पश्चिम बंगाल में चुनावी संग्राम अपने चरम पर है। 29 अप्रैल को दूसरे चरण का मतदान होना है और 4 मई को नतीजे सामने आएंगे। ऐसे में सवाल यही है कि क्या बंगाल में दिल्ली का दावा भारी पड़ेगा या दीदी का दबदबा बरकरार रहेगा? इस बार बंगाल का चुनाव सिर्फ मुद्दों पर नहीं, बल्कि मिजाज, प्रतीकों और सियासी चटखारों पर भी लड़ा गया। एक तरफ बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , गृहमंत्री अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, हिमंत बिस्वा सरमा समेत पूरी ताकत झोंक दी, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी ने भी आक्रामक अभियान चलाया।
रैलियों और रोड शो की भरमार
15 मार्च से शुरू हुए चुनावी अभियान में बीजेपी और टीएमसी दोनों ने पूरी ताकत झोंक दी। प्रधानमंत्री मोदी ने 21 रैलियां और 3 रोड शो किए, साथ ही हुगली नदी में नौकायन कर चुनावी संदेश दिया। अमित शाह ने 20 जनसभाएं और 11 रोड शो किए। बात अगर सत्ताधारी पार्टी की करें तो टीएमसी की तरफ से ममता बनर्जी ने 30 से अधिक रैलियां और रोड शो किए, जबकि अभिषेक बनर्जी ने 50 से ज्यादा सभाएं और पदयात्राएं कर चुनावी मैदान को गर्म बनाए रखा।
आस्था और राजनीति का संगम
इस बार चुनाव में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का भी जमकर इस्तेमाल हुआ। मोदी ने दक्षिणेश्वर काली मंदिर और बेलूर मठ सहित कई प्रमुख धार्मिक स्थलों पर दर्शन किए। अमित शाह ने भी इस्कॉन मंदिर और गंगासागर में स्नान कर राजनीतिक संदेश दिया। वहीं ममता बनर्जी ने चंडीपाठ और मंदिर दर्शन के जरिए यह संदेश दिया कि बंगाल की राजनीति स्थानीय आस्था से जुड़ी है।
झालमुड़ी बनाम सब्जी टोकरी
इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू रहा सियासी प्रतीकों का इस्तेमाल। झाड़ग्राम में मोदी का अचानक झालमुड़ी खाना और खुद भुगतान करना चर्चा में रहा। उन्होंने बंगाल की संस्कृति से जुड़ने का संदेश दिया। दूसरी ओर ममता बनर्जी बाजार पहुंचीं, सब्जियां खरीदीं और आम लोगों से संवाद किया। महंगाई को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला। इस तरह “मोदी की झालमुड़ी” और “दीदी की टोकरी” चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बन गए।तीखे बयान और सियासी वार-पलटवार
मोदी के भाषणों में विकास के साथ विपक्ष पर तीखे हमले भी दिखे। उन्होंने “सबका साथ, सबका विकास” और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई की बात की। अमित शाह ने कानून-व्यवस्था और घुसपैठ जैसे मुद्दों को उठाया। वहीं ममता बनर्जी ने जवाब देते हुए कहा कि “बंगाल को दिल्ली से नहीं, बंगाल से चलाया जाएगा।” अभिषेक बनर्जी ने भी बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि “बंगाल की मिट्टी बिकाऊ नहीं है।”
जमीनी स्तर पर भी जबरदस्त मुकाबला
बीजेपी के स्थानीय नेताओं ने 500 से ज्यादा छोटे-बड़े कार्यक्रम किए। वहीं टीएमसी ने 700 से अधिक सभाएं, पदयात्राएं और नुक्कड़ बैठकें आयोजित कर बूथ स्तर तक अपनी पकड़ मजबूत रखने की कोशिश की।
अब फैसला जनता के हाथ में
कुल मिलाकर, बंगाल का चुनाव इस बार एक राजनीतिक महोत्सव बन गया, जहां भाषण, प्रतीक, आस्था और रणनीति- सब कुछ देखने को मिला। अब नजर 29 अप्रैल की वोटिंग और 4 मई के नतीजों पर है। यही तय करेगा कि बदलाव की नाव किनारे लगेगी या दीदी का किला एक बार फिर अभेद्य रहेगा।
