भारतीय विश्वविद्यालय प्रणाली में शोध (Research) करने और अपने नाम के आगे 'डॉक्टर' (Dr.) लगाने का सपना लाखों युवा देखते हैं। लेकिन पीएचडी की राह जितनी आकर्षक दिखती है, उतनी ही अनुशासित और नियमों से बंधी हुई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, पीएचडी पूरा करने के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय की गई है, जिसके भीतर अभ्यर्थियों को अपना रिसर्च वर्क जमा करना अनिवार्य होता है। इसके साथ ही, कोर्सवर्क में न्यूनतम अंक न ला पाने या फेल होने पर 'बैक' से जुड़े कड़े नियम लागू होते हैं, जिनकी सही जानकारी होना हर स्कॉलर के लिए या पीएचडी करने की इच्छा रखने वाले उम्मीदवार के लिए जानना जरूरी है।
पीएचडी पूरा करने के लिए मिलते हैं कितने साल?
यूजीसी (UGC) के नवीनतम पीएचडी नियमों के अनुसार, रिसर्च कार्य पूरा करने के लिए न्यूनतम और अधिकतम अवधि तय की गई है। कोर्स को पूरा करने की न्यूनतम अवधि 3 साल और अधिकतम अवधि 6 साल तय की गई है। इस ड्यूरेशन के दौरान पीएचडी पूरी न करने वाले छात्र की डिग्री रद्द हो जाती है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें - Mexico में पढ़ने का है सपना, लेकिन आर्थिक तंगी बन रही बाधा? इस स्कॉलरशिप से होगा सपना साकार
क्या समय-सीमा बढ़ाई जा सकती है?
यदि कोई रिसर्चर या स्कॉलर 6 साल के भीतर अपनी थीसिस पूरी नहीं कर पाता है, तो कुछ विशेष परिस्थितियों में उसे एक्सटेंशन दिया जा सकता है -
- विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार री-रजिस्ट्रेशन या विशेष अनुमति के तहत अधिकतम 1 से 2 वर्ष का अतिरिक्त समय (Extension) मिल सकता है, जिससे कुल अवधि 7 से 8 साल तक पहुंच सकती है।
- यूजीसी के नियमों के अनुसार महिला अभ्यर्थियों और 40% से अधिक दिव्यांगता वाले उम्मीदवारों को पीएचडी पूरी करने के लिए 2 वर्ष की अतिरिक्त छूट (कुल 8 वर्ष तक) प्रदान की जाती है।
- महिला शोधार्थियों को अपनी पीएचडी की पूरी अवधि के दौरान अधिकतम 240 दिनों का मैटरनिटी और चाइल्ड केयर लीव भी मिलता है, जिसे कुल अवधि से अलग गिना जाता है।
PhD में बैक और कोर्सवर्क के कड़े नियम
पीएचडी में दाखिला लेते ही अभ्यर्थियों को सबसे पहले पहले या दूसरे सेमेस्टर में 'कोर्सवर्क' पास करना होता है। कोर्सवर्क में रिसर्च मेथोडोलॉजी, एथिक्स और संबंधित विषय के पेपर शामिल होते हैं। यूजीसी के नियमानुसार पीएचडी कोर्सवर्क में सफलता पाने के लिए उम्मीदवार को कम से कम 55% अंक या सीजीपीए में इसके समकक्ष ग्रेड हासिल करना अनिवार्य होता है।
अगर कोर्सवर्क में 'बैक' लग जाए तो क्या होगा?
यदि कोई छात्र कोर्सवर्क की परीक्षा में न्यूनतम अंक प्राप्त करने में विफल रहता है या फेल हो जाता है, तो उसे विश्वविद्यालय के नियमानुसार एक निश्चित समय सीमा के भीतर दोबारा परीक्षा देने के केवल एक या दो मौके ही मिलते हैं, जिसमें उन्हें पास होना जरूरी है। अगर कोई छात्र बैक क्लियर नहीं कर पाता है और 55 प्रतिशत अंक प्राप्त करने में असफल रहता है तो उसकी डिग्री रद्द कर दी जाती है।
थीसिस सबमिशन और री-सबमिशन
कोर्सवर्क पूरा करने के बाद जब छात्र अपनी रिसर्च पूरी कर थीसिस जमा करता है, तब भी मूल्यांकन प्रक्रिया में कड़े नियमों का पालन करना होता है। इसमें प्लेजरिज्म नहीं होना चाहिए। यूजीसी के नियमानुसार थीसिस में समानता यानी प्लेजरिज्म की एक तय सीमा 10% से कम निर्धारित है। अत्यधिक प्लेजरिज्म पाए जाने पर थीसिस खारिज की जा सकती है या शोधार्थी को दंडित किया जा सकता है। इसके अलावा यदि थीसिस इवैल्यूएटर्स को थीसिस में सुधार की गुंजाइश लगती है, तो वे इसे संशोधन के लिए वापस भेज सकते हैं। छात्र को दिए गए समय के भीतर संशोधन करके दोबारा थीसिस सबमिट करनी होती है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें - इंटरव्यू में 'Tell Me About Yourself' सवाल का कैसे दें जवाब, सिलेक्शन होगा आसान
समय-सीमा खत्म होने पर क्या होता है?
यदि कोई शोधार्थी तय की गई अधिकतम अवधि के भीतर अपनी थीसिस जमा नहीं कर पाता है, तो उसका पीएचडी खुद से लैप्स हो जाती है। बता दें तय अवधि में विस्तृत अवधि को भी शामिल किया गया है। उसके बाद अगर छात्र पीएचडी करने की इच्छा रखता है तो उसे दोबारा नए सिरे से प्रवेश प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए, पीएचडी में प्रवेश लेते ही छात्रों को कोर्सवर्क को गंभीरता से लेना चाहिए और अपने गाइड के मार्गदर्शन में शुरुआती सालों से ही नियमित रूप से रिसर्च पेपर व थीसिस लेखन की स्पीड तेज रखनी चाहिए।
