Toxic Review in Hindi: डायरेक्टर गीतू मोहनदास की टॉक्सिक संगमरमर के उस ताजमहल की तरह है, जो बाहर से कमाल की लगती है लेकिन अंदर जाकर पता चलता है कि इसमें रहता कोई भी नहीं है।
Toxic Review: 'टॉर्चर' है यश की 'टॉक्सिक' (Review By- Rahul Sharma)
Toxic Review in Hindi: हर फैसले की एक सही कीमत होती है और टॉक्सिक का फर्स्ट डे, फर्स्ट शो देखकर मैंने वो कीमत अपनी नींद से चुकाई है। अब आप ही बताइए कि केजीएफ वाले यश को पर्दे पर कौन दोबारा नहीं देखना चाहता है, केजीएफ वाला यश हमें पसंद इसलिए आया था क्योंकि वो अपनी एक दर्दभरी कहानी स्वैग के साथ सुनाने के लिए आया था। अगर वही यश हमें सिर्फ अपना स्वैग दिखाने आ जाए तो हम भी बोलेंगे ना कि भाई क्या टॉक्सिकपना है...? फिल्म टॉक्सिक की परेशानी यही है कि इसमें वो सबकुछ है, जो केजीएफ सीरीज के बाद आने वाली यश की मूवी में होना चाहिए था लेकिन अधपका सा...।
फिल्म टॉक्सिक की कहानी राया नाम के एक लड़के की है, जिसको उसकी बहन गंगा (नयनतारा) ने पालकर बड़ा किया है। 1947 के दौरान गोवा पर पूर्तगालियों का कब्जा है और वहां पर गैरकानूनी धंधे धड़ल्ले से चल रहे हैं। गंगा का सपना है कि उसका भाई राया गोवा की गद्दी पर बैठे और इसके लिए अगर उसे खून की नदियां भी बहानी पड़ें तो बहा देगी। जैसे-जैसे राया बड़ा होता है, वैसे-वैसे गंगा का सपना आकार लेने लगता है क्योंकि गोवा का सबसे बड़ा माफिया उस पर अपना हाथ रख देता है और अपनी बेटी रेबिका (तारा सुतारिया) की शादी उससे करने को तैयार हो जाता है लेकिन तभी राया की किस्मत पलटी मारती है और उसकी जिंदगी में नाडिया (कियारा आडवाणी) आ जाती है। नाडिया, राया को उसके अंदर छुपा वो इंसान दिखाती है जो खून-खराबा करते-करते मर सा गया था। गोवा का किंग बनते-बनते राया इश्क की उस गली में चल देता है, जिसके बाद उसकी जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है। TimesNow NavBharat पर ये Entertainment News भी पढ़ें: Toxic Box Office Prediction Day 1: 'धुरंधर 2' के रिकॉर्ड को तोड़ेगी Yash की फिल्म, कमाएगी इतने करोड़
गीतू मोहनदास द्वारा डायरेक्टेड टॉक्सिक का कॉन्सेप्ट बहुत ही मासी है और उन्होंने इसे ट्रीट भी उसी अंदाज में किया है। बड़े-बड़े सेट, जबरदस्त कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग, खूंखार दिखने वाले मर्द, खूबसूरत लड़कियां और बेहतरीन कैमरावर्क टॉक्सिक में सबकुछ है लेकिन अगर इसमें कुछ नहीं है तो वो है स्क्रीनप्ले...। फिल्म टॉक्सिक का स्क्रीनप्ले इतना खराब है कि ये पूरे फर्स्ट हाफ तक दर्शकों को अपने साथ जोड़ ही नहीं पाता है। गीतू मोहनदास का पूरा ध्यान यश का स्वैग कैप्चर करने में लगा रहा लेकिन उन्हें ये याद ही नहीं रहा कि इस स्वैग का मतलब बिना इमोशन्स के कुछ नहीं है। सेकेंड हाफ में थोड़ी बात बनती जरूर है लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है और आखिर में गीतू मोहनदास दर्शकों को जो झटका देती हैं वो शॉक नहीं बल्कि सिरदर्द है।
बात करें यश की तो वो केजीएफ से साबित कर चुके हैं कि उनमें एक जबरदस्त मास एंटरटेनर छुपा है, जिसका स्क्रीन प्रेजेंस कमाल का है। गीतू मोहनदास ने टॉक्सिक में भी उनका वही अंदाज भुनाने की कोशिश की है और फिल्म टॉक्सिक का अकेला सेविंग ग्रेस यश का स्वैग ही है। यश ने हर एक सीन को शानदार परफॉर्म किया है। यहां तक कि जब दो-दो यश स्क्रीन पर होते हैं तब भी दर्शक स्क्रीन से नजर नहीं हटाते हैं और ये साबित करता है कि यश कमाल के परफॉर्मर हैं लेकिन सिर्फ यश के कंधों पर 3 घंटे से लम्बी मूवी का बोझ तो नहीं डाल सकते हैं। TimesNow NavBharat पर ये Entertainment News भी पढ़ें: Uri मिशन में हो गई थी इस Toxic हसीना के पिता की मौत, Kantara से मिली थी पहचान...बनी 'नेशनल क्रश'
टॉक्सिक में नयनतारा ने राया की बड़ी बहन का किरदार प्ले किया है, जो आखिरी सांस तक उसका साथ निभाती है। वो स्क्रीन पर हार्टलेस लेडी के रूप में नजर आती हैं लेकिन परेशानी ये है कि जब इस किरदार की मौत होती है तो रोना नहीं आता। यहां पर दर्शकों की आंखें नम ना होना गीतू मोहनदार की बड़ी हार है। कियारा आडवाणी खून-खराबे से भरी दुनिया में खिलते गुलाब की तरह हैं जो राया का ह्यूमनाइड चेहरा पर्दे पर पेश करती है लेकिन उससे राया जिस तरह से किनारा करता है, वो किसी की समझ नहीं आता है। तारा सुतारिया एक बड़े बाप की बेटी के रूप में ठीक लगी हैं, जिसका सपना एक ड्रीमी वेडिंग का है। उसका सपना जब टूटता है तो वो जिस दर्द को महसूस करती है, उसे तारा ने ठीक से पेश किया है लेकिन उनके किरदार में करने को कुछ ज्यादा नहीं था। हुमा कुरैशी की बात करें तो उन्हें ये सवाल खुद से पूछना चाहिए कि आखिरकार उन्होंने ये रोल एक्सेप्ट क्यों किया है? राया की जिंदगी में आने वाली आखिरी लड़की मेलिसा यानि कि रुक्मिणी वसंत हैं। गीतू मोहनदास ने उनके रोल को भी ठीक से नहीं लिखा है, जिस कारण वो इस बार प्रभावित नहीं करती हैं।
फिल्म टॉक्सिक 'द यश शो' है, जिसमें पहले फ्रेम से लेकर आखिरी फ्रेम तक यश छाए रहते हैं लेकिन परेशानी ये है कि यश को बार-बार एक्शन करते और इंटिमेट सीन्स परफॉर्म करते देखकर वो इंटरेस्ट लूज हो जाता है, जिसके लिए सभी थिएटर जा रहे हैं। टॉक्सिक का बैकग्राउंड म्यूजिक और कैमरावर्क बेहतरीन है। फिल्म के कुछ-कुछ शॉट्स तो इतने कमाल के हैं दर्शक सोच में पड़ जाएंगे कि इन्हें डिजाइन करने में कितनी मेहनत लगी होगी। हालांकि गीतू मोहनदास की टॉक्सिक की परेशानी ये है कि ये संगमरमर से बना वो ताजमहल है, जिसमें रहता कोई नहीं है। खूबसूरत से खूबसूरत महल को भी घर बनाने के लिए इमोशन्स चाहिए, जो टॉक्सिक में नहीं हैं।
अब बड़ा फैसला ये है कि क्या ये फिल्म देखनी चाहिए या नहीं? देखिए अगर आप यश के फैन हैं, जो उनका स्टाइल और स्वैग देखने के लिए एक्साइटेड हैं तो टॉक्सिक आपके लिए है लेकिन अगर आप एक अच्छी मास एंटरटेनर की तलाश में हैं तो टॉक्सिक आपके लिए गलत फैसला साबित हो सकती है। हम अपनी ओर से टॉक्सिक को 2 स्टार देते हैं।