Vibe Movie Review: कुणाल खेमू की ‘वाइब’ दोस्ती, कॉमेडी और जासूसी का मजेदार तड़का लगाती है। फिल्म का पहला हाफ हंसाता है, लेकिन इंटरवल के बाद कहानी थोड़ी उलझती नजर आती है।
फिल्म वाइब का रिव्यू (Image Source: IMDb)
Vibe Movie Review: कुणाल खेमू (Kunal Kemmu) एक बार फिर अपनी कॉमेडी वाली दुनिया में लौटे हैं, लेकिन इस बार कहानी सिर्फ हंसी-मजाक तक नहीं रुकती। उनकी नई फिल्म ‘वाइब’ (Vibe) में दोस्ती, कॉमेडी, जासूसी और एक अजीब मिशन का तड़का लगाया गया है। फिल्म में कुणाल खेमू के साथ स्पर्श श्रीवास्तव (Sparsh Shrivastava) और प्रीति जिंटा (Preity Zinta) नजर आ रहे हैं। कुणाल ने फिल्म को डायरेक्ट करने के साथ इसमें एक्टिंग भी की है। ये फिल्म आज यानी 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। तो चलिए जानते हैं फिल्म वाइब में क्या अच्छा और क्या बुरा है।
फिल्म की कहानी हार्दिक शर्मा यानी कुणाल खेमू से शुरू होती है। हार्दिक अपनी जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है और इलाज के बाद वापस लौटता है। उसका दोस्त भागीरथ यानी ‘बग्स’, जिसका किरदार स्पर्श श्रीवास्तव ने निभाया है, उसे संभालने और नौकरी दिलाने की कोशिश करता है। दोनों की दोस्ती फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा है। हार्दिक को अपनी कंपनी में काम करने वाली करीना यानी वंशिका धीर पसंद आ जाती है। वो उसे डेट पर ले जाने की कोशिश करता है। यहीं से उसकी जिंदगी में ऐसी गड़बड़ शुरू होती है, जिसका अंदाजा शायद खुद हार्दिक को भी नहीं होता। मामला धीरे-धीरे जासूसी की दुनिया तक पहुंच जाता है। प्रीति जिंटा यहां मैडम एच के किरदार में हैं, जो एक सरकारी एजेंसी से जुड़ी हैं। उन्हें एक बड़े अपराधी और उसके प्लान को पकड़ना है। लेकिन इस काम में जिन दो लोगों का साथ मिलता है, उन पर भरोसा करना ही सबसे बड़ा रिस्क है। इसके बाद दोनों एक ऐसे मिशन में फंस जाते हैं, जिसके लिए उन्हें जासूस बनने की ट्रेनिंग तक लेनी पड़ती है। फिल्म का मजा यहीं से आता है कि दोनों में से कोई भी जासूस बनने लायक नहीं लगता। एक तरफ सरकारी मिशन है, दूसरी तरफ दोनों दोस्तों की अपनी ही अलग दुनिया। इसके बीच अपराधी, पहचान का खेल और ताकत बढ़ाने वाली दवा जैसी चीजें कहानी में जुड़ती जाती हैं।
सबसे पहली और बड़ी बात है कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव की जोड़ी। दोनों जब भी स्क्रीन पर साथ आते हैं, फिल्म अपने आप हल्की और मजेदार हो जाती है। बग्स थोड़ा समझदार बनने की कोशिश करता है, जबकि हार्दिक बिना ज्यादा सोचे कुछ भी कर बैठता है। दोनों के बीच की नोकझोंक और दोस्ती वाले सीन फिल्म के सबसे मजेदार हिस्सों में हैं। कुणाल खेमू की कॉमेडी टाइमिंग भी फिल्म को काफी संभालती है। वो हार्दिक को जरूरत से ज्यादा हीरो बनाने की कोशिश नहीं करते। उनका किरदार बेवकूफियां करता है, गलत फैसले लेता है और फिर उन्हीं चीजों से मजेदार हालात पैदा होते हैं। यही अंदाज फिल्म को बाकी जासूसी फिल्मों से थोड़ा अलग बनाता है। फिल्म का पहला हाफ खास तौर पर मजबूत है। शुरुआत से ही फिल्म खुद को बहुत गंभीर नहीं लेती। डायलॉग, छोटे-छोटे मजाक और दोनों दोस्तों की हरकतें लगातार हंसाने की कोशिश करती हैं। कई जगह कॉमेडी बिना किसी बड़े सेटअप के सिर्फ किरदारों के व्यवहार से निकलती है। प्रीति जिंटा भी मैडम एच के रोल में अलग अंदाज में नजर आती हैं। उनका किरदार इन दोनों के मुकाबले काफी गंभीर है और यही फर्क कई सीन में मजा पैदा करता है। फिल्म का म्यूजिक और बैकग्राउंड म्यूजिक भी इसके मूड के साथ चलता है। खासकर जब फिल्म कॉमेडी से एक्शन की तरफ जाती है, तब बैकग्राउंड म्यूजिक माहौल बनाने में मदद करता है।
अब बात उस हिस्से की, जहां ‘वाइब’ थोड़ी कमजोर पड़ती है। फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत इसका दूसरा हाफ है। इंटरवल के बाद कहानी अचानक ज्यादा बड़ी और उलझी हुई बनाने की कोशिश की जाती है। अपराधी कौन है, असली पहचान क्या है, ताकत बढ़ाने वाली दवा क्या करती है और आगे क्या होने वाला है। इन सब चीजों को एक साथ जोड़ दिया जाता है। इससे वो सीधी-सादी कॉमेडी, जो पहले हाफ में मजा दे रही थी, थोड़ी पीछे चली जाती है। दरअसल फिल्म को सबसे ज्यादा फायदा तब होता है, जब हार्दिक और बग्स साथ होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म जासूसी और एक्शन पर ज्यादा ध्यान देने लगती है, दोनों की दोस्ती और उनकी कॉमेडी को कम जगह मिलती है। यही वजह है कि दूसरे हाफ में पहले जैसी हंसी लगातार नहीं आती। कुछ ट्विस्ट भी ऐसे लगते हैं जिन्हें कहानी को आगे बढ़ाने के लिए जबरदस्ती जोड़ा गया है। सुपर स्ट्रेंथ वाली दवा वाला हिस्सा भी फिल्म को एक अलग दिशा में ले जाता है। इससे कहानी थोड़ी ज्यादा बनावटी लगने लगती है। एक और कमी ये है कि फिल्म हर मजाक काम करेगा, ऐसा नहीं है। कुछ पंच अच्छे लगते हैं, तो कुछ सीन जरूरत से ज्यादा खींचे हुए लगते हैं। यानी फिल्म की कॉमेडी का स्तर हर जगह एक जैसा नहीं रहता। प्रीति जिंटा का किरदार भी देखने में अच्छा लगता है, लेकिन उसे कहानी में उतनी जगह नहीं मिलती कि वो पूरी तरह खुल सके। वहीं कुछ दूसरे कलाकार भी अच्छे होने के बावजूद अपनी पूरी क्षमता दिखाने का मौका नहीं पाते।
अगर आप हल्की-फुल्की कॉमेडी, दोस्ती और थोड़ी अजीब किस्म की जासूसी कहानी पसंद करते हैं, तो ‘वाइब’ एक बार देखी जा सकती है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव की जोड़ी है। दोनों की केमिस्ट्री और पहला हाफ फिल्म को काफी मजेदार बनाते हैं। लेकिन अगर आप एक ऐसी जासूसी फिल्म देखने जा रहे हैं, जिसमें कहानी शुरू से आखिर तक बहुत सधी हुई हो और हर ट्विस्ट दमदार हो, तो यहां आपको थोड़ी निराशा हो सकती है। फिल्म का दूसरा हाफ पहले हिस्से जितना मजबूत नहीं है और कहानी जरूरत से ज्यादा चीजों को साथ लेकर चलने लगती है।