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स्कूल में 'सर' या 'मैडम' नहीं सिर्फ टीचर बोलो, केरल के स्कूलों में क्यों बनाया जा रहा ये नियम?

  • Written by: प्रभाष रावत
  • Updated Jan 14, 2023, 09:03 PM IST

No 'Sir' or 'Madam' in Kerala Schools: केरल बाल अधिकार पैनल ने राज्य के सभी स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे स्कूल के शिक्षकों को 'सर' या 'मैडम' के बजाय 'टीचर' कहकर संबोधित करें। पैनल की ओर से यह कदम लैंगिक समानता को सुनिश्चित करने के साथ छात्रों के बीच अधिक लैंगिक तटस्थता यानी जेंडर न्यूट्रलिटी को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है।

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स्कूल में 'सर' या 'मैडम' नहीं सिर्फ टीचर बोलो, केरल के स्कूलों में क्यों बनाया जा रहा ये नियम?

केएससीपीसीआर यानी केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की ओर से राज्य के सभी स्कूलों को निर्देश जारी किए गए है कि वे स्कूल के शिक्षकों को 'सर' या 'मैडम' के बजाय 'टीचर' कहकर संबोधित करें। पैनल की ओर से यह कदम लैंगिक समानता सुनिश्चित करने और छात्रों के बीच ज्यादा जेंडर न्यूट्रलिटी यानी लैंगिक तटस्थता को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है।

एएनआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, पैनल के अध्यक्ष केवी मनोज कुमार और सदस्य सी विजयकुमार की एक पीठ ने बुधवार को सामान्य शिक्षा विभाग को राज्य के सभी स्कूलों में 'टीचर' शब्द का उपयोग करने के निर्देश देने का निर्देश दिया है।

पैनल का कहना है कि सम्मानसूचक शब्द 'सर' या 'मैडम' टीचर की अवधारणा से मेल नहीं खाते। इसके अलावा, बाल अधिकार पैनल ने यह भी कहा कि इससे छात्रों का अपने शिक्षक के प्रति लगाव बढ़ेगा और यह सुनिश्चित होगा कि उन्हें लिंग-तटस्थ तरीके से सम्मान के साथ संबोधित किया जा रहा है।

एएनआई के अनुसार KSCPCR ने कहा कि सर या मैडम के बजाय 'टीचर' बुलाने से सभी स्कूलों के बच्चों के बीच समानता बनाए रखने में भी खासी मदद मिल सकती है और टीचर के प्रति उनका लगाव भी बढ़ेगा।

प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए केएससीपीसीआर ने सामान्य शिक्षा विभाग के निदेशक को दो महीने के अंदर इस बारे में कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए भी निर्देशित किया है। शिक्षकों को उनके लिंग के अनुसार 'सर' और 'मैडम' संबोधित करते हुए भेदभाव को समाप्त करने की मांग करने वाले एक व्यक्ति की ओर से दायर याचिका पर विचार करते हुए यह निर्देश दिया गया था।

प्रभाष रावत
प्रभाष रावतauthor

रक्षा और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक विषयों में विशेष रुचि रखने वाले प्रभाष रावत कुछ-ना-कुछ नया सीखते रहने में विश्वास करते हैं। बीते 5 साल से ज्यादा समय में पत्रकारिता की कई बीट पर काम करने का अनुभव। साथ ही संवाद और लेखन से खुद को व्यक्त करने के अलावा आध्यात्म भी इनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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