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Father Of India: महात्मा गांधी को सबसे पहले किसने दी थी राष्ट्रपिता की उपाधि? सिंगापुर से है कनेक्शन

How Gandhi became Father of the Nation: क्या आपने कभी ये सोचा है कि गांधी जी को महात्मा गांधी या फिर राष्ट्रपिता और बापू कहकर क्यों पुकारा जाता है, उनके ये सारे नाम कैसे पड़े। बापू, राष्ट्रपिता और महात्मा पहली बार किसने और क्यों पुकारा? आपको इसके पीछे की कहानी बताते हैं।

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Father Of India: महात्मा गांधी को सबसे पहले किसने दी थी राष्ट्रपिता की उपाधि? सिंगापुर से है कनेक्शन

Fathers Day Special on Gandhi ji: पिता और बच्चों के रिश्ते की व्याख्या शब्दों में कर पाना शायद संभव नहीं होगा। क्योंकि कुछ रिश्तों की गहराई बयां करने के लिए शब्द ही नहीं बने हैं। पिता आसमान है, पिता सारा जहान है। पिता वो छत है, जिसके बिना कोई बच्चा धूप में जलता है, बारिश में भींग जाता है और ठंड से ठिठुर जाता है। पिता वो पेड़ है जिसके न होने से बच्चे के सिर से साया उठ जाता है। पिता का दर्जा आकाश का होता है। महाभारत में युधिष्ठर ने यज्ञ के एक सवाल के जवाब में आकाश से ऊंचा 'पिता' को कहा है और यक्ष ने उसे सही माना भी है। लेकिन किसी व्यक्ति को देश का पिता (Father of Nation) यानी 'राष्ट्रपिता' कहा जाए, तो उसकी अहमियत और बलिदानों को समझना मुश्किल नहीं है।

महात्मा गांधी को कहा जाता है बापू और राष्ट्रपिता

भारत की स्वतंत्रता में महात्मा गांधी के बलिदान को कभी कोई भुला नहीं सकता है। मोहनदास करमचंद गांधी को भारतवासी महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता और बापू कहकर पुकारते हैं। लेकिन क्या आप इसके पीछे की वजह जानते हैं, या फिर ये जानते हैं कि पहली बार मोहन दास करमचंद गांधी को महात्मा किसने कहा था, राष्ट्रपति की संज्ञा किसने दी थी? भारत के लोग बापू की आदर करते हैं और उनके प्रति सम्मान का बखान करने से कभी नहीं कतराते हैं।

पहली बार किसने गांधी को कहा था राष्ट्रपिता?

क्या आपने कभी ये सोचा है कि गांधी जी को महात्मा गांधी या फिर राष्ट्रपिता और बापू कहकर क्यों पुकारा जाता है, उनके ये सारे नाम कैसे पड़े। बापू, राष्ट्रपिता और महात्मा पहली बार किसने और क्यों पुकारा? आपको इसके पीछे की कहानी बताते हैं। पहली मोहनदास करमचंद को ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि सुभाष चंद्र बोस ने दी थी।

राष्ट्रपिता की उपाधि से क्या है सिंगापुर का कनेक्शन?

वो तारीख इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी को पहली बार राष्ट्रपिता की उपाधि दी थी। वर्ष 1944 के जून माह का चौथा दिन यानी 4 जून, 1944... सिंगापुर रेडियो से एक संदेश प्रसारित करते हुए सुभाष चन्द्र बोस ने महात्मा गांधी को ‘देश का पिता’ (राष्ट्रपिता) कहकर संबोधित किया था। लोगों ने उन्हें राष्ट्रपिता कहकर पुकारना शुरू कर दिया। इसके बाद भारत सरकार ने भी इस नाम को मान्यता दे दी। 30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गांधी का देहांत हो गया, उसके बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो के माध्यम से देश को संबोधित किया था और कहा था कि 'राष्ट्रपिता अब नहीं रहे'।

जब महात्मा गांधी को मिली 'बापू' की संज्ञा

महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए कई आंदोलन चलाए। सूट-बूट पहनने वाले गांधी धीरे-धीरे सादा जीवन अपनाने लगे। उन्होंने अपना कोट और जूता सबकुछ त्याग दिया। धोती, शॉल और खड़ाऊ पहनकर महात्मा गांधी लोगों के बीच उठने बैठने लगे। अहिंसा का मार्ग अपनाया, एक धोती और लाठी के साथ पदयात्राएं की, जेल गए। लोगों और देश के प्रति गांधी के इस भाव को देखकर लोग उन्हें प्रेम से बापू (पितातुल्य) पुकारने लगे।

सबसे पहले गांधी को किसने कहा था महात्मा?

बताया जाता है कि वर्ष 1915 में वैद्य जीवन राम कालिदास ने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी कहकर संबोधित किया था। हालांकि कई जगह इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि पहली बार महात्मा शब्द की संज्ञा और उपाधि रवींद्रनाथ टैगोर ने दी थी। इतिहासकारों ने गांधी को महात्मा कहने का श्रेय टैगोर को दी है।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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