बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर गहमागहमी जारी है। राज्य की सत्ता पर काबिज होने के लिए राजनीतिक पार्टियां हर मुमकिन कोशिश में लगी हैं। पर क्या आपको पता है कि बिहार चुनाव का एक ऐसा किस्सा जिसमें एक-दो नहीं बल्कि 72 विधायक चुनाव जीतने के बाद विधायक पद के लाभ नहीं ले पाए। जानिए उस दौरान ऐसा क्या हुआ था? यह बात है साल 2005 के विधानसभा चुनाव की जो फरवरी में हुए थे। उस वक्त वर्तनाम सीएम नीतीश कुमार के नेतृत्व में JDU और BJP एनडीए के बैनर तले चुनाव लड़ी थी।
वहीं आरजेडी, कांग्रेस, रामविलास पासवान की पार्टी लोक जन शक्ति पार्टी अकेले चुनाव लड़ी थी। पर दिलचस्प बात यह कि उस चुनाव में किसी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
कोई भी दल बहुमत के आंकड़े 122 से दूर ही रह गया
बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों पर फरवरी 2005 में चुनाव लड़ा गया। जिसमें से नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़कर 55 सीटें जीतीं। वहीं लालू यादव की पार्टी आरजेडी 215 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें से उसे 75 सीटों पर जीत मिली थी। उधर बीजेपी 103 सीटों पर चुनाव लड़कर 37 सीटों पर जीती। कांग्रेस का हाल खराब रहा और वो 84 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 10 सीटें ही जीत पाई थी। वहीं इस चुनाव में रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी ने कमाल करते हुए 29 सीटों पर जीत हासिल की। पर फरवरी 2005 के चुनाव में कोई भी दल बहुमत के आंकड़े 122 से दूर ही रह गया।

फरवरी 2005 के चुनाव में कोई भी दल बहुमत के आंकड़े से दूर रहा
...और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया
उस वक्त केंद्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। जब बहुमत नहीं हासिल हुआ तो तत्कालीन केंद्र सरकार ने बिहार विधानसभा को भंग कर दिया और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। इस सारी कवायद के बीच जीते हुए विधायक पद की शपथ भी नहीं ले पाए। यह घटनाक्रम बिहार के इतिहास में आज भी याद किया जाता है।
रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा के पास थी 'सत्ता की चाभी' पर....
फरवरी 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी या गठबंधन को 122 सीटों का स्पष्ट बहुमत नहीं हासिल हुआ पर रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा 29 सीटों हासिल करने के बाद 'किंग मेकर' की भूमिका में नजर आ रही थी। जेडीयू और बीजेपी को मिलाकर 92 सीटें ही हो रही थीं वहीं आरजेडी और कांग्रेस की मिलकर 85 सीटें थीं। यानी कहा जा सकता है कि रामविलास पासवान अगर एनडीए का साथ दे देते तो नीतीश की सरकार बन सकती थी। पर बताते हैं कि रामविलास पासवान मुस्लिम उम्मीदवार को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने पर अड़ गए जिससे कोई समाधान ना निकल सका। और बात बिगड़ती चली गई जिससे तत्कालीन बिहार गवर्नर ने किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किया।

फरवरी 2005 में एलजेपी ने 29 सीटों पर जीत हासिल की
जीते हुए विधायक इंतजार ही करते रह गए...
अचानक राष्ट्रपति शासन लागू हो गया और विधायक शपथ भी नहीं ले पाए थे। उस समय बिहार में कानून था कि जो विधानसभा सदस्यता की शपथ लेगा उसके बाद ही उसे विधायकों की जो सुविधा है वह मिलेगी पर जो MLA शपथ नहीं ले पाए तो उन्हें विधायकों की जो सुविधाएं मिलती हैं वो नहीं मिलेंगी। ऐसे में जीते हुए विधायक मिलने वाली सुविधाओं से वंचित ही रह गए।
दोबारा हुए विधानसभा चुनाव में इन विधायकों को मिली 'हार'
नवंबर 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव में 72 ऐसे उम्मीदवार थे जो फरवरी 2005 में तो चुनाव जीते पर इस दफा वो हार गए। इसमें वर्तमान बिहार के डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा भी शामिल थे। वो फरवरी 2005 में लखीसराय से चुनाव जीते थे लेकिन नवंबर 2005 का चुनाव हार गए। वहीं जेडीयू की एक और मंत्री लेसी सिंह जो 2005 फरवरी में धमदाहा से चुनाव जीती थी, लेकिन नवंबर 2005 में चुनाव हार गईं। वहीं बरबीघा से अशोक चौधरी फरवरी 2005 में चुनाव जीते पर बरबीघा से ही नवंबर 2005 में जेडीयू कैंडिडेट के हाथों हार गए। उधर सिकटा से दिलीप वर्मा फरवरी 2005 में जीते पर नवंबर में इस सीट से कांग्रेस के खुर्शीद फिरोज अहमद जीत गए। वहीं सुगौली से आरजेडी के विजय प्रसाद गुप्ता फरवरी 2005 में चुनाव जीते थे लेकिन नवंबर में बीजेपी के रामचंद्र सहनी से चुनाव हार गए। ऐसे 72 विधायक थे जो नवंबर 2005 के चुनाव में दोबारा ना जीत सके।

वर्तमान बिहार के डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा भी इसमें शामिल थे
नीतीश कुमार ने EX MLA's की सारी सुविधाएं महैया कराईं
जब नवंबर 2005 में नीतीश कुमार की सरकार सत्ता पर काबिज हुई तो उन्होंने पुराने कानून को समाप्त किया और फरवरी 2005 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीत दर्ज करने वाले विधायकों को पूर्व विधायक की सारी सुविधाएं महैया कराई गई। जिन सुविधाओं के वो हकदार थे। बिहार की नीतीश सरकार का यह अहम कदम था।

बिहार विधानसभा
नवंबर 2005 में हुए चुनाव में यह रहा सीटों का हाल
नवंबर 2005 में हुए चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू 139 सीटों पर चुनाव लड़ी और 88 सीटों पर जीत हासिल की थी वहीं बीजेपी ने 102 सीटों पर लड़कर 55 सीटें जीतीं। उधर लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी 175 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 54 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी थी। इस चुनाव में सबसे ज्यादा झटका रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी को लगा जिसने सिर्फ 10 सीटों पर जीत दर्ज की जबकि फरवरी 2005 के चुनाव में उसे 29 सीटें हासिल हुई थीं और 'सत्ता की चाबी' उसके पास थी पर अब तस्वीर उलट गई थी।
