बिहार की राजनीति में कई अचंभित कर देने वाले किस्से हैं, लालू यादव और नीतीश कुमार ने जेपी आंदोलन के बाद ऐसा व्यूह रचा कि 1990 के बाद से राज्य में कांग्रेस कभी सीएम नहीं बना पाई। लगातार कमजोर होती गई, लेकिन बिहार में सबसे पहले कांग्रेस को पटखनी महामाया प्रसाद सिन्हा ने दिया था। वो भी तब जब पंडित नेहरू के बाद इंदिरा का देश की राजनीति में आगमन हो चुका था, कांग्रेस का वर्चस्व था, लेकिन तभी छात्रों को 'जिगर के टुकड़े' कहने वाले महामाया प्रसाद सिन्हा ने बिहार में कांग्रेस को पटखनी दे दी। आपको जानकार हैरान होगी कि महामाया प्रसाद सिन्हा एक तरह से निर्दलीय जीत कर आए थे, वो जिस पार्टी के थे, उससे वही सिर्फ जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। तब महामाया प्रसाद सिन्हा ने कर्पूरी ठाकुर का भी सीएम बनने का सपना तोड़ दिया था।
छात्रों को 'जिगड़ के टुकड़ों' कहने वाले नेता
महामाया प्रसाद सिन्हा पहले कांग्रेस में ही थे, बड़े नेता माने जाते थे, लेकिन राजनीति में पासा पलटा और बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ.श्रीकृष्ण सिंह से महामाया प्रसाद सिन्हा की अदावत हो गई। महामाया, कांग्रेस से अलग हो गए और उसी के खिलाफ सियासी लड़ाई छेड़ दी। बिहार में 1957 का विधानसभा चुनाव होना था, डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के करीबी महेश प्रसाद सिन्हा मुजफ्फरपुर विधानसभा से उम्मीदवार थे। इसी महेश प्रसाद सिन्हा के ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर रहते हुए बिहार में छात्रों का एक आंदोलन हुआ था, राज्य परिवहन निगम की बसों में किराये को लेकर। शुरुआत एक मामूली बकझक से हुई और फिर बवाल बढ़ गया, पुलिस ने गोली चला दी, जिसमें एक छात्र की मौत हो गई। छात्र उग्र हो गए और महामाया प्रसाद, सरकार के खिलाफ मैदान में आ गए। उन्होंने छात्रों को 'जिगर के टुकड़ों' से संबोधित करना शुरू कर दिया, कई बार छात्रों के सामने रोए भी। छात्र, महामाया प्रसाद के दीवाने हो गए। महामाया प्रसाद सिन्हा मुजफ्फरपुर विधानसभा से चुनावी मैदान में उतर गए। वहां का जातीय समीकरण महेश प्रसाद सिन्हा के साथ था, महेश प्रसाद सिन्हा भूमिहार समाज से आते थे और महामाया प्रसाद सिन्हा कायस्थ समाज से। जातीय समीकरण भले ही महेश प्रसाद के साथ था, लेकिन छात्र महामाया प्रसाद के साथ गए और पंडित नेहरू के प्रचार करने के बाद भी महेश प्रसाद सिन्हा चुनाव हार गए।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (फोटो- Congress)
जब सिटिंग सीएम को महामाया प्रसाद सिन्हा ने दिया हरा
1957 के बाद आया 1967 का बिहार विधानसभा चुनाव, पंडित नेहरू का निधन हो चुका था, डॉ. श्रीकृष्ण भी स्वर्ग सिधार गए थे, इंदिरा गांधी पीएम बन चुकी थीं और कांग्रेस में इंदिरा के खिलाफ स्वर भी उठने लगा था। इसी दौरान बिहार में विधानसभा चुनाव हुआ, तब कांग्रेस की सत्ता थी और सीएम थे कृष्ण वल्लभ सहाय। कृष्ण वल्लभ सहाय को हराने की इच्छा रामगढ़ के भूतपूर्व राजा कामाख्या नारायण सिंह के मन में थी और उन्होंने इसकी जिम्मेदारी सौंपी महामाया प्रसाद सिन्हा को। कामाख्या नारायण सिंह ने अपनी पार्टी जन क्रांति दल से महामाया प्रसाद सिन्हा को उम्मीदवार बनाया और सहाय के खिलाफ पटना पश्चिम सीट से मैदान में उतार दिया। चुनाव हुआ और कृष्ण वल्लभ सहाय को महामाया प्रसाद सिन्हा ने हरा दिया।

राजा कामाख्या नारायण सिंह (फोटो- Ramgarh Raj)
जब एक सीट वाली पार्टी की बिहार में बनी सरकार
1967 के विधानसभा चुनाव में भले ही महामाया प्रसाद सिन्हा ने सीएम को हरा दिया था, लेकिन उनकी पार्टी के वो इकलौते उम्मीदवार थे, जो विधानसभा पहुंचे थे। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, कांग्रेस के हिस्से 128 सीट आई थी, लेकिन पिछले चुनाव के मुकाबले 57 सीट कम। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को 68 सीट, जनसंघ को 26, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को 18, कम्यूनिस्ट को 24 सीट बाकी अन्य के हिस्से में जीत आई। तब बिहार का बंटवारा नहीं हुआ था और 318 विधानसभा सीटें थीं, बहुमत का आंकड़ा 160 था। यानि तब बहुमत किसी के पास नहीं था। लेकिन सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस थी, विधायक दल का चुनाव हुआ और महेश प्रसाद सिन्हा एक वोट से जीत गए, लेकिन राज्यपाल एम.ए. अयंगर ने कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित ही नहीं किया। कहा जाता है कि कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर थी, कांग्रेस के ही कुछ वरिष्ठ नेता ने राज्यपाल पर दवाब बनाया था कि अगर कांग्रेस को सरकार के लिए आमंत्रित किया गया तो पार्टी टूट जाएगी। इधर विपक्ष एकजुट हो गया। महामाया प्रसाद सिन्हा के नाम पर मुहर लग गई और महामाया प्रसाद सिन्हा बिहार के मुख्यमंत्री बन गए। इस सरकार में कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी शामिल थे। जनसंघ और कम्युनिस्ट दोनों।
कैसे टूटा कर्पूरी ठाकुर का सपना
दरअसल हुआ यूं कि 1976 के बिहार विधानसभा चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, जिसके पास 68 विधायक थे, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता थे कर्पूरी ठाकुर। कायदे से सीएम पद के लिए कर्पूरी ठाकुर सबसे आगे थे, लेकिन कर्पूरी ठाकुर के नाम पर बाकी पार्टियां सहमत ही नहीं हुईं, जिसके कारण महामाया प्रसाद सिन्हा को मौका हाथ लगा और सिंगल विधायक होने के बाद भी वो बिहार के मुख्यमंत्री बन गए, जबकि कर्पूरी ठाकुर को उपमुख्यमंत्री पद से संतोष करना पड़ा।
