर इशारा करता है कि कूटनीतिक वजन यहां तक कि ताकतवर एवं विकसित देशों के लिए भी काफी नहीं है। अपने इस अभियान की शुरुआत के साथ भारत चुनाव की रेस में आ गया है और भारत के इस चुनावी मुहिम को अमेरिका, ऑस्ट्रिया, फिजी एवं श्रीलंका सहित कई साझेदार देशों का समर्थन मिल चुका है।

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इन सालों में भारत रह चुका है अ-स्थायी सदस्य

इस सीट के लिए भारत का मुकाबला ताजिकिस्तान से होना है। ताजिकिस्तान एक मुस्लिम देश है और समझा जाता है कि इस चुनाव में इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) के 57 देश उसका समर्थन कर सकते हैं। ऐसे में एशिया-प्रशांत का यह चुनावी जंग काफी दिलचस्प बन गया है। इस चुनाव पर सभी की करीबी नजर रहेगी। इस चुनाव में भारत को यदि जीत मिलती है तो सुरक्षा परिषद का वह नौवीं बार अ-स्थायी सदस्य बनेगा। भारत 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 19-77-78, 1984-1985, 1991-1992, 2011-2012 और 2021-2022 में अ-स्थायी सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दे चुका है। भारत इस बार चुनाव जीतता है तो अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के मुद्दों पर होने वाली बहस-बैठकों एवं नीति-निर्धारण में उसकी सीधी भागीदारी होगी। साथ ही वह इस वैश्विक इकाई में सुधार के अपने एंजेडे को ज्यादा मजबूती एवं प्रभावी तरीके से आगे बढ़ा पाएगा।

कई देशों का दौरा कर जयशंकर ने तेज की लामबंदी

खास बात यह भी है कि अ-स्थायी सीट के लिए भारत का दावेदारी मजबूत करने से पहले विदेश मंत्री ने भारत की कूटनीतिक लामबंदी तेज की। वह पांच से 10 जुलाई के बीच कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान के दौरे पर गए और इसके बाद वह न्यूयॉर्क पहुंचे। यहां उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटरेस से मुलाकात की। न्यूयॉर्क में अपने अभियान की शुरुआत करते हुए जयशंकर ने उन व्यापक सिद्धांतों की रूपरेखा पेश की जिनका भारत सुरक्षा परिषद में चुने जाने पर समर्थन करना चाहता है। उन्होंने कहा, 'भारत का फोकस एक सुरक्षित, शांतिपूर्ण और समान दुनिया के लिए काम करने पर होगा। एक ऐसी दुनिया जहां ग्लोबल साउथ की आवाज को बराबरी से सुना जाए। एक ऐसी दुनिया जहां शांति स्थापना समकालीन और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हो। एक ऐसी दुनिया जहां बहुपक्षवाद समकालीन वास्तविकताओं को दर्शाए और प्रभावी समाधान दे, सिर्फ एक मूकदर्शक बनकर न रह जाए।' न्यूयॉर्क के बाद जयशंकर तीसरे इंडिया-यूरोपीयन यूनियन ट्रेड एंड टेक्नॉलजी काउंसिल की बैठक के लिए ब्रसेल्स रवाना हुए। यहां उनकी मुलाकात बेल्जियन एवं यूरोपीय यूनियन के अपने समकक्षों से होनी है।

भारत को स्थायी सदस्यता क्यों मिलनी चाहिए?

भारत विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश और सबसे बड़ा लोकतंत्र है। भारत का कहना है कि सुरक्षा परिषद, जो 1945 की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं पर आधारित है, आज की दुनिया का प्रतिनिधित्व नहीं करती। खासकर जब दक्षिण एशिया और अफ्रीका जैसे विशाल क्षेत्रों का कोई स्थायी प्रतिनिधित्व ही नहीं है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और अब सकल घरेलू उत्पाद के मामले में शीर्ष पांच देशों में शुमार है। भारत का तर्क है कि आर्थिक ताकत को वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में प्रतिबिंबित होना चाहिए। भारत संयुक्त राष्ट्र शांति सेनाओं में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक रहा है, दशकों से हजारों सैनिक और पुलिसकर्मी भेजता आया है जो वैश्विक सुरक्षा में उसकी व्यावहारिक भागीदारी दर्शाता है। G20, G4 (भारत, जापान, जर्मनी, ब्राज़ील), और क्वाड जैसे मंचों में सक्रिय भूमिका को भारत अपनी बढ़ती वैश्विक जिम्मेदारी के प्रमाण के तौर पर पेश करता है। साथ ही, परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के बावजूद स्थायी सदस्यता से बाहर रहना भारत को विसंगति लगता है, जबकि अन्य परमाणु शक्तियां (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) पहले से स्थायी सदस्य हैं।

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