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Aurangabad Seat: औरंगाबाद सीट भले ही कांग्रेस से लेने में कामयाब रहे तेजस्वी, लेकिन राह नहीं है आसान, दो परिवारों का रहा है दबदबा

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Apr 1, 2024, 09:46 PM IST

Aurangabad Seat: औरंगाबाद में राजपूत मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है। यहां दूसरे स्थान पर यादव मतदाताओं की संख्या है।

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राजद के हिस्से में है इस बार औरंगाबाद सीट

Photo : Twitter

Aurangabad Seat: बिहार का चितौड़गढ़ के नाम से जाने जाने वाला औरंगाबाद सीट पर इस बार मुकाबला दिलचस्प हैं। राजद नेता तेजस्वी यादन इस सीट को भले ही कांग्रेस से झटकने में कामयाब रहे हैं, लेकिन उनकी पार्टी के लिए रास्ते यहां आसान नहीं है। बिहार की यह सीट कांग्रेस के गढ़ के रूप में जानी जाती है। यहां से कई लोकसभा चुनाव कांग्रेस जीत चुकी है, लेकिन इस बार राजद महागठबंधन के तहत किस्मत आजमाने उतरी है।

औरंगाबाद सीट पर राजपूत समाज का दबदबा

बिहार की राजनीति में दखल रखने वाला यह क्षेत्र राजपूत जाति से आने वाले सांसदों को चुनता रहा है, यही कारण है कि इस क्षेत्र की पहचान चितौड़गढ़ के रूप में होती है। औरंगाबाद, रफीगंज, टिकारी, गुरुआ, कुटुम्बा और इमामगंज विधानसभा क्षेत्र वाले औरंगाबाद में राजपूत मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है। यहां दूसरे स्थान पर यादव मतदाताओं की संख्या है। इसके बाद मुस्लिम और भूमिहार मतदाताओं की संख्या है। इस सीट पर महादलित वोटर भी निर्णायक भूमिका अदा करते हैं।

औरंगाबाद में दो परिवारों का दबदबा

औरंगाबाद क्षेत्र के इतिहास पर नजर डालें तो इस क्षेत्र पर दो परिवारों का 50 से अधिक सालों तक कब्ज़ा रहा। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह उर्फ़ छोटे साहब छह बार इस संसदीय क्षेत्र से विजयी रहे तो उनके पुत्र निखिल कुमार और बहू श्यामा सिंह ने भी संसद में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। राम नरेश सिंह उर्फ़ लुटन सिंह इस क्षेत्र से दो बार सांसद बने। जबकि, उनके पुत्र सुशील सिंह इस क्षेत्र का चार बार लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। सुशील सिंह को इस चुनाव में भाजपा ने एकबार फिर से प्रत्याशी बनाया है।

राजद से अभय कुशवाहा मैदान में

पहली बार यहां से चुनाव मैदान में उतरे राजद ने जदयू से आए अभय कुशवाहा को टिकट थमाया है। राजनीतिक विश्लेषक राजद के लिए इस सीट को आसान नहीं बताते हैं। उनका मानना है कि राजपूत बहुल मतदाता वाले इस क्षेत्र के लोग राजपूत जाति से आने वाले प्रत्याशियों को जीत दिलाते रहे हैं। हालांकि, दो बार इसमें सेंध लगाने की कोशिश की गई, लेकिन सफलता नहीं मिली।

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